जंगल से झील और वेटलैंड्स तक हर प्राकृतिक क्षेत्र को मिल रही विशिष्ट पहचान
लखनऊ। गाजीपुर में रंग-बिरंगी तितलियों को निहारता बच्चा हो या मैनपुरी की आर्द्रभूमि (वेटलैंड) के बीच विचरण करते सारस को कैमरे में कैद करता पक्षी प्रेमी या फिर दुधवा अभ्यारण्य में बाघ देखने को उत्सुक पर्यटक। उत्तर प्रदेश का पर्यटन अब ऐतिहासिक इमारतों और धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं रह गया है। राज्य के जंगल, वेटलैंड्स, नदियां, पक्षी और समृद्ध जैव विविधता भी पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं। कुल मिलाकर, देश का सबसे बड़ा प्रदेश एक ऐसे इको-टूरिज्म मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जहां पर्यटन के साथ पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी केंद्र में रखा जा रहा है।
राष्ट्रीय वन्यजीव दिवस (04 सितंबर) के अवसर पर प्रदेश में इको टूरिज्म को लेकर तैयार की जा रही योजनाओं में प्राकृतिक स्थलों को समझने और उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। नेचर ट्रेल, इंटरप्रिटेशन सेंटर, वॉचटावर, साइनेज और प्रजाति आधारित सर्किट विकसित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य वाइल्ड लाइफ टूरिज्म को केवल वन्यजीवों को देखने तक सीमित न रखकर पर्यटकों को उनके प्राकृतिक परिवेश और जैव विविधता से भी रूबरू कराना है।

70 इको टूरिज्म परियोजनाओं के लिए 231 करोड़ मंजूर
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 के बीच प्रदेश में 70 इको टूरिज्म परियोजनाओं के लिए 231 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि मंजूर की गई है। इन परियोजनाओं में जंगलों, आर्द्रभूमियों, वन्यजीव क्षेत्रों, पक्षी विहारों, झीलों और अन्य प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को शामिल किया गया है।
‘वन्यजीव पर्यटन से बढ़ेगा प्रकृति के प्रति आकर्षण’
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में इको टूरिज्म को इस तरह विकसित किया जा रहा है, जिससे हर प्राकृतिक क्षेत्र की अपनी खासियत बरकरार रहे और पर्यटक उसे करीब से समझ सकें। उन्होंने कहा कि वन्यजीव पर्यटन का मतलब केवल वन्यजीवों को देखना और उनकी तस्वीरें खींचना नहीं है। नेचर ट्रेल, इंटरप्रिटेशन सेंटर, व्यूइंग स्पेस और प्रजाति आधारित सर्किट के जरिए पर्यटकों को प्राकृतिक आवास और जैव विविधता की बेहतर जानकारी दी जा सकती है। इससे लोगों में प्रकृति और वन्य जीवों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा तथा रिस्पांसिबल टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, इन पर्यटन स्थलों से जुड़े स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी तैयार होंगे।’

दुधवा से बुंदेलखंड तक बढ़ रहा दायरा
पर्यटकों की राह आसान बनाने के साथ उन्हें वन्यजीवों और जंगल के प्रति जिम्मेदार बनाने के लिए सरकार साइनेज व्यवस्था को मजबूत कर रही है। तराई क्षेत्र में दुधवा को केंद्र में रखकर करीब आठ करोड़ रुपए की लागत से साइनेज संबंधी कार्य कराए जा रहे हैं। इसमें करीब पांच करोड़ रुपए दिल्ली-एनसीआर और लखनऊ से दुधवा आने वाले मार्गों पर साइनेज लगाने पर खर्च किए जाएंगे। वहीं, तीन करोड़ रुपए से अधिक की राशि दुधवा टाइगर रिजर्व, किशनपुर और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य क्षेत्रों में साइनेज व्यवस्था विकसित करने पर खर्च होगी। इन साइनेज के माध्यम से पर्यटकों को रास्तों और प्रमुख स्थलों की जानकारी देने के साथ ही वन क्षेत्रों में वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार व्यवहार के लिए भी जागरूक किया जाएगा।
वहीं, चित्रकूट के रानीपुर टाइगर रिजर्व के पास पर्यटन भूमि के विकास के लिए करीब 14 करोड़ रुपए की परियोजना पर काम किया जा रहा है। इससे बुंदेलखंड भी प्रदेश के वन्यजीव पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से उभर रहा है।
वेटलैंड्स में प्रवासी पक्षियों का संसार
प्रदेश के इको टूरिज्म नेटवर्क में आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) की भी अहम भूमिका है। आगरा के सूर सरोवर पक्षी विहार में नेचर ट्रेल, वॉचटावर और साइनेज जैसी सुविधाएं विकसित हो रही हैं। वहीं मुजफ्फरनगर की हैदरपुर वेटलैंड में नेचर ट्रेल, नेचर कैंप और वॉचटावर तैयार किए जा रहे हैं। इसके अलावा, रायबरेली के समसपुर पक्षी विहार, महराजगंज के सोहगीबरवा वन्य जीव अभ्यारण्य और संत कबीर नगर की बखिरा झीलको भी पर्यटन सुविधाओं से जोड़ने के लिए विकास परियोजनाएं शुरू की गई हैं।
कौशांबी की अलवारा झील और दरियाबगंज झील अब प्रकृति प्रेमियों के लिए नए आकर्षण के रूप में विकसित हो रही हैं। अलवारा झील के लिए चार करोड़ रुपए से अधिक और दरियाबगंज झील के लिए 3.5 करोड़ रुपए से अधिक की पर्यटन परियोजनाएं प्रस्तावित/स्वीकृत की गई हैं। वहीं, शामली की मामौर झील और बरेली की झीलों को भी प्रदेश के विस्तारित प्रकृति पर्यटन नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। खासकर सर्दियों में इन आर्द्रभूमियों में प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी पर्यटकों को आकर्षित करती है। ग्रेलैग गूज, नॉर्दर्न पिंटेल, रडी शेलडक और नॉर्दर्न शोवलर जैसे पक्षियों के पहुंचने से ये स्थल बर्ड वॉचिंग और वेटलैंड टूरिज्म के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहे हैं।
सारस के साथ उसकी दुनिया को देख सकेंगे पर्यटक
उत्तर प्रदेश के राजकीय पक्षी सारस को अब केवल देखने भर नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक परिवेश और जीवन से समझने का मौका भी पर्यटकों को मिलेगा। इटावा और मैनपुरी में विकसित किए जा रहे दो सारस सर्किट इसी दिशा में अहम पहल हैं। इन दोनों परियोजनाओं पर सात करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जा रहे हैं। इटावा के सारस सर्किट में सरसई नावर और परौली रामायण को शामिल किया गया है, जबकि मैनपुरी सर्किट में किरिथुआ, सहस सहान, कुरी जरावन, सौंज और समान को जोड़ा जा रहा है। इन स्थलों पर पाथवे, सूचना पट्टिकाओं और व्यूइंग सुविधाओं का विकास किया जा रहा है।

सर्किट विकसित होने के बाद पर्यटक सारस को करीब से देखने के साथ उन आर्द्रभूमियों और कृषि क्षेत्रों को भी समझ सकेंगे, जो इस पक्षी के प्राकृतिक आवास और जीवन का आधार हैं। इस तरह सारस सर्किट वन्यजीव दर्शन को उसके पूरे प्राकृतिक परिवेश से जोड़ने का काम करेंगे।
गाजीपुर में बच्चों के करीब आएगी जैव विविधता
वहीं, गाजीपुर में कामाख्या वन पार्क को प्रकृति और जैव विविधता के अनूठे अनुभव के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। नवंबर तक इसे पूरा करने का लक्ष्य है। पार्क में तितली उद्यान और इंटरप्रिटेशन सेंटर समेत कई सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। यहां खास बात यह होगी कि बच्चों, विद्यार्थियों और परिवारों को किसी बड़े वन्यजीव अभ्यारण्य तक गए बिना ही तितलियों और जैव विविधता को करीब से जानने-समझने का मौका मिलेगा

प्रकृति के हर रंग से रूबरू करा रहा यूपी का इको टूरिज्म
कुल मिलाकर प्रदेश की इको टूरिज्म परियोजनाएं अलग-अलग प्राकृतिक क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट पहचान के अनुरूप पर्यटन अनुभव दे रही हैं। दुधवा और रानीपुर जहां बाघों के प्राकृतिक आवास से परिचित कराते हैं, वहीं वेटलैंड्स प्रवासी पक्षियों और जलीय पारिस्थितिकी की झलक प्रस्तुत करती हैं। सारस सर्किट किसी एक प्रजाति और उसके पूरे परिवेश को समझाते हैं, जबकि कामाख्या वन पार्क बच्चों और परिवार के सदस्यों के लिए जैव विविधता को आसान और सुलभ अनुभव में बदल रहा है।
राष्ट्रीय वन्यजीव दिवस का संदेश भी यही है कि वाइल्ड लाइफ टूरिज्म सिर्फ वन्यजीवों को देखने तक सीमित न रहे। पर्यटक जब जंगल में जाएं तो वहां के जीव-जंतुओं के साथ उनके प्राकृतिक आवास, जैव विविधता और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भी समझें। यही अनुभव वन्यजीव पर्यटन को प्रकृति और संरक्षण से जोड़ता है।
