तुलसी माला से लड्डू गोपाल की पोशाक तक, गांव में मिल रहा ब्रज की संस्कृति का जीवंत अनुभव
लखनऊ/मथुरा। जन्माष्टमी पर जहां मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है, वहीं ब्रज की पर्यटन यात्रा अब मंदिरों और प्रमुख तीर्थस्थलों से आगे गांवों तक पहुंच रही है। मथुरा से कुछ दूरी पर स्थित जैत गांव ग्रामीण पर्यटन और पारंपरिक शिल्प के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। यहां पर्यटक तुलसी माला बनाने की कला देखने के साथ खुद माला तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा लड्डू गोपाल की पोशाक बनाना, मिट्टी के बर्तन तैयार करना, ब्रज के व्यंजन, भजन, लोककथाएं और ग्रामीण परिवारों के साथ ठहरने का अनुभव भी लिया जा सकता है।
जैत गांव की तुलसी माला ने बढ़ाया ग्रामीण रोजगार और पर्यटन
जैत गांव में तुलसी माला बनाने का काम पीढ़ियों से चला आ रहा है और गांव देश के बड़े तुलसी माला उत्पादन केंद्रों में शामिल है। इस शिल्प से 2,000 से अधिक परिवार जुड़े हुए हैं। अब इस पारंपरिक काम को पर्यटन से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिश की जा रही है। ‘गिरधारी तुलसी माला महिला समूह’ और ‘ब्रजरानी तुलसी माला महिला समूह’ के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी को संगठित किया गया है। यहां तैयार होने वाली मालाएं मथुरा-वृंदावन के अलावा दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, मुंबई और कोलकाता जैसे बाजारों तक पहुंच रही हैं।

पर्यटकों के लिए जैत में तुलसी के खेतों से लेकर माला तैयार होने तक की पूरी प्रक्रिया को अनुभव का हिस्सा बनाया गया है। पर्यटक खेतों में तुलसी देख सकते हैं, सूखी तुलसी की डंडियों से मोती तैयार करने की प्रक्रिया समझ सकते हैं, कारीगरों से बातचीत कर सकते हैं और अपनी तुलसी माला भी बना सकते हैं। इसके साथ लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार करने, मिट्टी के बर्तन बनाने, भजन, ब्रज के खान-पान और भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी लोककथाओं को भी ग्रामीण पर्यटन अनुभव में शामिल किया गया है।
जन्माष्टमी पर बढ़ी तुलसी माला की मांग, जैत गांव को मिला नया बाजार
जन्माष्टमी के दौरान तुलसी माला की मांग और बढ़ जाती है। श्रद्धालु इन मालाओं का इस्तेमाल जप के लिए करते हैं, गले में कंठी के रूप में पहनते हैं और इन्हें धार्मिक स्मृति के तौर पर भी खरीदते हैं। छोटी तुलसी मालाएं और आभूषण लड्डू गोपाल के श्रृंगार में भी इस्तेमाल होते हैं। हालांकि इस समय तुलसी का उत्पादन सीमित है, क्योंकि अगली खेती का चक्र दिसंबर में शुरू होना है। इसके बाद माला निर्माण और इससे जुड़ी आजीविका गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है। फिलहाल जन्माष्टमी के अवसर पर कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों के माध्यम से पर्यटकों को इस शिल्प से जोड़ने और जैत गांव को तुलसी माला के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान दिलाने पर जोर है।

जैत गांव के लिए यह अवसर ब्रज में बढ़ते पर्यटन के कारण और बड़ा हो गया है। वर्ष 2025 में मथुरा में करीब 10.24 करोड़ पर्यटक पहुंचे, जबकि 2022 में यह संख्या लगभग 6.53 करोड़ थी। वर्ष 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही करीब 1.90 करोड़ पर्यटक मथुरा पहुंचे। वर्ष 2025 की जन्माष्टमी पर अकेले मथुरा और वृंदावन में त्योहार वाले दिन शाम तक करीब 60 लाख श्रद्धालु पहुंच चुके थे। ऐसे में जैत जैसे गांव प्रमुख मंदिर केंद्रों से आगे पर्यटकों की आवाजाही बढ़ाने और पर्यटन का आर्थिक लाभ ग्रामीण परिवारों तक पहुंचाने का नया रास्ता बन रहे हैं।
जैत गांव में शिल्प और पर्यटन से बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि, जैत गांव इस बात का उदाहरण है कि ब्रज की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से ग्रामीण आजीविका को कैसे जोड़ा जा सकता है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार का प्रयास है कि ब्रज आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक उन गांवों तक भी पहुंचें, जहां क्षेत्र की पारंपरिक कला, खान-पान, लोककथाएं और आतिथ्य आज भी जीवंत हैं। तुलसी माला की कार्यशालाओं, ग्रामीण अनुभवों और होमस्टे से जोड़कर महिला कारीगरों, किसानों, स्थानीय गाइडों, मेजबानों और छोटे उद्यमों के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं।

जैत गांव की शिल्प अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में प्रशिक्षण और तकनीक की भी भूमिका बढ़ी है। आईआईटी दिल्ली के रूरल टेक्नोलॉजी एक्शन ग्रुप ने तुलसी के मोती बनाने और उनमें छेद करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए एक बेहतर उपकरण विकसित किया है, जिससे कारीगरों की मेहनत कम होने के साथ उत्पादन क्षमता बढ़ती है। विश्व बैंक की सहायता से संचालित उत्तर प्रदेश प्रो-पुअर टूरिज्म डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत कारीगरों को प्रशिक्षण, तुलसी रिसोर्स सेंटर, फसल भंडारण, बिक्री केंद्र और तुलसी की खेती के लिए सोलर पंप जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। ब्रज क्षेत्र में करीब 3,000 कारीगरों को तुलसी माला और राधा-कृष्ण की पोशाक जैसे पारंपरिक रचनात्मक शिल्पों का प्रशिक्षण भी दिया गया है।
जैत गांव में बढ़ रहा ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे कारोबार
जैत गांव में शिल्प के साथ ग्रामीण आतिथ्य भी आकार ले रहा है। गांव में पांच होमस्टे विकल्प चिन्हित किए गए हैं। अरन्या कॉटेज फार्म स्टे और समालिया फार्म्स में ठहरने के साथ स्थानीय शाकाहारी भोजन और फार्म अनुभव उपलब्ध हैं, जबकि श्री होमस्टे, श्री हरि निवास होमस्टे और तेजवीर होमस्टे में घर का बना भोजन, ग्रामीण परिवारों से बातचीत और शिल्प कार्यशालाओं का अनुभव मिलता है। श्री होमस्टे संचालक केशव किशोर गौतम जापान, श्रीलंका, इटली समेत कई देशों से आए पर्यटकों की मेजबानी कर चुके हैं। वहीं जैत गांव निवासी संजय सिंह ने तुलसी मालाओं को बड़े बाजारों तक पहुंचाकर करीब 10 लाख रुपये की बिक्री की है। उन्होंने होमस्टे प्रबंधन का प्रशिक्षण भी लिया है, जिससे शिल्प और पर्यटन दोनों को जोड़ा जा सके।

जैत गांव की पहचान को व्यापक बनाने के लिए उत्तर प्रदेश पर्यटन की ओर से भी प्रयास किए जा रहे हैं। अप्रैल 2026 में टूर ऑपरेटरों, ट्रैवल राइटर्स और डिजिटल क्रिएटर्स ने गांव का दौरा किया, जबकि जुलाई में श्रीलंका के एक प्रतिनिधिमंडल ने जेत के शिल्प, खान-पान और ग्रामीण आतिथ्य का अनुभव लिया। गांव में जय कुंड और कालिया नाग मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी हैं, जो ग्रामीण पर्यटन अनुभव को और समृद्ध करते हैं। अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धार्मिक कार्य अमृत अभिजात ने बताया कि जैत गांव में पहले से मौजूद शिल्प, सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक ज्ञान को प्रशिक्षित मेजबानों, स्थानीय भोजन, कार्यशालाओं और ठहरने की सुविधा से जोड़कर एक छोटी यात्रा को भी सार्थक अनुभव में बदला जा सकता है। इससे पर्यटन पर होने वाला खर्च गांव के भीतर ही अधिक लोगों तक पहुंच सकेगा। जन्माष्टमी पर जैत गांव का उभरता मॉडल यह दिखा रहा है कि ब्रज में पर्यटन अब केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि गांवों, शिल्पों और जीवंत परंपराओं के जरिए ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने का माध्यम भी बन रहा है।

