₹2.50 का पेड़ा आज भी कायम
संजय मिश्र।
देवरिया। महंगाई के इस दौर में जहां रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर मिठाइयों तक के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं देवरिया के एक छोटे से रेलवे स्टेशन के पास आज भी ढाई रुपये में पेड़ा मिल रहा है। खास बात यह है कि इस पेड़े की कीमत पिछले पांच से सात वर्षों से नहीं बढ़ी है। हालांकि, बढ़ती लागत के बीच पेड़े का आकार जरूर छोटा हो गया है। कभी हथेली जितना बड़ा मिलने वाला यह पेड़ा अब लगभग अंगूठे के आकार का रह गया है।
भटनी जंक्शन से वाराणसी की ओर जाने वाली रेल लाइन पर भटनी और सलेमपुर जंक्शन के बीच स्थित पिवकोल स्टेशन के पास एक छोटी सी दुकान वर्षों से यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच पहचान बनाए हुए है। इसी दुकान पर लालबहादुर प्रजापति पेड़ा बेचते हैं। बताया जाता है कि पहले उनके चाचा सिद्धू प्रजापति यह दुकान चलाते थे। स्थानीय लोग इसे आज भी ‘सिद्धू का शुद्ध पेड़ा’ के नाम से जानते हैं।
25 पैसे से शुरू हुआ सफर
पुराने ग्राहकों के मुताबिक, 80 और 90 के दशक में यहां पेड़ा महज 25 पैसे में मिलता था और उसका आकार इतना बड़ा होता था कि वह हथेली पर पूरा आ जाता था। दूध, खोया और चीनी से तैयार होने वाला यह पेड़ा यात्रियों के बीच काफी लोकप्रिय था। समय के साथ पेड़े की कीमत 25 पैसे से बढ़कर 50 पैसे, फिर एक रुपये, डेढ़ रुपये और आखिरकार ढाई रुपये तक पहुंची। दुकानदार के मुताबिक, पिछले पांच से सात वर्षों से इसकी कीमत ढाई रुपये प्रति पीस ही है।
महंगाई बढ़ी तो आकार हुआ छोटा
दुकानदार लालबहादुर प्रजापति बताते हैं कि दूध, खोया, चीनी और गैस समेत पेड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाली लगभग सभी चीजों की लागत बढ़ गई है। ऐसे में पुराने आकार का पेड़ा ढाई रुपये में बेचना मुश्किल हो गया। कीमत बढ़ाने के बजाय उन्होंने पेड़े का आकार छोटा कर दिया। उनका कहना है,”ग्राहक आते ही कहते हैं कि भैया, वही ढाई रुपये वाला पेड़ा देना। अगर हम पांच रुपये कीमत बता दें तो उन्हें महंगा लगेगा। इसलिए दाम बढ़ाने के बजाय आकार छोटा करना पड़ा।” अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘श्रिंकफ्लेशन’कहा जाता है, जिसमें किसी उत्पाद की कीमत समान रहती है, लेकिन उसकी मात्रा या आकार कम कर दिया जाता है।
यात्रियों और श्रद्धालुओं की भी पसंद
पिवकोल स्टेशन के आसपास से गुजरने वाले रेल यात्री भी इस पेड़े को खरीदते हैं। दुकानदार के अनुसार, वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर और लखनऊ समेत विभिन्न शहरों की यात्रा करने वाले लोग यहां से पेड़ा लेकर जाते हैं। स्टेशन के पास स्थित हनुमान मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के लिए भी लोग पेड़ा खरीदते हैं। दुकानदार का कहना है कि दुकान की बिक्री काफी हद तक यात्रियों और श्रद्धालुओं पर निर्भर है। वह कहते हैं कि भगवान की कृपा से दुकान आज भी चल रही है।

ग्राहकों की अलग-अलग राय
पुराने ग्राहकों को पेड़े का पुराना स्वाद और आकार याद है। बुजुर्ग ग्राहकों का कहना है कि पहले एक पेड़ा खाने से ही मन भर जाता था, जबकि अब छोटे आकार के कारण दो पेड़े खाने पड़ते हैं। हालांकि, उनका यह भी कहना है कि मौजूदा महंगाई में ढाई रुपये में पेड़ा मिलना अपने आप में बड़ी बात है। वहीं, बच्चों और युवाओं के लिए यह पेड़ा आज भी सस्ता और आकर्षक विकल्प है। उनका कहना है कि दस रुपये में चार पेड़े मिल जाते हैं, जो कई पैकेटबंद स्नैक्स या चॉकलेट के मुकाबले सस्ता पड़ता है।
कीमत बरकरार रखने की कोशिश
छोटे दुकानदारों के लिए कीमत तय करना केवल लागत का सवाल नहीं, बल्कि ग्राहकों की खरीदारी की आदतों से भी जुड़ा होता है। ढाई रुपये जैसी कीमत लंबे समय से ग्राहकों के मन में बनी हुई है। कीमत अचानक पांच रुपये करने पर ग्राहक इसे महंगा महसूस कर सकते हैं। ऐसे में दुकानदार ने कीमत बढ़ाने के बजाय मात्रा कम करने का रास्ता अपनाया है।
पिवकोल स्टेशन के पास बिक रहा यह ढाई रुपये का पेड़ा अब केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि बदलते समय, बढ़ती महंगाई और पुराने स्वाद को बनाए रखने की कोशिश की कहानी भी बन गया है। कभी 25 पैसे में मिलने वाला हथेली जितना पेड़ा आज ढाई रुपये में अंगूठे के आकार का है, लेकिन इसकी कीमत से जुड़ी पुरानी यादें आज भी ग्राहकों को दुकान तक खींच लाती हैं।
