कामेश त्रिपाठी। बढ़ रहा है सूर्य अपनी,रथ सजा कर रश्मियों का।छिपता तिमिर भयभीत हो,है तेज ऐसा रश्मियों का।।बढ़ रही आभा जगत में,संचार होती चेतना का।कोपलें विकसित हुई,विस्तार करती चेतना का।।कपोत, केकी, कीर,कोयल,, हंस,हारिल, मुर्ग, चातक।कर रहे कलरव से गुंजित,, वन, वाग,उपवन,वाटिका तक।।सर, कूप,सरिता, नद,सरोवर,, ताल,झरने,सिंधु, बादल।गिरती हुई हिम की फुहारें,भींगता अवनी का आंचल।।स्वर्ण के आभूषणों...
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