Personality Development in Hindi: व्यक्ति की वास्तविक नींव, संस्कार और जीवन मूल्य
कामेश त्रिपाठी।
लखनऊ। “रामवृक्ष बेनीपुरी”की लिखी गयी रचना ‘‘नीव की ईंट’’ लगभग सभी ने पढ़ा होगा या फिर उस रचना की बातें लगभग लोगों द्वारा सुना होगा। उनके अनुसार महत्वपूर्ण,दिखने वाले इमारत की बुलंदी नहीं बल्कि उनके नीव में भरी गयी वह पहली ईंट है जहां से इमारत की शुरूआत होती है। हकी़कत तो यह है कि नीव जितनी मज़बूत होगी ईमारत की आयु उतनी ही अधिक होगी उसकी मज़बूती उतनी ज्यादा होगी। कोई भी ईमारत चाहे जितनी ऊँची और खूबसूरत क्यों न हो परंतु उसकी नीव यदि कमजोर है तो वह हर समय खतरे में रहती है। वैसे भी बुलन्दियां हर वक्त नहीं रहती, वह चाहे ईमारत हो या फिर इंसान। आज हम जिस शान ओ शौकत के शीर्ष पर हैं जरूरी नहीं है की हमेशा उसी जगह बने रहेगें। इतिहास इस बात का गवाह है कि अनेकानेक हस्तियां उभर कर सामने आई और वक्त की मार से बिखर कर धराशाई हो गई। कहीं भिखारी राजा बन बैठे तो कहीं राजघराने सड़क पर मजबूर घूमने निकल पड़े। खतरा हर समय बुलन्दियों के नीचे ही होता है। देखा जाय तो सबसे ऊँचे पर्वत शिखर के नीचे ही सबसे गहरी खाई भी होती है। कहा गया है – ‘‘बुलंदी देर किस सख्स के हिस्से में रहती है सबसे ऊँची ईमारत हर घड़ी खतरे में रहती है’’ अर्थात् हमारी बाहरी चमक धमक शान ओ शौकत, रूतवा हर वक्त खतरे में ही रहता है। निश्चित ही हमारे बीच ही रहने वाले हर वक्त हमारी जड़ें काटने की फिराक में लगे रहते हैं। अर्थात् हम जो भी भीड़ अपने साथ इक्ट्ठा करते हैं , जिन पर भरोसा रख कर हम अपनी बुलंद ईमारत खड़ी करते हैं कभी भी वह हमें गिराने में अपनी चाल चल सकते हैं। हम जिन्हें अपनी नीव समझते हैं उन्हें हमने कितनी मजबूती दिया है यह देखना और सोचना हमारा ही विषय है। यदि हमने इतिहास में बुलन्दियों पर बैठे लोगों को बर्बादी की भेंट होते देखा है तो निश्चित ही किसी भरोसे मन्द को ही नींव की ईंट खींचने की कहानी जरूर पढ़ी होगी। यह सच है कि किसी ईमारत की बुलंदी से अधिक महत्वपूर्ण वह पहली ईंट है जिसने अपना बलिदान करते हुए खुद को जमीन के नीचे दफन कर दिया परन्तु समझने और देखने की बात यह है कि वह ईंट वास्तव में कितनी मजबूत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि ईंट मिट्टी में जाने के बाद इमारत को भी मिट्टी में ना मिला दे।
हर व्यक्ति अपने आप में एक ईमारत है और इसकी सोच उसके कर्म ही उसकी वास्तविक बुलंदी है। जिसे हम इस भौतिक संसार की बुलंदी मानते हैं जिसे रूतबा समझते हैं वह तो क्षणिक मात्र है। वास्तविक रूतबा तो उनके अंदर से निकलने वाली उसके वास्तविक गुण में होती है। जिसका कोई तोड़ नहीें ना ही कोई तुलना है जिसकी नीव कभी भी धोखा नहीं दे सकती । परंतु समझने की बात यह है की हमारी इस नीव में किस तरह की प्रवृत्ति की ईंट पड़ी है क्योंकि प्राकृतिक रूप से हर व्यक्ति की प्रवृत्ति सिर्फ उसी की होती है ,जिसका दूसरा कोई भी सानी नहीं होता। हर जीव की प्रवृत्ति सिर्फ उसी की होती है। परंतु इस प्रवृत्ति में जब किसी और का हस्तक्षेप होने लगता है, कोई दूसरा आदमी अपनी सोच से इसमें छेद कर देता है तब उस व्यक्ति या जीव की नीव कमजोर हो जाती है और वह अपनी प्रवृत्ति से भटक जाता है।
सांसारिक रूप से हमें हमेेशा बचपन से ही ऐसी बातें सिखायी और पढ़ाई जाती हैं जिनका यदि सही रूप में अध्ययन किया जाये तो हमारे नैसर्गिक जीवन से कोई वास्ता नहीं होता है। हमारी बचपन की नीव में ही ऐसी ईच्छा, चाहत और सोच भर दी जाती है की जहां से हमारे निजी प्रवृत्ति को हम समझ ही नहीं पाते। जबकि यदि व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति को वास्तव में समझ जाये और किसी भी दूसरे की बात में अपने आप को उलझनेे से बचा ले सिर्फ अपनी ईच्छानुसार सीख ले अपने निर्णय स्वयं से करने लगे तो निश्चित ही उसकी जो बुलन्दि होगी जो शान होगी उसे कभी भी गिराया नहीं जा सकेगा। बचपन से ही बच्चे के अंदर शिक्षा, संस्कार और सभ्यता के नाम पर उसके अपने ही लोग उसे उसकी प्रवृत्ति से भटकाना प्रारम्भ कर देते हैं। और इन सबके पीछे सिर्फ एक ही पाठ पढ़ाया जाता है कि इस तरह से अधिक से अधिक धन कमाया जा सकता है। एक बच्चा जो मैदान में जाकर खेलना चाहता है जो दोस्तों में रहकर मस्ती करना चाहता है जो बगिचे में घूमना चाहता है उसी के माँ-बाप उसकी ईच्छा को दबाने का काम करते हैं जबरदस्ती उसे पढ़ने के लिये मजबूर करते हैं जबकि एक बच्चे के अंदर हमेशा वही कार्य करने की ईच्छा पैदा होती है जो उसकी मूल प्रवृत्ति होती है। प्रवृत्ति से हट कर हम जो भी कार्य करवाना चाहेगें हम उस बच्चे के वास्तविक निखार को दबाते जाएंगे।
“इस फकीहे शहर से मैं का जवाब क्या पूछे,
चाँदनी को भी हजरत हराम कहते है।
नवाजे मुर्ग को कहते हैं अब जियान- ए-चयन
खिले ना फूल इसे इंतजाम कहते हैं।
बच्चा तो प्रकृति की कली है जो अपने सुगंध बिखेरने के लिये जन्म लिया है मगर हम अपनी सोच से उस कली को फूल बनने ही नहीं देते और दूसरी तरफ मोड़ने का प्रयास करते हैं। यह संसार ऐसा ही है यहाँ कोई दूसरा दूसरे के बारे में क्या जानेगा और दूसरे को क्या बता सकता है। यह संसार तो ऐसा ही है की चाँद से गिरने वाली चांदनी से भी खुश नहीं है,चिड़ियों का चहचहाना भी इसे प्रदूषण महसूस होता है। जो बच्चा स्वतंत्र रूप से जीना चाहता है उसे चाहरदीवारी में कैद करके रखता है। जिस बच्चे को प्रकृति की खुली गोद में खेलना है उसके लिये घर के अंदर गुड़ियों और कम्यूटर का इंतेजाम कर रखा है। जो प्रकृति की खुली किताब का अनुभव लेने के लिये बेताब है उसे भौतिकता की किताबेें पकड़ा रहा है। पूरी तरह से बच्चे को अपनी सोच से चलाने का प्रयास किया जाता है।
आज समाज में इतना भ्रष्टाचार इतना आतंक जो फैला है कहीं न कहीं इसमें यही कारण नजर आता है कि बच्चों को वह कार्य नहीं करने के लिये दिया गया जिसे करना उसकी शौक थी उनकी मूल प्रवृत्ति थी उनके साथ जबरदस्ती किया गया और जिनका विकृत परिणाम हुआ की बच्चों की मानसिकता सोच धारणा सब विकृत हो गया और सब रूग्ण हो गए तथा आपराधिक प्रवृत्ति के होते चले गये। किसी भी जीव के अंदर प्रकृतिक रूप से कभी भी अपराधी प्रवृत्ति नहीं होती क्यों कि प्रकृति तो हमेशा कली बनाती है प्रकृति को सजाने और सुगंधित करने के लिये।
परंतु सांसारिकता में फंस जाने के बाद उसकी मूल प्रवृत्ति और उसके ऊपर थोपे गये जबरदस्ती के संस्कारों में आपस में टकराव होता है जिसके कारण उनके अंदर दुर्विचारों का जन्म होने लगता है और वह धीरे धीरे ऐसी भावनओं का शिकार होता चला जाता है। यह बात आज की ही नहीं बल्कि शुरूआत से ही होती आ रही है बाप हमेशा से बच्चे को दबाने की कोशिश किया है और बच्चा हमेशा किसी बच्चे का बाप बना है अर्थात् वह भी वही किया है।
प्राकृतिक रूप से तो हर जीव को जो जमीन दी गयी जिस पर उसका सबसे खुबसूरत ईमारत खड़ी होनी थी हमेशा उसके लिये सबसे अच्छी भूमि रही और उस भूमि में उसने उसकी नीव भी रख दिया था परंतु यहां आने पर उसकी नीव को खोद के निकाल दिया गया और उसकी जगह मोह या लालच अहंकार यहां तक की सभ्यता और संस्कृति तक की नीव भर के उसकी ईमारत को कमजोर कर दिया गया और यह निश्चित है की ईमारत की मजबूती और बुलन्दि उसकी नीव की गहराई और मजबूती पर ही निर्भर करती है। यदि वास्तव में अपने आप को बुलन्दियों पर रखने की सोच है तो व्यक्ति को अपनी वास्तविक नीव पर ध्यान देने की जरूरत है। उसकी मजबूती को बनाये रखने की आवश्यकता है न की किसी इस सांसारिक शान शौकत के पीछे खुद को दौड़ाने की।

Parnam swami ji