भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर आयात निर्भरता, वैश्विक संकट और हरित ऊर्जा की भूमिका पर विस्तृत विश्लेषण
मोहित मौर्य।
लखनऊ। ऊर्जा सुरक्षा का मतलब है देश को बिजली, पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और कोयला बिना रुकावट और वाजिब दाम पर लगातार मिलते रहना, ताकि हम दूसरे देशों पर पूरी तरह निर्भर न रहें और किसी भी अंतरराष्ट्रीय तनाव या सप्लाई रुकने पर भी घरों में बत्ती, चूल्हे और कारखाने चलते रहें। पिछले 3-4 सालों में यह मुद्दा बड़ा इसलिए हुआ क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध से तेल-गैस के दाम बढ़े और भारत 85% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है, कोविड के बाद मांग अचानक बढ़ी पर आपूर्ति नहीं, और जलवायु बदलाव के चलते सौर-पवन ऊर्जा की तरफ शिफ्ट मुश्किल है क्योंकि रात को सौर ऊर्जा नहीं बनती और बैटरी महंगी है। इन झटकों से साफ हुआ कि ऊर्जा का पक्का इंतजाम न हो तो महंगाई, बिजली संकट और कारखाने बंद हो सकते हैं, इसलिए यह अब सिर्फ सरकार की नहीं, हर घर की चिंता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की स्थिति मिलीजुली है, जिसे 1 से 10 के पैमाने पर 6.5 दिये जा सकते हैं: कोयले का भंडार और सौर क्षमता में टॉप-4 रैंकिंग मजबूत पक्ष हैं और कुल बिजली क्षमता का 45% से ज्यादा साफ ऊर्जा से आता है, पर 85% कच्चा तेल और 50% से ज्यादा गैस आयात पर निर्भरता सबसे बड़ी कमजोरी है जिससे वैश्विक तनाव का असर तुरंत पेट्रोल-डीजल और LPG पर पड़ता है। इसके अलावा, भारत का ऊर्जा खपत तेजी से बढ़ रही है क्योंकि शहरीकरण, औद्योगीकरण और जीवन स्तर में सुधार के साथ बिजली और ईंधन की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे भविष्य में दबाव और अधिक बढ़ने की आशंका है।
चार मुख्य चुनौतियाँ हैं—पहली, आयात पर भारी निर्भरता; दूसरी, सौर-पवन ऊर्जा का मौसम पर निर्भर होना और बैटरी भंडारण व ग्रिड की कमी; तीसरी, लिथियम-कोबाल्ट जैसे जरूरी खनिजों के लिए चीन पर निर्भरता; और चौथी, रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी की मांग के मुकाबले पुरानी पारेषण-वितरण व्यवस्था से होने वाला नुकसान। इसके साथ ही, वितरण कंपनियों (DISCOMs) की वित्तीय स्थिति भी कमजोर है, जिससे बिजली क्षेत्र में निवेश और सुधार की गति प्रभावित होती है।
तेल और गैस आज भू-राजनीति में “हथियार” बन चुके हैं, जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस ने यूरोप की गैस सप्लाई घटाकर दाम 10 गुना तक बढ़ा दिए ताकि यूक्रेन को मदद रोकने का दबाव बने, और 1973 में अरब देशों ने इजरायल समर्थक देशों को तेल देना बंद कर तेल संकट ला दिया था—इसी असर से भारत में भी दूर के युद्ध के बावजूद LPG और CNG महंगे हो जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक मुद्दा भी बन चुका है।
सिर्फ सौर और वायु ऊर्जा के भरोसे कोई देश सुरक्षित नहीं हो सकता क्योंकि ये मौसम पर निर्भर हैं, रात या बिना हवा में ठप हो जाते हैं; असली सुरक्षा के लिए “ऊर्जा टोकरी” चाहिए जिसमें दिन की बिजली रात में इस्तेमाल के लिए बड़े बैटरी भंडारण, 24×7 चलने वाले परमाणु या जल विद्युत जैसे आधार स्रोत, और मजबूत ग्रिड शामिल हो—सौर-वायु जरूरी हिस्सा हैं, पर अकेले पूरा जवाब नहीं। इसके साथ ही ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) और मांग प्रबंधन (Demand Management) भी उतने ही जरूरी हैं ताकि अनावश्यक खपत को कम किया जा सके।
हरित हाइड्रोजन आज विकल्प बन रहा है क्योंकि इस्पात, सीमेंट, उर्वरक, भारी ट्रक, जहाज और हवाई जहाज जैसे उद्योगों को तेज तापमान और भारी ऊर्जा चाहिए जहाँ सीधे बिजली या बैटरी काम नहीं आती—ये अभी कोयला-तेल-गैस पर चलते हैं और खूब प्रदूषण फैलाते हैं, जबकि सौर-पवन बिजली से पानी तोड़कर बना हरित हाइड्रोजन जलने पर सिर्फ पानी छोड़ता है। भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से इस क्षेत्र में तेजी लाने की दिशा में कदम भी उठाए हैं, जो भविष्य में आयात निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।
अगले 5 साल में ऊर्जा सुरक्षा के लिए सरकार का सबसे बड़ा कदम सिर्फ 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल नहीं, बल्कि शाम 6-9 बजे की पीक डिमांड के लिए मिशन मोड पर कम से कम 100 GW बैटरी स्टोरेज और 50 GW पंप्ड हाइड्रो ज़मीन पर उतारना, स्मार्ट ग्रिड, HVDC लाइन्स और ग्रीन कॉरिडोर से सौर बिजली पूरे देश पहुंचाना, और स्टील-फर्टिलाइज़र-रिफाइनरी में ग्रीन हाइड्रोजन लागू कर तेल-गैस आयात बिल को कम करना होगा। साथ ही, घरेलू तेल-गैस खोज (exploration) को बढ़ावा देना, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को मजबूत करना और ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण (diversification) करना भी जरूरी होगा—क्योंकि 24×7 भरोसेमंद बिजली के लिए स्टोरेज और ट्रांसमिशन ही निर्णायक हैं, सिर्फ सोलर पैनल नहीं।
