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ऋग्वेद से आधुनिक चिंतन तक: सृष्टि, अस्तित्व और ‘वह एक’ की खोज

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भारतीय दार्शनिक परंपरा में सृष्टि के मूल तत्व, आकाश, जल और चेतना पर गहन विचार

हृदयनारायण दीक्षित।

हम सब सोंचते हैं। अनेक प्रश्न उठते हैं। प्रश्न स्वयं को जानने का भी है। संसार और स्वयं का बोध जरूरी है। प्रश्न बड़ा है-कैसे जाने इस असीम संसार को। समझ छोटी अति अल्प और संसार बड़ा। प्रश्न और भी हैं। जैसे सृष्टि क्या है? सृष्टि का कोई निर्माता भी है क्या? यह सृष्टि नहीं थी तो क्या था? जो था वह क्या था? क्या शून्य था? क्या सृष्टि ऊर्जा का खेल है? पृथ्वी जल, अग्नि और आकाश प्रत्यक्ष है। इनका सारभूत क्या हैं? सूर्य चन्द्र और तारागण कहां से प्रकाश पाते हैं? सृष्टि निर्माण का आदि तत्व क्या है? कोई परमतत्व है क्या? क्या एक तत्व से ही यह सृष्टि बनी? या सबका साझा प्रयास यह सृष्टि है? सृष्टि और हमारे सम्बंध क्या हैं? आदि।
आखिरकार अस्तित्व को कैसे जाने? कैसे शांत करें जिज्ञासा को? कठिनाई दूसरी भी है-जितना देखते हैं, उतने का सार तत्व कैसे ग्रहण करें? हमारी जीवन दृष्टि क्या हो? इण्टरनेट ने लाखों करोड़ो सूचनाएं भर दी हैं। किसे छोडे़? किसे पढ़ें? क्या शास्त्र पढें़? पढ़ें तो विवेचन विश्लेषण कैसे करें? जानने के लिए सोचना जरूरी है और सोचने के पहले ठीक से देखना भी। देखने की एक दृष्टि वैदिक पूर्वजों ने दी है। बाद के इतिहास और दर्शन में प्रायः उसी विवेक को आधार बनाया गया है। इस समझ को प्राप्त करने का दुनिया का सबसे पुराना ग्रन्थ है ऋग्वेद। भारत के लोगों ने ऋग्वेद की रचना के पहले से ही वैज्ञानिक चिन्तन प्रारम्भ कर दिया था। ऋग्वेद में इसी सोंच विचार के दर्शन हैं। चिंतन की यह दृष्टि निर्णयात्मक नहीं है। दर्शन और विज्ञान निर्णयात्मक नहीं होते। जहां तक जान लिया, वहीं रूक जाना उचित नहीं होता।
सामान्य धारणा है कि विश्व किसी शक्ति द्वारा बनाया गया है। सृष्टि निर्माण ‘विश्वकर्म’ है। सृष्टि निर्माता को विश्वकर्मा कहा गया है। ऋग्वेद के एक दार्शनिक सूक्त (10.81) के देवता विश्वकर्मा हैं। ऋषि पूछते हैं “सृष्टि निर्माण के पहले वे कहां पर बैठे?” प्रश्न उचित है। जब पृथ्वी, आकाश आदि थे ही नहीं तो विश्वकर्मा ने कहां बैठकर यह सृजन कर्म पूरा किया? पूंछते हैं कि “सृष्टि निर्माण का मूल द्रव्य क्या था? वह वन, वृक्ष कौन सा था? जिससे विश्वकर्मा ने सामग्री ली और विराट विश्व बनाया? यह सब मनीषी लोग जानने का प्रयास करें।” स्तुति है कि “वे विश्वकर्मा मित्र भाव से हमें ज्ञान दें।
ऋग्वेद के एक ऋषि देवताओं के भी पहले का विचार करते हैं कि “देवताओं के पहले युग समय में असत् से सत् का जन्म हुआ।” (10.72) यह युग विचारणीय है। तब देवता भी नहीं हैं लेकिन ‘समय’ है। ऋग्वेद में सत् का अर्थ व्यक्त है और असत् का अव्यक्त। नासदीय सूक्त (10.129) में प्रकृति सृष्टि के सम्बंध में और भी गहन चिन्तन हैं “तब न सत् था और न असत्। आकाश से परे भी कुछ नहीं था-नो व्योमा परो यत्। अंधकार था।” यहां अंधकार प्रकाश का अभाव नहीं है। अंधकार का अस्तित्व है। इसी तरह एक और महत्वपूर्ण अस्तित्व ‘वह एक’ था। ऋषि के अनुसार वह एक-तत् एकं अपनी शक्ति के दम पर वायुहीन दशा में भी प्राण ले रहा था। ऋग्वेद का ‘वह एक’ सृष्टि के पहले भी है। उस समय जल भी है-अप्रकेत सलिलं। फिर काम उत्पन्न हुआ। इसके बाद प्रकाश की दीप्ति चारों ओर फैल गयी। फिर विसृष्टि हुई।” फिर कहते हैं “क्या पता ऊंचे आकाशें में बैठा सृष्टि का अध्यक्ष सृष्टि रचना की बात जानता है? या वह भी न जानता? यह विवरण रोमांचक है। यहां शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया गया है।
क्या अंधकार होता है? या प्रकाश के अभाव का नाम ही अंधकार है। अंधकार सृष्टि के पूर्व भी है। संभवतः आकाश या प्रकाश का सूक्ष्म रूप। ‘वह एक’ बिना वायु ही प्राण ले रहा था। क्या प्राण का विकास वायु हो सकती है। काम का जन्म भी सृष्टि के साथ हुआ। यह ताप या अग्नि ऊर्जा का सूक्ष्म रूप हो सकता है। सबसे अंत में है-विसृष्टि। विसृष्टि-सृष्टि है, इसमें पृथ्वी भी है। भारतीय चिंतन में आकाश सूक्ष्मतम है। आकाश से वायु, वायु के बाद अग्नि, इसके बाद जल और फिर पृथ्वी। सृष्टि का विकास किसी एक तत्व से हुआ है। यहां आकाश प्रमुख तत्व है। कपिल के सांख्य दर्शन मंे आकाश प्राचीनतम है। भारतीय चिन्तन के पांच महाभूतों में से प्रथम।
भारतीय दर्शन में असीम आकाश का गुण शब्द है। आकाश का अस्तित्व है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार “सभी भूत आकाश से पैदा होते हैं और आकाश में ही विलीन हो जाते हैं।” आकाश से आना और आकाश में ही लौटना विचारणीय है। ऋग्वेद में ठीक ही आकाश पिता है। ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में ‘पुरूष’ का वर्णन है। यह ‘पुरूष’ देश-काल की सीमा का अतिक्रमण करता है। उसका सिर आकाश है और सहस्त्रशीर्षा है। इस पुरूष के प्राण का विस्तार वायु है। पुरूष समूचे अस्तित्व को घेरता है। दश अंगुल इसके बाहर भी हैं। संपूर्ण संसार इसका एक चरण है। इसके तीन चरण अन्य लोकों में हैं। यहां जो कुछ चेतन या अचेतन मनुष्य, पशु, कीट, पतिंग, नदी, समुद्र या वन है। पुरूष सब में व्याप्त है। यहां तक हुआ दिक् या दिशा का अतिक्रमण। अब काल। बताते हैं कि यह पुरूष ही सब कुछ है-पुरूष एवेदं सर्वं। जो भूतकाल में हो गया है और जो आगे भविष्य में होगा वह सब पुरूष ही है-यद् भूतं यच्च भव्यं।
ऋग्वेद के एक देवता हैं अदिति। अदिति भी सर्वस्व धारण करते हैं। वह अंतरिक्ष है, पृथ्वी हैं। पिता माता और पुत्र है। वे पांच जन हैं। अब तक जो हो चुका है और जो भविष्य में होगा वह सब अदिति ही हैं। समूचे अस्तित्व को एक देखना और स्वयं को उसी का भाग जानना भारतीय चिंतन की मूल भूमि है। यहां अस्तित्व या सृष्टि का कोई निर्माता नहीं। प्रकृति के गोचर प्रपंच गतिशील हैं। सम्यक गति से प्रगति होती है। प्रकृति का वैज्ञानिक अध्ययन भी मूलतः गति का ही अध्ययन है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक थेल्स (लगभग 500 ई0पूर्व) जल को सृष्टि का आदि तत्व मानते थे। इसके हजारों वर्ष पहले ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में “अप्रकेत सलिल”-जल है। जल से सृष्टि का जन्म हुआ तो जल को माता कहना ही चाहिए।
ऋग्वेद में जल को “बहुवचन रूप में आपः मातरम्-जल माताएं कहा गया है। स्थावर जंगम को जन्म देने वाली यही जल माताएं ही हैं।” थेल्स जल सम्बंधी चिन्तन ऋग्वेद के संगत है। वैसे ऋग्वेद में अनेक विचार हैं। एक यूनानी दार्शनिक अनक्सिमेनेस ‘वायु’ को सृष्टि का मूल तत्व बताते थे। ऋग्वेद (10.168) में ऋतावा-नियम वायु है। यहां वायु जलों के मित्र कहे गये हैं-अपां सखा। ऋग्वेद के जल और वायु आदि तत्व इसी रूप में उपनिषदों में भी हैं। हिराक्लिटस अग्नि को प्रधान तत्व जानते थे। अग्नि ऋग्वेद के प्रधान देवता हैं। अग्नि सब जगह हैं। वे जलों में हैं। मनुष्य के भीतर हैं। यत्र तत्र सर्वत्र हैं। कठोपनिषद् में यम ने नचिकेता को अग्नि विज्ञान समझाया था। यहां अग्नि ही प्रत्येक जगह उपस्थित होकर रूप-रूप प्रतिरूप होते हैं-अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपों वभूवाः। जानने और गहराई से देखने समझने के एकात्म चिंतन की जन्मभूमि भारत ही है।

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