भारतीय दर्शन में वर्ण व्यवस्था: जन्म नहीं, कर्म और विचारों पर आधारित अवधारणा
कामेश।
लखनऊ। समाज में वर्ण व्यवस्था सदियों या यूं कह लें कि युगों पुरानी व्यवस्था है। समाज चार वर्णों में बांटा गया था। ये देखते हुए कि कौन व्यक्ति किस तरह के जीवन में अधिक रूचि रखता है। व्यक्ति के सोच विचार के अनुसार ही वर्ण व्यवस्था बनाई गई थी। वर्ण का शाब्दिक अर्थ है रंग। अर्थात समाज में चार रंग के लोग हैं चार तरह के लोग हैं।
रंग का तात्पर्य शारीरिक नही बल्कि वैचारिक है। और वे चार वर्ण हैं। ब्राह्ममण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। ये व्यवस्था यूं तो युगों पहले बनाई गई थी पर आज के वैज्ञानिक ने भी सोध किया जब वर्ण व्यवस्था पर तो यही पता चला कि समाज चार तरह के लोग जीते हैं। जो कि अपना जीवन अपनी सोच के अनुसार उसी श्रेणी के तहत ही जी पाते हैं। कुछ लोग होते हैं जो बुद्धि में जीते हैं, गहन सोच विचार अध्ययन में अपना मस्तिष्क लगाते हैं। ऐसे लोग ब्राह्ममण, कुछ होते हैं जो भुजाओं मे अर्थात शक्ति ताकत में विश्वास रखते हैं वे क्षत्रिय। कुछ धन पद प्रतिष्ठा मे जावन जीना चाहते हैं वे वैश्य और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी न कोई सोच है ना कुछ पाना है बस जो कुछ भी मिला खाए-पिए और जी रहे हैं ऐसे लोग शूद्र। और यदि खुद से अध्ययन किया जाए तो यही तथ्य मिलता है कि समाज ये इसी तरह के लोग हैं वैसे तो आज के सामाजिक स्थिति पर यदि गहन अध्ययन किया जाए तो देखने में मिलता है कि वैश्य की संख्या अधिक है। क्योंकि लोग अधिकतर धन वैभव और पद प्रतिष्ठा के लिए ही जैसे जी रहे हैं।
जन्म से कोई भी न तो ब्राहमण है न कोई क्षत्रिय न वैश्य न शूद्र। बल्कि ये सब अपने विचार सोच पर निर्भर करता है। जैसा कि मनु स्मृति मे भी उल्लेख आता है। जन्मना जायते शूद्रः आचारात् द्विजम् उच्चते। अर्थात जन्म से सभी शूद्र हैं। अपने आचरण और सोच से ही सभी ब्राहमण क्षत्रिय, वैश्य बनते हैं। सच है कि जन्म के समय कोई भी व्यक्ति किसी भी सोच विचार और चाहत से परे होता है वह तो सिर्फ पैदा होता है। उसे मरने की भी चिन्ता नहीं होती। ताकत, धन, पद, पण्डित्य से क्या मतलब। परन्तु धीरी-धीरे जैसे वह उम्र के पड़ाव को पार करना शुरु करता है तब उसे अपनी इच्छाओं के अनुसार ही विभिन्न चार वर्णों मे एक वर्ण का ही हो जाता है।
जब भी किसी विधा या स्थिती का निर्माण होता है तो धीरे-धीरे समय बीतने पर उसमें सकारात्मक ओर नकारात्मक परिवर्तन भी अवश्य ही होता है और यही परिवर्तन इस सोच रूपी वर्ण व्यवस्था मे भी आया। जिसका विकृत स्वरूप आज हमारे बीच वर्णों से विखर कर विभिन्न धर्म जाति सम्प्रदाय और नाना प्रकार की उप जातियों के रूप ये विघटित होता चला गया। जिसका नकारात्मक स्वरूप हमारे समाज मे एक नासूर सा बन गया है। जहां ये चार वर्ण व्यक्ति को अपना कार्य सुचारू रूप से करने की सुव्यवस्थित प्रेरणा देते थे आज यही विकृत रूप मे सुव्यवस्था को अव्यवस्था के खतरनाक पड़ाव पर ला कर खड़ा कर दिया है।
आज हमारा समाज इस विकृति स्वरूप के चंगुल मे इस कदर फंस चुका है कि हम इससे निकल ही नही पा रहे हैं। हमारी संस्कृति सभ्यता और सबसे दुःखद स्थिति मे हमारी शासन व्यवस्था की हो गई है। सारी शासन प्रणाली पर इसका करारा घात है। पूरी राजनीति सामाजिक व्यवस्था ही जातिवाद और धर्मवाद पर होने लगी है। और हास्यास्पद तो तब लगता है जब कानून संविधान मे भी जातिय आधार पर कार्य किये जा रहे हैं। संविधान मे भी इसका आधार बना कर आरक्षण की व्यवस्था तक कर दी गई।
आज के परिवेश मे विचार भावना पर नही बल्कि जन्म और कुल के आधार पर जाति और धर्म व्यक्ति के ऊपर जबरदस्ती थोप दिये जा रहे है, जिसकी सोच वह नही है उसे भी अपनी सोच भावना को दबा कर वही करना पड़ रहा है जो वंशानुगत हो गया है। आज वर्ण व्यवस्था का स्थान ही समाप्त हो गया और वंश व्यवस्था अपना अपना स्थान बना ली है। और यही कारण है कि आज की सुव्यवस्था निरन्तर पतन की ओर बढ़ती चली जा रही है।
वर्ण व्यवस्था का सकारात्मक रूप यदि देखें एक सुव्यवस्था स्वतः झलकती है। क्योंकि तब जिसके अन्दर प्राकृतिक रूप से जो मूल गुण होगें वह वही कार्य करता और जिसके मूल गुण जो हो उसके अनुसार कार्य करेगा तो निश्चित ही वह कार्य वह सबसे अच्छा और रूचि पूर्ण करेगा। और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य जो है वो कि वर्ण व्यवस्था के माध्यम से समाज को जो चार आयाम दिये गए थे इसका मूल उद्देश्य ही यही था कि कोई किसी दूसरे के कार्य छेत्र मे हस्तक्षेप ना करे और सभी अपना ही कार्य करें।
अब हम बात करते हैं उस परम कर्तव्य जो कि वर्ण व्यवस्था से भी परे है। जिसके लिए किसी विचार विशेष या वर्ण विशेष का होना कोई मायने नही रखता है। जिसके लिए मानव होना ही काफी है। जिसके ऊपर किसी का न बस चलता है और न ही कभी चल पाएगा। जो समय परिस्थिति और समस्त बाधाओं से परे है और वो है परमात्म साक्षात्कार या यूं कह ले कि इस ज्योति सत्ता का परमप्रकाश सत्ता मे विलीन की अवस्था। अभी तक हमारा समाज ये मानता चला आ रहा कि ब्राहमण ही परमात्मा के अति नजदीक होता है वही परमात्मा का दर्शन अधिकारी है परन्तु ऐसा नही क्योंकि जब उसी परमसत्ता से सबका अवतरण हुआ तो निश्चित ही हम सभी उसके उतने ही अधिकारी हैं जितना कोई एक विधा का व्यक्ति। परन्तु जरूरत होती है अपनी सोच अपने भाव को सकारात्मक दिशा देने की और वह दिशा किसी वर्ण विशेष या स्थान विशेष के माध्यम से नही बल्कि हम जहां है जिस अवस्था मे है वही से अपनी दिशा उस परम की तरफ मोड़ सकते है और खुद को उस परमसत्ता मे लीन कर सकते हैं।
ब्राहमण का कार्य ही है सोच विचार। और जब ब्राहमण अपनी सोच को उस दिशा की तरफ मोड़ देता है तो वह उस तक पहुच जाता है। उसका कार्य ही है कि वह उसी पर क्रिया करे परन्तु विकृत स्वरूप है कि अधिकतर मौकों पर ब्राहमण पण्डित मे उलझ जाता है और अपनी सोच को तर्को में उलझा देता है। लेकिन उसके पास सोचने और गहन गम्भीरता की जो विधा है यदि वह इसे सही दिशा दे पाता है तो वह उसके लिए सबसे आसान होता है। परन्तु हो नही पाता लगभग निन्यानवे मौकों पर ब्राहमण अपनी बुद्धि से पण्डित हो जाता है और कभी कोई ब्राहमण सदियों में याज्ञवल्य अष्टावक्र हो पाता है।
क्षत्रिय भी हमेशा भुजाओं में विश्वास रखता है उसके पास लड़ने की क्षमता है वह मारना भी जानता है और जो लड़ सकता है, मार सकता है, वह मर भी सकता है। तो यदि क्षत्रिय इसी मारने की कला को सही दिशा देता है तो वह एक दिन अहंकार को मार देगा, क्योंकि तलवार चलाने की कला उसे पता है और जो तलवार वह दूसरो की गर्दन पर चलाता आया जब एक दिन वह अपने अहंकार पर चला देता है तो वही क्षत्रिय बुद्ध महावीर बन जाता है।
इसी तरह वैश्य की सारी खोज धन की होती है उसे खोजने और व्यापार की कला पूरी तरह मालूम होती है जब वह अपने धन खोजने की कला को दिशा देता है और परम धन की खोज मे लग जाता है तो वह एक दिन पलटू दास, गोरख हो जाता है। धन की खोज करते वह एक दिन ब्रह्म की खोज कर लेता है। क्योंकि खोज करने की उसे अद्भुत कला मालूम है। और शूद्र जिसकी कोई खोज नही, कोई चाहत नही, वह तो और भी आसान सहज होता है। क्योंकि उसे न तर्क करना है न लड़ना है, न खोजना है, उसे तो सिर्फ ये सोच लेना है कि परमात्मा तू जाने किधर जाना है। नदी मे बहते सूखे पत्ते की भांति सिर्फ बह जाना है, एक दिन स्वतः सागर तक पहुच ही जाएगा परन्तु ज्यादातर पत्ते भी किनारे लग जाते हैै। इसलिए सही धार और दिशा शूद्र को मिल गई तो वह भी एक दिन रैदास दादू कबीर बन जाता है।
अर्थात वर्ण व्यवस्था जीवन जीने की कला तो है। यदि इसे सभी विकृतियों से बचा लिया जाए और अपनी सोच को सही दिशा और सही आयाम दिया जाए तो सारे मार्ग हमें प्राकृतिक रूप से उसी परम सत्ता की तरफ ले जाने के ही सुव्यवस्थित मार्ग प्रशस्त करते हैं।
लेखक परिचय: कामेश
कामेश सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विषयों पर चिंतनशील लेखन करने वाले लेखक हैं। उनकी लेखनी भारतीय दर्शन, परंपराओं और समाज व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को सरल एवं विचारपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है। वे अपने लेखों के माध्यम से सामाजिक मूल्यों, मानवीय चेतना और आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर पाठकों को विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।
