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खेती की नई चुनौतियों पर वैज्ञानिकों ने किया मंथन

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  • छठवीं उ.प्र. कृषि विज्ञान कांग्रेस के दूसरे दिन सात विभिन्न तकनीकी सत्रों का किया गया सफल आयोजन
  • तकनीकी सत्रों में प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य, जलवायु सहिष्णु फसल और उद्यमशीलता पर दिया गया विशेष जोर
  • कृषि में मार्केटिंग, वैल्यू एडीशन और ‘खेत एक फसल अनेक’ के सिद्धांत को अपनाने की महत्वपूर्ण संस्तुतियां

लखनऊ। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में “विकसित कृषि विकसित भारत @2047 के लिये कृषि में परिवर्तन” विषय पर आयोजित की जा रही छठवीं उ.प्र. कृषि विज्ञान कांग्रेस के दूसरे दिन सात विभिन्न तकनीकी सत्रों का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इन सत्रों में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, कृषि व्यापार के स्थान पर कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने और छात्रों को नौकरी के बजाय उद्यमिता की ओर प्रेरित करने पर विस्तृत विमर्श के उपरांत महत्वपूर्ण संस्तुतियां दी गईं। कृषि में मार्केटिंग, वैल्यू एडीशन तथा पैकेजिंग पर विशेष ध्यान देने और “खेत एक फसल अनेक” का सिद्धांत अपनाने पर भी जोर दिया गया।
द्वितीय दिवस पर आयोजित सात तकनीकी सत्रों में मुख्य रूप से जलवायु अनुकूल फसलों की किस्मों के विकास के लिए एकीकृत तकनीक, फसलों में जैविक तनाव (पौधों की बीमारियों तथा कीटों एवं नेमाटोड्स) का प्रबंधन, उच्च उत्पादकता के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और फार्म मशीनीकरण जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त, शुष्क क्षेत्रों में छोटे किसानों के लिए नवीन बीज प्रणाली, द्वितीयक कृषि, मूल्य संवर्धन और पोषण, तथा खाद्य सुरक्षा, ट्रेसिएबिलिटी, व्यापार और नीतियों पर भी विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि अगली पीढ़ी की तकनीकों में कृषि को अधिक उत्पादक, सुरक्षित, पूर्वानुमानित, सटीक और लाभकारी बनाने की अपार क्षमता है।
विशेषज्ञों द्वारा गन्ना उत्पादन आधारित प्रणाली अपनाने पर जोर दिया गया जिसमें प्राकृतिक एवं जैविक खेती के अंतर्गत गन्ने के साथ हल्दी, मूंग, काली मिर्च और अजवाइन की अंतः फसल लेने को अत्यधिक लाभकारी बताया गया। मृदा स्वास्थ्य को समृद्ध करने और कार्बनिक कार्बन को पुनर्जीवित करने के लिए फसल प्रणाली में गन्ने का समावेश, उचित अवशेष प्रबंधन तथा जैव-उर्वरक आधारित समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की संस्तुति की गई, जिससे गन्ना उत्पादन की उत्पादकता एवं लाभप्रदता में वृद्धि हो सके। इसके साथ ही, कार्बन क्रेडिट का लाभ लेने के लिए प्रोटोकॉल विकसित करने तथा भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग एवं सत्यापन प्रणाली के विकास के लिए अनुसंधान कार्य प्रारंभ करने पर बल दिया गया। पुनर्योजी कृषि को प्रोत्साहित करने तथा प्रणाली की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जलवायु सहनशील एवं स्थान विशिष्ट समेकित कृषि प्रणाली का विस्तार करने की बात भी कही गई। लवण प्रभावित मृदा के सुधार एवं प्रबंधन के लिए सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया ताकि सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति और प्रतिकूल परिस्थितियों में फसल उत्पादकता बढ़ाई जा सके।
कृषि उत्पादकता के साथ-साथ पोषण और खाद्य प्रसंस्करण पर जोर देते हुए यह बताया गया कि बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए बेबी फूड मिक्स में बीटा कैरोटीनयुक्त निर्जलित गाजर पाउडर, फ्रीज-ड्राइड आम पाउडर और अमरूद का पाउडर मिलाया जाना चाहिए। विटामिन और आयरन की पूर्ति के लिए आयरन-समृद्ध आंवला कैंडी, पके व कच्चे आम से तैयार मैंगो बार तथा जामुन बार के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया। बुंदेलखंड क्षेत्र के लोगों की पोषण व सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए करौंदा की टूटी-फूटी का उपयोग प्रसंस्कृत उत्पाद के रूप में बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया, जिससे फसल तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश की परिस्थितियों में किनोवा उत्पादन की संभावनाओं के दृष्टिगत इसे बढ़ावा देने, पोषक तत्वों से भरपूर व जलवायु सहिष्णु जंगली धान तथा स्थानीय किस्मों (लैण्ड रेसेस) को संरक्षित करने, और जीन बैंक संग्रह में पुनरावृत्ति रोकने के लिए जीनोटाइपिंग को बायोइन्फोर्मेटिक्स विश्लेषण के साथ संयोजित करने की अहम संस्तुति भी दी गई।

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