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अंधविश्वास पर विश्वास

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हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ। अमेरिका सारी दुनिया को पंथनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाता रहता है। लेकिन वर्तमान अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के संदर्भ में एक विचित्र प्रवृत्ति सामने आ रही है। इस युद्ध को कुछ लोग सीधे धार्मिक भविष्यवाणियों और अंधविश्वास से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार जोनाथन लार्सन द्वारा अमेरिकी सेना के भीतर मजहबी कट्टरवाद और सैनिक अधिकारियों द्वारा बाइबल की भविष्यवाणियों के प्रयोग का प्रश्न उठाया गया है। मिलिट्री रिलिजियस फ्रीडम फाउंडेशन को ऐसी 110 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं। शिकायतें 30 से ज्यादा सैनिक ठिकानों और 40 इकाइयों से जुड़ी हैं।
कुछ कमांडरों पर आरोप है कि वे ईरान के साथ संभावित युद्ध को ईश्वर की दिव्य योजना बता रहे हैं। यीशु की वापसी का विश्वास है। युद्ध को यीशु की वापसी मार्ग भी कहा जा रहा है। शिकायत करने वालों में केवल नास्तिक ही नहीं बल्कि ईसाई, मुस्लिम और यहूदी सैनिक भी शामिल हैं। उनका कहना है कि ऐसी बयानबाजी सैनिक एकता और संविधान की शपथ दोनों का उल्लंघन करती है। अमेरिका में सैनिक अनुशासन के स्पष्ट नियम हैं। अमेरिकी सेना में धर्म प्रचार की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद अंधविश्वास से जुड़ी शिकायतें बढ़ रही हैं। सेना की चिंता है कि कुछ कमांडर मजहबी संदर्भों का दुरुपयोग कर रहे हैं। वे युद्ध को पवित्र और अनिवार्य सिद्ध करने के लिए धार्मिक ग्रंथों का सहारा ले रहे हैं।
लार्सन की रिपोर्ट में उल्लेख है कि एक कमांडर ने नॉन-कमीशंड अधिकारियों को संबोधित करते हुए ईरान युद्ध को बाइबल की भविष्यवाणियों से जोड़ दिया। कमांडर ने कहा कि प्रभु यीशु ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अभिषेक किया है कि वे ईरान में अग्नि प्रज्वलित करें, जिससे आर्मगेडन प्रारम्भ हो और पृथ्वी पर यीशु की वापसी का मार्ग प्रशस्त हो। एक अन्य सैनिक ने बताया कि उनकी यूनिट ईरानी युद्ध क्षेत्र से दूर है, फिर भी वहां इसी प्रकार का कट्टरपंथी संदेश दिया गया। एक एनसीओ ने लिखा है कि कमांडर को नेताओं ने सैनिकों तक यह संदेश पहुँचाने के लिए कहा कि यह युद्ध ईश्वर की दिव्य योजना का हिस्सा है। उन्होंने बाइबल के ‘बुक ऑफ रेवलेशन’ का संदर्भ देते हुए आर्मगेडन और यीशु की वापसी से जुड़े प्रसंग दोहराए हैं।
युद्ध प्रत्यक्ष मानवीय कार्यवाही है। परिस्थितियों के कारण ही युद्ध जैसे कर्म संभव होते हैं। भू-सामरिक कारण युद्ध को बढ़ाते या घटाते हैं। युद्ध में ईश्वर को घसीटना उचित नहीं है। युद्ध और बर्बरता ईश्वर की योजना का परिणाम नहीं होते। शिकायत करने वाले एनसीओ ने ठीक चेतावनी दी है कि ऐसे अंधविश्वासी वक्तव्य उचित नहीं होते। ऐसे वक्तव्य साहस और एकजुटता को नष्ट करते हैं। संविधान की रक्षा की शपथ का उल्लंघन भी करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी सेना में मजहबी कट्टरवाद और बाइबल की भविष्यवाणियों के प्रयोग पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।
बाइबल में अंत समय और आर्मगेडन की भविष्यवाणियों का उल्लेख है। आर्मगेडन शब्द बाइबल की ‘बुक ऑफ रेवलेशन’ में आया है। यह धारणा अच्छाई और बुराई के बीच होने वाले अंतिम युद्ध से जुड़ी है। अनेक ईसाई मानते हैं कि आर्मगेडन का युद्ध ईसा मसीह की पृथ्वी पर दूसरी वापसी का संकेत होगा, जब वे बुराई को पराजित कर शांति स्थापित करेंगे। कुछ व्याख्याओं में वर्तमान युद्ध और अशांति को भी ईश्वर की योजना का हिस्सा माना जाता है, ताकि भविष्यवाणी पूरी हो सके। सैनिकों की चिंता यह है कि कुछ कमांडर इन धार्मिक संदर्भों का उपयोग युद्ध को पवित्र या अनिवार्य सिद्ध करने के लिए कर रहे हैं। यह सैन्य अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।
इतिहास में तथ्य हंै कि जब-जब युद्ध को धर्म का आवरण मिला है, तब-तब उसका स्वरूप अधिक क्रूर और बर्बर हुआ है। मध्यकालीन यूरोप के धर्मयुद्ध इसका उदाहरण हैं। धर्म के नाम पर लड़े गए युद्धों में लाखों लोग मारे गए, नगर उजड़ गए। सभ्यताओं को भी गहरी चोट पहुंची। युद्ध की ज्वाला जब धार्मिक आवेश से जुड़ जाती है तो विवेक का स्थान उन्माद ले लेता है।
आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा इसी अनुभव से विकसित हुई। आधुनिक लोकतंत्रों ने राज्य और धर्म को अलग रखने की व्यवस्था बनाई कि युद्ध जैसे निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर लिए जाने चाहिए। अंधविश्वास के आधार पर लिए गए निर्णय उचित नहीं होते। अमेरिका स्वयं को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का अग्रदूत मानता है। उसकी सेना संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेती है, किसी धर्मग्रंथ के प्रति नहीं। इसलिए अमेरिकी सेना में धार्मिक प्रचार या कट्टरता को लेकर उठ रही शिकायतें चिंताजनक हैं।
पश्चिम एशिया की राजनीति में प्रयुक्त भाषा पर भी विचार आवश्यक है। हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से एक टिप्पणी आई कि “यहूदियों ने बहुत बड़ी गलती कर दी।” यह कथन भी मजहबी है। यह गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकता है। किसी राज्य की नीति या कार्रवाई की आलोचना एक बात है, लेकिन उसे किसी पूरे धार्मिक समुदाय से जोड़ देना दूसरी बात है। उचित यह होता कि कथन इस प्रकार होता कि “इजराइल ने बहुत बड़ी गलती कर दी।” अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भाषा का संयम अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी राष्ट्र की नीति की आलोचना और किसी धार्मिक समुदाय के प्रति आरोप में स्पष्ट भेद होते हैं।
युद्ध का निर्णय अत्यंत गंभीर राजनीतिक और सामरिक निर्णय होता है। इसके पीछे कूटनीति, रणनीति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समीकरण जैसे अनेक तत्व महत्वपूर्ण होते हैं। धार्मिक भविष्यवाणियों को निर्णायक मानने से विवेकपूर्ण निर्णय प्रक्रिया विकृत हो जाती है। सैनिकों का मनोबल भी प्रभावित होता है। सैनिक किसी धर्मयुद्ध के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र की रक्षा के लिए लड़ते हैं।
आधुनिक विश्व पहले ही अनेक मजहबी पंथिक संघर्षों से जूझ रहा है। पश्चिम एशिया इसका बड़ा उदाहरण है। यदि महाशक्तियों की सेनाओं में भी धार्मिक कट्टरता का प्रभाव बढ़ने लगे तो अंतरराष्ट्रीय शांति और अधिक संकट में पड़ सकती है। इसलिए अमेरिकी समाज और सेना के भीतर उठ रहे ये प्रश्न केवल आंतरिक अनुशासन का मामला नहीं हैं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय भी हैं।
युद्ध के समय संयम और विवेक की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। सैनिक नेतृत्व का दायित्व है कि वह अपने अधीनस्थों को एकजुट रखे, उनके भीतर पेशेवर अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा की भावना मजबूत करे। नेतृत्व को पंथिक व्याख्याओं से युद्ध को पवित्र बताने से बचना चाहिए। यह सैन्य व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत है।
युद्ध मानवीय विफलता का प्रतीक है। किसी दिव्य योजना का परिणाम नहीं। सहअस्तित्व और संवाद ही स्थायी समाधान के मार्ग हैं। युद्ध को ईश्वर की योजना बताने से हिंसा के लिए एक नया नैतिक औचित्य तैयार होगा। यह मानवता के लिए घातक है।
युद्ध और पंथिक विश्वास के बीच स्पष्ट दूरी आवश्यक है। सैन्य संस्थाओं को अपने मूल पंथनिरपेक्ष अनुशासन को कठोरता से लागू करना चाहिए। पंथिक अंधविश्वास विवेकपूर्ण नहीं होते।

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