मानव की खोज
कामेश।
लखनऊ। पानी का स्वभाव है बहना, वह हर स्थिति में बहता ही रहता है और उसका लक्ष्य है बहते हुए जा कर सागर से मिलना और वह निरन्तर अबाध गती से बहते हुए एक दिन सागर से अवश्य मिलता है। उसे न किसी मार्ग की जरूरत है न ही किसी संसाधन की। मार्ग और संसाधन कभी भी किसी भी लक्ष्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है बस उसका लक्ष्य एक ही निर्णय पर अटल है और स्वभाव अपरिवर्तनीय है। पानी के रास्ते में अनेकानेक बाधाएं आती है पर वो अपना लक्ष्य नहीं भूलता रास्ते खुदबखुद बनते चले जाते हैं और इस तरह वह एक दिन सागर से मिल ही जाता है।
पानी जिस तरह से तब तक गतिमान रहता है अशान्त रहता है जब तक सागर से नहीं मिलता ठीक उसी प्रकार जीव प्रकाश भी जब तक परम प्रकाश से नहीं मिल लेता तब तक अशान्त ही रहता है। विभिन्न संसाधनों के माध्यम से लोग लक्ष्य बनाते हैं उन चीजों को पाने के लिए वास्तव में जो इस जीव प्रकाश की मांग है ही नहीं। कितनी अजीब बात है कि धन इकट्ठा करना मनुष्य अपना लक्ष्य मान बैठा है और इसके लिए नाना प्रकार के संसाधन की खोज कर लिया है। जब कि इसका जो वास्तविक लक्ष्य है उस तक पहुंचने के लिए इसे न किसी संसाधन की जरूरत है न धन दौलत की। वास्तव में तो इन्सान अपनी वास्तविक इच्छा और उद्देश्य ही भूल बैठा है। इसे तो ये भी नहीं पता कि आखिर हम इस विराट प्रकृति का एक हिस्सा है तो आखिर क्यों। क्या प्रकृति ने वास्तव में हमें सिर्फ इसलिए जन्म दिया है कि हम मात्र एक परिवार के पालन पोषण में धन कमाने में ही अपना जीवन व्यतीत कर दें। क्या उसकी यही इच्छा है कि इन्सान उसके विस्तार और सौन्दर्य की भूल कर भौतिकवादिता का विस्तार करे। या मात्र अपने कुछ निजी स्वार्थपूर्ती के लिए जीवन भर भटकता रहे।
ये जीव प्रकाश उस परम प्रकाश का एक हिस्सा है और यह किसी विशेष उद्देश्य पूर्ती के लिए ही यहां जन्म लिया है और वह परम प्रकाश अपेन जिस अंश को जिस हेतु यहां भेजा है निश्चित ही वह उससे वह उद्देश्य पूरा करवाएगा। बेशक इंसान वह कार्य करने की भावना को भुला बैठा है। परन्तु उसने नहीं भूला और तब तक वह जीव प्रकाश को इसी जगह रखेगा जब तक कि उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता एक बार नहीं बार-बार जन्म लेना होगा और तब तक लेना होगा जब तक अपना वह वास्तविक कार्य पूरा नहीं कर लेता। उसी तरह जैसे पानी बार-बार नदी नालों में तब तक गिरता रहता है जब तक वह सागर की यात्रा पूरी नहीं कर लेता और शान्ती तो आखिर तभी मिल सकती है जब वह अपने लक्ष्य तक पहुंच ही नहीं रहा तो भला उसका मन शान्त कैसे हो सकता है भूल तो वहां से ही शुरू हो जाती है जब हम सामाजिक रिति-रिवाज और प्रबन्धनों के अंतर्गत अपना जीवन जीना ही अपना सत्य कर्म और कर्तव्य मान बैठते हैं। और जीवन भर उन्ही परम्पराओं को बोझ की तरह ढोते फिरते हैं और ऐसा कर हम खुद को गौरवशाली समझते हैं। मगर हम परम्पराओं के बस में हम अपनी मूल प्रकृति और मूल कर्तव्य को भूला बैठे हैं।
आज हम जिन्हें अपना लक्ष्य मानकर दिन रात हाड़-तोड़ मेहनत करते है। और गर्व महसूस करते हैं। कि बहुत मेहनत किए लोग भी बड़े सम्मान से कहते हैं कि वह बहुत मेहनती आदमी है। वास्तव में देखा जाए तो मेहनत तो उसकी मूर्खता का परिणाम है। क्योंकि वास्तव में मेहनत करने की जरूरत ही कहां है। मेहनत करने के दो तरीके हैं। जैसे एक जगह बीस फिट गडढा खोदने से पानी निकलता है परन्तु वह मेहनत का काम है पर पानी निकालने के लिए बीस की जगह तीस फिट भी गड्ढा खोदा गया और पानी नहीं निकला और बाद में देखा गया तो गड्ढा बीस फिट गहरा नहीं बल्कि तीस फिट लम्बा खोदा गया था। यही हमारी मेहनत है।
हम मेहनत तो करते हैं मगर उस दिशा में करते हैं जहां लक्ष्य की पूर्ति होनी ही नहीं होती है हम पहाड़ खोदने और मिटाने का काम करते हैं। और सोचते हैं बड़ी मेहनत किए। जरूरत गडढ़ा खोदकर पानी पीने की नहीं है उसके लिए प्रकृति ने नदियों की व्यवस्था कर रखी है जरूरत पहाड़ तेाड़ कर रास्ता बनाने की नहीं उसके लिए तो मैदान है मगर हम वही कार्य करते हैं जो हमे नहीं करना है। हमारा जन्म हमेशा उसी परिवेश में होता है जहां हमारा सबसे अच्छा विकास हो सकता है मगर हम अपनी जन्म स्थली से दूर जाना चाहते हैं पहाड़ों के पास समुद्रो को लांघना चाहते हैं हम हमेशा वही काम करते हैं जिसमें हमें निरर्थक कि मेहनत करनी पड़े और सोचते हैं बहुत बड़ा काम कर लिए ये सबसे बड़ी मुर्खता तो तब दिखाई देती है जब तक देश दुसरे देश से युद्ध करता है मात्र इसलिए कि जमीन तुम्हारी नहीं मेरी है। सत्ता कानून तुम्हारा नहीं हमारा चलेगा । क्या इसीलिए प्रकति ने सृष्टि का विस्तार किया । शायद वो कभी सोची भी नहीं होगी की हमारे कुछ प्राणी ऐसे होंगे जो अपनी ही जमीन के लिए आपस में ही युद्ध करेंगे।
उसने तो प्राणियों केा मृदा विस्तार और प्रकृति सुव्यवस्थित करने के लिए पैदा किया और लगभग सभी प्राणी उसी अनुसार क्रियाशील भी हैं। परन्तु मनुष्य अपने इस कार्य को न कर के उस कार्य को कर रहा है जो उसका है ही नहीं जो उसे करना ही नहीं है। प्रकृति में वो सारे संसाधन मोजूद है जिनसे प्रकृति का विस्तार और संतुलन बना रहे परन्तु मानव एक संसाधन को दूसरे से मिला कर तीसरे की उत्पत्ती करने की कलाकारी करने लगा। धरती के नीचे से भी खनिज पदार्थों को खोद कर जलाने में लगा है। कोयला, पेट्रोलियम जो कि धरती का सन्तुलन बनाने के लिए अन्दर दबे पड़े है उन्हें खींच कर आग जला रहा है। और मजे की बात तो ये हे कि खुद पदार्थों को जला रहा और खुद प्रदुषण दूर करने की बात करता है। सोचने की बात है कि यदि इन सारे पदार्थों को इनके अनुसार छोड़ दिया जाय और इनके साथ किसी भी प्रकार की छेड़खानी न की जाए तो क्या कभी प्रदुषण बढ़ सकता है।
प्रकृति में तो प्रदुषण है ही नहीं और जहां होती भी है गन्दगी वहां उस गन्दगी को खत्म करने के लिए प्रकृति उसमें खुद कीड़े पैदा कर देती है जो कि उस गन्दगी को खा कर उसे मिट्टी बनाते है। परन्तु यह तभी सम्भव है जब हर प्राकृतिक अवस्था अपने अनुसार चल सके परन्तु मानव अपने खुराफाती दिमाग से पदार्थों का दुरूपयोग करके सारी प्रकृति का सन्तुलन बिगाड़ के रख दिया है और चाहता है कि प्रकृति प्रदुषण मुक्त हो। भला इंसान की क्या मजाल कि ये किसी पदार्थ का वास्तविक निर्माण कर सके परन्तु ये विभिनन पदार्थों को मिला कर तोड़-फोड़ कर तीसरी अप्रकृतिक वस्तु का निर्माण करने में लगा है और प्रकृति का नुकसान कर रहा है और ऐसा करने में खुद को वैज्ञानिक समझता है खुद को मेहनती मानता है।
मानव प्राणी का जन्म जिस क्रिया के लिए हुआ है उसे यह भूल बैठा है, और वह कार्य कर रहा है जो इसे नहीं करना है जरूरत संशाधनों में सुख-शान्ती खोजने को नहीं बल्की खुद के वास्तविक कर्म को महसूस कर खुद के अनुसार सरल जीवन जीने की है।
