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AIIMS Nagpur में UNICEF India की मीडिया कार्यशाला, बच्चों में गैर-संचारी रोगों (NCDs) पर स्वास्थ्य रिपोर्टिंग को बढ़ावा

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UNICEF India और PIB ने मीडिया प्रशिक्षण आयोजित किया

डेस्क। बचपन में होने वाली गैर-संक्रामक बीमारियों की मीडिया कवरेज क्षमता बढ़ाने संबंधी दो दिवसीय मीडिया कार्यशाला आज नागपुर के एम्स में संपन्न हुई। कार्यशाला में पश्चिमी भारत के 30 से अधिक मीडियाकर्मियों ने भाग लिया।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष-यूनिसेफ इंडिया, प्रेस सूचना ब्यूरो-पश्चिमी क्षेत्र और एम्स नागपुर ने संयुक्त रूप से यह कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला में मीडियाकर्मियों को बाल्यावस्था की गैर-संक्रामक बीमारियों का निदान, उपचार और प्रबंधन तथा स्वास्थ्य रिपोर्टिंग बेहतर बनाने की सर्वोत्तम पद्धतियों की जानकारी मिली।

बच्चों में NCD खतरे पर जागरूकता

कार्यशाला का उद्देश्य मीडिया कर्मियों को 5 से 9 वर्ष की आयु के बच्चों और 10 से 19 वर्ष की आयु के किशोरों में गैर-संक्रामक रोगों के बढ़ते खतरे से अवगत कराना था। पश्चिमी और मध्य भारत के जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में बाल्यावस्था के गैर संचारी रोगों में प्रायः निदान और विशेषज्ञ देखभाल की सीमित पहुंच उपलब्ध हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में गतिहीन जीवनशैली, मोबाइल पर रील देखने में समय व्यतीत करने और आहार में बदलाव के कारण बचपन में मोटापे, मधुमेह-डाइबिटीज और मानसिक स्वास्थ्य विकारों जैसी स्थितियों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। ग्रामीण, आदिवासी या शहरी क्षेत्र में कोई भी हों, बचपन की इन स्थितियों का पता जटिलताएं बढ़ने तक नहीं चल पाता।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रेस सूचना ब्यूरो-पश्चिमी क्षेत्र की महानिदेशक स्मिता वत्स शर्मा ने इस अवसर पर कहा कि जन स्वास्थ्य रिपोर्टिंग जागरूकता और जन कार्रवाई को आकार देती है। पत्रकारों का यह अहम दायित्व है कि वे साक्ष्य-आधारित जानकारी दें और लोगों को अपनी रिपोर्ट द्वारा बच्चों को प्रभावित करने वाली स्वास्थ्य संबंधी उभरती चुनौतियां बताएं।

बाल रोगों की पहचान में मीडिया की भूमिका

एम्स नागपुर के कार्यकारी निदेशक डॉ. प्रशांत जोशी ने कहा कि बाल्यावस्था के गैर-संक्रामक रोगों का इनक्यूबेशन पीरियड (किसी रोगजनक के संपर्क में आने और लक्षणों के पहली बार प्रकट होने के बीच का समय) लंबा होता है और ये बचपन से ही शुरू हो जाती हैं; इसलिए, शीघ्र निदान, निरंतर देखभाल और सुदृढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली अनिवार्य और महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि एम्स नागपुर ऐसी देखभाल पद्धतियां विकसित करने को प्रतिबद्ध है जिन्हें देश भर में लागू किया जा सके। डॉ. जोशी ने कहा कि परिवारों को इन लक्षणों को जल्दी पहचानने और समय पर उपचार के लिए प्रेरित करने में मीडिया मदद कर सकता है।

यूनिसेफ इंडिया की संचार, पक्ष समर्थक और सहयोग प्रमुख ज़ाफ़रीन चौधरी ने कहा कि मीडिया बाल्यावस्था की गैर-संक्रामक बीमारियों पर सटीक और सहानुभूतिपूर्ण रिपोर्टिंग कर छिपे हुए मुद्दे सामने लाता है। वह इनके शीघ्र निदान को प्रोत्साहित करता है, बीमारी से जुड़ी सामाजिक बदनामी को चुनौती देता है और इस बात को पुष्ट करता है कि इन बीमारियों से बचाव और उपचार संभव है। उन्होंने कहा कि यूनिसेफ को पीआईबी, एम्स नागपुर और पत्रकारों के साथ सहयोग द्वारा इन सूचनाओं को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में गर्व है और साथ मिलकर, हम जानकारी दे सकते हैं, कार्रवाई के लिए प्रेरित कर सकते हैं और बच्चों को बीमारियों से उबरने और स्वस्थ होने में मदद कर सकते हैं।”

UNICEF और AIIMS Nagpur की साझेदारी

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय में अपर महानिदेशक, डॉ. तुषार एन नाले ने सरकार के गैर संचारी रोग कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण दिया। महाराष्ट्र सरकार ने इस वर्ष के आरंभ में, यूनिसेफ इंडिया के सहयोग से राज्य में बाल्यावस्था संबंधी गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और प्रबंधन सुदृढ़ बनाने के लिए एम्स नागपुर के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। साझेदारी के तहत एम्स नागपुर को इसमें तकनीकी उत्कृष्टता केंद्र के रूप में स्थापित किया गया है।

यूनिसेफ महाराष्ट्र के प्रमुख संजय सिंह ने कहा कि बाल्यावस्था की गैर-संक्रामक बीमारियां अब जटिल नहीं रह गई हैं। ये चुनौती उभरती जन स्वास्थ्य प्राथमिकता हैं और एम्स नागपुर और महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर हम शीघ्र निदान, रेफरल प्रणाली और गुणवत्तापूर्ण देखभाल बेहतर बना रहे हैं ताकि प्रत्येक बच्चे को आवश्यकतानुसार समय पर सहायता मिल सके। कार्यशाला के दौरान मीडियाकर्मियों ने एम्स नागपुर स्थित बाल रोग उत्कृष्टता केंद्र का दौरा किया और डॉक्टरों, पीड़ित बच्चों और स्वास्थ्य सेवा कर्मियों से मुलाकात की और दीर्घकालिक देखभाल स्थितियां प्रत्यक्ष रूप से देखीं। मीडियाकर्मियों ने पारस्परिक प्रश्नोत्तरी में भी भाग लिया, जिससे बाल्यावस्था के गैर-संचारी रोगों के बारे में जानकारी और समूहों में काम करते हुए समाचार संबंधी विचार और रिपोर्टिंग दृष्टिकोण विकसित करने में मदद मिली।

स्वास्थ्य रिपोर्टिंग को बेहतर बनाने की पहल

कार्यशाला पूर्व भूमिका सत्र के साथ आरंभ हुई, जिसमें एम्स नागपुर के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी गिरीश ने बाल्यावस्था के गैर-संचारी बीमारियों को समझने पर ज्ञानवर्धक जानकारी दी। कार्यशाला में भारत सरकार द्वारा स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए मीडियाकर्मियों को उपलब्ध कराए गए संसाधनों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि मीडियाकर्मी स्वास्थ्य संबंधी समाचारों पर नियमित और अद्यतन सामग्री के लिए पीआईबी का उपयोग विभिन्न भाषाओं में कैसे कर सकते हैं। इसमें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और नमूना पंजीकरण प्रणाली सर्वेक्षण, पोषण-ट्रैकर वेबसाइट और अन्य सुलभ अंतर-मंत्रालयी संसाधनों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया।

यह कार्यशाला सतत सहभागिता के आरंभ का प्रतीक है जो सितंबर 2026 में गैर-संक्रामक रोग सप्ताह तक सक्रियता पूर्वक चलेगी। यह पहल बाल्यावस्था के गैर-संचारी रोगों के बारे में लोगों की समझ बढ़ाने और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य रिपोर्टिंग बेहतर बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा रही।

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