पंडित सुनील पांडेय।
डेस्क। नवरात्रि के पावन पर्व का छठा दिन मां कात्यायनी की उपासना के लिए समर्पित होता है। देवी का यह स्वरूप शक्ति, साहस और धर्म की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। दुर्गा सप्तशती में वर्णित कथाओं के अनुसार, जब असुरों का अत्याचार बढ़ा और महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर दिया, तब देवी ने कात्यायनी रूप में अवतार लेकर उसका संहार किया और धर्म की पुनः स्थापना की। इसी कारण मां कात्यायनी को आदिशक्ति और विजय की देवी कहा जाता है। उनकी आराधना से न केवल साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है, बल्कि जीवन की बाधाएं दूर होकर सुख-समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त होता है। विशेष रूप से विवाह संबंधी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इस दिन की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
इस दिन भक्त मां के दिव्य स्वरूप की पूजा कर शक्ति, साहस और सफलता की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और विशेष रूप से विवाह से जुड़ी इच्छाएं पूरी होती हैं। इसलिए इस दिन का महत्व भक्तों के लिए बेहद खास माना जाता है।
मां कात्यायनी का महत्व
नवरात्रि का छठा दिन नवरात्रि में बेहद खास माना जाता है। इस दिन मां कात्यायनी की पूजा से साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
कहा जाता है कि योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए मां कात्यायनी की पूजा अचूक फल देती है।
मां कात्यायनी का स्वरूप
मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी माना जाता है। उनका वर्ण सुनहरा है और वे सिंह पर सवार रहती हैं। उनकी चार भुजाएं हैं—
- एक हाथ अभय मुद्रा में
- एक हाथ वरदान देने की मुद्रा में
- एक हाथ में तलवार (चंद्रहास)
- एक हाथ में कमल पुष्प
वे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं और भगवान कृष्ण की प्राप्ति के लिए गोपियों ने भी उनकी पूजा की थी।
पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी भगवती की कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया, जिससे वे कात्यायनी कहलायीं।
इसी स्वरूप में देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई, इसलिए उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।
मां कात्यायनी पूजा विधि
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें
- लाल या पीले वस्त्र धारण करें
- पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें
- कलश स्थापना के बाद मां को वस्त्र अर्पित करें
- घी का दीपक जलाएं और रोली-फूल चढ़ाएं
- पान के पत्ते पर प्रसाद (बताशा, लौंग) अर्पित करें
- अंत में कपूर से आरती करें
ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष शास्त्र में मां कात्यायनी का संबंध बृहस्पति ग्रह से माना जाता है। उनकी पूजा से गुरु ग्रह मजबूत होता है, जिससे विवाह और शिक्षा से जुड़े कार्यों में सफलता मिलती है।
