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सारनाथ को मिली वैश्विक पहचान, धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर गूंजा बुद्ध का संदेश

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धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर जुटे देश-विदेश के बौद्ध विद्वान, सारनाथ बना वैश्विक संवाद का केंद्र

लखनऊ/वाराणसी। वाराणसी के सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार में आषाढ़ पूर्णिमा एवं धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के पावन अवसर पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ भव्य रूप से संपन्न हुआ। “धम्मचक्क पवत्तन दिवस का महत्व” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में देश-विदेश से आए बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों और श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कार्यक्रम में उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं का सम्मान करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार सारनाथ को वैश्विक बौद्ध पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।

धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर जुटे देश-विदेश के बौद्ध विद्वान

अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग) तथा महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ के अध्यक्ष वेन. आर. सुमित्थानंद थेरो सहित अनेक बौद्ध भिक्षु और विद्वान उपस्थित रहे। संगोष्ठी का उद्देश्य भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश और उनके धम्म संदेश को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाना है।

सारनाथ को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर होगा स्थापित

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार सारनाथ के पर्यटन विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म से जुड़े इस पवित्र स्थल की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य किए जा रहे हैं। प्रदेश सरकार का प्रयास है कि सारनाथ आने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, जिससे यहां पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिल सके।

यूनेस्को की सूची में शामिल होने से बढ़ी सारनाथ की वैश्विक पहचान

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि सारनाथ अब भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा विश्व धरोहर स्थल बन गया है। लगभग 28 वर्षों बाद मिली इस महत्वपूर्ण मान्यता ने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्ध विरासत को नई पहचान दी है। अब तक प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध धरोहर स्थलों में ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे स्थल शामिल थे, जो आगरा क्षेत्र तक सीमित थे। सारनाथ के शामिल होने से उत्तर प्रदेश की विश्व धरोहर पहचान अब पूर्वांचल तक विस्तृत हो गई है, जो प्रदेश के लिए गर्व का विषय है।

बौद्ध विरासत को मिलेगी वैश्विक पहचान

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि सारनाथ की वैश्विक पहचान मजबूत होने से उत्तर प्रदेश के पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ख्याति मिलेगी। यह उपलब्धि न केवल प्रदेश की समृद्ध बौद्ध विरासत को विश्व स्तर पर स्थापित करेगी, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के नए अवसर भी सृजित करेगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सारनाथ आने वाले समय में दुनिया भर के बौद्ध श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनेगा तथा भगवान बुद्ध के शांति और करुणा के संदेश को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के धम्मपद अनुवाद का हुआ लोकार्पण

कार्यक्रम में महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा मूल पाली से संस्कृत में अनूदित धम्मपद तथा प्रो. सिद्धार्थ सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “युगपुरुष कोसेत्सु नोसु को स्मरण करते हुए” का लोकार्पण किया गया। संगोष्ठी की रूपरेखा प्रो. विमलेंद्र कुमार ने प्रस्तुत की। इस दौरान अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ के निदेशक डॉ. राकेश सिंह, संस्थान के सदस्य वेन. के. सिरी सुमेधा थेरो, महाबोधि विद्या परिषद, सारनाथ के अध्यक्ष एवं दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के पूर्व कुलपति प्रो. आर. एम. पाठक, एबीएसएस लखनऊ के सदस्य तरुणेश बौद्ध, कोलकाता विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग के प्रो. उज्ज्वल कुमार तथा नवनालंदा महाविहार, नालंदा के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए।

आज तीन तकनीकी सत्रों में होंगे शोध पत्र प्रस्तुत

संगोष्ठी के दूसरे दिन (30 जुलाई) आयोजित तीन तकनीकी सत्रों में देश-विदेश के विद्वान, शोधकर्ता और बौद्ध भिक्षु धम्मचक्क पवत्तन दिवस के महत्व तथा बौद्ध दर्शन के विभिन्न आयामों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे। प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. अवधेश कुमार चौबे, द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. उज्ज्वल कुमार तथा तृतीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. ज्योति रोहिल्ला राणा करेंगी। इन सत्रों में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, नवनालंदा महाविहार, केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान (सीआईएचटीएस), महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ सहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्वान अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। प्रत्येक तकनीकी सत्र के अंत में अध्यक्ष द्वारा चर्चा एवं समापन टिप्पणी दी जाएगी। कार्यक्रम के अंत में डॉ. राकेश सिंह सभी प्रतिभागियों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करेंगे।

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