लोकतंत्र भारत के लोगों की जीवनशैली है
हृदयनारायण दीक्षित।
लोकतंत्र असाधारण अनुशासन से ही सफल होता है। भारत के संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र को संविधान व्यवस्था का मूल तत्व माना था। संविधान निर्माताओं ने इसीलिए संविधान मे अनेक संस्थाओं की व्यवस्था की। शासन के तीन मुख्य अंग बताए गए। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव हैं। उन्होंने जनप्रतिनिधियों द्वारा संचालित विधायिका की व्यवस्था की। वयस्क मताधिकार के आधार पर विधायिका चुने जाने की विधि बनी। भारत के संविधान (अनुच्छेद 324) में निर्वाचन सम्पन्न कराने के लिए एक आयोग का प्रावधान किया गया। भारत के निर्वाचन आयोग ने अपनी स्थापना (1950) से लेकर अब तक केन्द्र के (लोकसभा) 18 आम चुनाव और राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं के 400 से अधिक आम चुनाव संपन्न करवाए हैं। संप्रति निर्वाचन आयोग गैरजिम्मेदार विपक्ष का निशाना है।
भारतीय चुनाव प्रणाली की प्रशंसा सारी दुनिया में होती है। कई देशों के चुनाव आयोगों के अधिकारी भारत के निर्वाचन आयोग के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए भारत आते हैं। लेकिन पिछले 2 साल से देश का प्रतिपक्ष चुनाव आयोग के पीछे हाथ धोकर पड़ा हुआ है। चुनाव की अनियमितता पर सवाल उठाना और उसमें सुधार लाने के लिए सुझाव देना सामान्य प्रक्रिया है। चुनावी जनादेश से विधायिका बनती है। इसी जनादेश से सरकार का जन्म होता है और इसी से विपक्ष का भी। लेकिन इसकी अवहेलना की जा रही है। इसको लेकर होने वाले विरोध प्रदर्शनों ने पूरी चुनाव प्रक्रिया के प्रति अविश्वास पैदा किया है। लोकतंत्र की सफलता के लिए संविधान और उसकी संस्थाओं के प्रति विश्वास बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन आन्दोलनों ने पूरी चुनाव प्रणाली और उससे जुड़ी संस्थाओं पर ही सवाल उठाए हैं। भारत का संविधान सम्प्रति राष्ट्र का धारक है। संविधान निर्माताओं ने देश की राज्य व्यवस्था का चित्र बनाते समय लोकतंत्र को भारत का राष्ट्र धर्म माना। चुने हुए व्यक्तियों/संस्थाओं को विधायी और संविधायी अधिकार मिले। संविधान में उपबंधित बाकी संस्थाओं को सुस्पष्ट लिखित अधिकार दिए गए। भारत का निर्वाचन आयोग ऐसी ही मनोनीत सम्मानित संवैधानिक संस्था है। इसी आयोग के अधिकार सम्प्रति प्रश्नगत हो गये हैं।
देश अविश्वास के संकट से गुजर रहा है। प्रतिपक्ष संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा गिराने में जुटा हुआ है। विरोध प्रदर्शन की भी मर्यादाएं होती हैं। पुलिस से युद्ध करना लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता। हद तो तब हो गई जब प्रतिपक्षी नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में जाकर हुड़दंग मचाया। सर्वोच्च न्यायालय को लेकर विपक्षी नेताओं के आचरण से पूरा देश सन्न है। न्यायपालिका राजनीतिक मंच नहीं है। प्रतिपक्षी नेताओं के पास यदि कोई वोटों में गड़बड़ी के साक्ष्य थे, तो उन साक्ष्यों को राष्ट्रपति को दिया जा सकता था। न्यायपालिका को राजनीति में घसीटने का क्या तुक है? विपक्ष की मांगों की सूची भी बढ़ती ही जा रही है। अब कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह सत्ता बदल से कम पर राजी नहीं है। सरकारें सुस्थापित निर्वाचन के माध्यम से ही बदलती हैं। निर्धारित संविधान की व्यवस्था के अनुसार वे चुनाव की प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं हैं। इन्हें तत्काल सत्ता चाहिए। वे संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार निर्वाचित सरकार को 5 वर्ष का कार्यकाल देने को भी तैयार नहीं हैं। बिना चुनाव ही सत्ता पर कब्जा कर लेने की उनकी इच्छा की पोल खुल गई है।
निर्वाचन आयोग छोटी मोटी संस्था नहीं है। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयुक्त को हटाने का प्राविधान न्यायपालिका के उच्च स्तरीय जज के समान रखा गया है। आयोग की गतिविधियों और फैसलों से नाराज सत्ता पक्ष या विपक्ष उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। संविधान में उसे हटाए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। संविधान (अनुच्छेद 324-5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उनके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश को हटाया जाता है। हटाए जाने का कठोर प्राविधान इसीलिए संविधान में कठोर रूप में रखा गया है। विपक्ष इस गरिमा का भी सम्मान नहीं रखता। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाए जाने की विधि सुस्पष्ट है कि उसे महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है अन्यथा नहीं।
विपक्ष का अंक गणित सीधा है। वे चुनाव हार गए हैं, तो क्या हुआ। उनके अनुसार उन्हें वोटों की गड़बड़ी के माध्यम से हराया गया है। तमाम धांधलियां हुई हैं। इस तरह केन्द्र में सत्तारूढ़ सरकार अवैधानिक है। दो तीन हजार लोगों के हुल्लड़ से कुर्सी खाली होगी और वे सत्ता की कुर्सी पर कब्जा कर लेंगे। दरअसल वे चुनावी मोर्चे पर लगातार पिट रहे हैं। वे हार का दुख झेल नहीं पाए। अच्छा है कि भारत की जनता इनकी बातों पर विश्वास नहीं करती, वरना वोट चोरी चिल्लाते हुए वे देश में अराजकता फैला देते।
संविधान को हाथ में लेकर भी देश तोड़ने की बातें करना कितना खतरनाक हो सकता है। संविधान ने ही उन्हें मुक्त विचार अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य दिया है। संविधान ने ही उन्हें लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष कहा। सम्मान दिया। संविधान और उसकी सभी छोटी बड़ी संस्थाएं मिलकर काम करती हैं तो लोकतंत्र आदर्श हो जाता है। लोकतंत्र भारत के लोगों की जीवनशैली है। वैदिक काल से लेकर अब तक राष्ट्र की सभी संस्थाओं में लोकतंत्र की सघन उपस्थिति दिखाई पड़ती है। यहाँ वैचारिक विविधता है। असहमति का आदर है। मौलिक अधिकार हैं और मौलिक कर्तव्य भी हैं। भिन्न भिन्न विचारों और विश्वासों को मानने वाले लोग साथ साथ रहते हैं। संविधान में भी इस विविधता का स्पष्ट उल्लेख है। वैदिक भारत में सभा और समितियां थीं। इनमें लोकतंत्री बहसें होती थीं। असहमति का आदर था। लोकतंत्र की यह भावना सभी दिशाओं में जीवंत है। ऐसे प्राचीन राष्ट्र के संवैधानिक उपकरणों को नष्ट करने का विपक्ष का यह कारनामा बर्दाश्त के बाहर है।
