12 फीट ऊंचे मचान पर रहने वाले सिद्ध योगी का रहस्य
विशेष रिपोर्ट: संजय मिश्र।
देवरिया। जब भी भारतीय संतों और सिद्ध योगियों की चर्चा होती है, देवरहा बाबा का नाम स्वतः सामने आ जाता है। ऊंचे लकड़ी के मचान पर निवास करने वाले इस संत ने अपने तप, सादगी और आध्यात्मिक प्रभाव से करोड़ों लोगों का विश्वास जीता। उनके जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग आज भी लोककथाओं और श्रद्धालुओं की स्मृतियों में जीवित हैं। यही कारण है कि देवरहा बाबा केवल एक संत नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक अद्भुत और प्रेरणादायक पहचान माने जाते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे लोगों के मन की बात जान लेते थे और अपने आशीर्वाद से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते थे।
सरयू किनारे बना तपस्थल, जहां उमड़ती थी श्रद्धालुओं की भीड़
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की बरहज तहसील के मईल गांव के पास सरयू नदी के किनारे स्थित आश्रम वर्षों तक देवरहा बाबा की तपस्थली रहा। दूर-दूर से लोग उनके दर्शन के लिए पहुंचते थे। उनके अनुयायियों का मानना था कि बाबा का आशीर्वाद जीवन की कठिनाइयों को दूर करने वाला होता था।

स्थानीय लोगों के अनुसार, बाबा के आश्रम में बबूल के ऐसे वृक्ष थे जिनमें कांटे नहीं होते थे और जिनकी सुगंध पूरे वातावरण में फैली रहती थी। देवरहा बाबा भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण को एक ही परम तत्व का स्वरूप मानते थे तथा भक्तों को कष्टों से मुक्ति के लिए यह मंत्र जपने की प्रेरणा देते थे—
“ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥”
12 फीट ऊंचे मचान पर ही बीतता था जीवन
देवरहा बाबा की सबसे बड़ी पहचान उनका लकड़ी का ऊंचा मचान था। जमीन से लगभग 12 फीट ऊपर बने इसी मचान पर वे अधिकांश समय निवास करते थे। श्रद्धालु नीचे खड़े होकर उनके दर्शन करते और बाबा ऊपर से आशीर्वाद देते थे। बताया जाता है कि वे बहुत कम अवसरों पर ही जमीन पर उतरते थे।
देवरहा बाबा की शारीरिक बनावट अद्भुत थी। दुबला पतला शरीर, लंबी जटाएं कंधे पर यज्ञोपवीत (जनेऊ)शोभायमान करती थी।अनुयायियों के अनुसार, बाबा भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड में भी कभी सामान्य वस्त्र नहीं पहनते थे। वे केवल कमर पर मृग की खाल लपेटे रहते थे और उसी अवस्था में साधना करते थे।
सादा जीवन, कठोर तपस्या
देवरहा बाबा का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण बताया जाता है। उनके अनुयायियों के अनुसार, वे दूध, शहद तथा फलों के रस का ही सीमित मात्रा में सेवन करते थे। योग और साधना उनके जीवन का आधार थे।

श्रद्धालुओं का यह भी दावा है कि बाबा को किसी ने कभी आते-जाते नहीं देखा। कई अनुयायी मानते हैं कि वे एक साथ दो अलग-अलग स्थानों पर उपस्थित हो सकते थे। यह भी कहा जाता है कि वे जंगली जानवरों की भाषा समझ लेते थे और हिंसक पशुओं को भी सहज ही शांत कर देते थे। हालांकि इन मान्यताओं के समर्थन में कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
उम्र को लेकर क्यों बना हुआ है रहस्य?
देवरहा बाबा के जन्म का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि उनकी आयु को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। कुछ लोग उन्हें 200 से 250 वर्ष तक जीवित बताते हैं, जबकि कई श्रद्धालु 500 या 900 वर्ष तक जीवित रहने का दावा करते हैं। इतिहासकार इन दावों की पुष्टि नहीं करते और इन्हें लोकविश्वास का हिस्सा मानते हैं।
चमत्कारों की कहानियां आज भी प्रचलित
देवरहा बाबा के बारे में अनेक चमत्कारिक कथाएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं। अनुयायियों का दावा है कि वे बिना बताए लोगों की समस्याएं समझ लेते थे, भविष्य का संकेत देते थे और उनके आशीर्वाद से अनेक लोगों का जीवन बदल गया। कुछ कथाओं में उनके द्वारा प्रसाद या फल प्रकट करने का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि इन दावों के समर्थन में कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

एक चर्चित लोककथा के अनुसार, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रस्तावित दौरे से पहले अधिकारी सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण करने आश्रम पहुंचे। वहां एक बबूल का पेड़ सुरक्षा कारणों से काटे जाने की बात हुई। अनुयायियों के अनुसार, बाबा ने अधिकारियों से कहा, “यह वृक्ष मेरा मित्र है, मैं इससे बातें करता हूं। इसे मत काटो, तुम्हारे प्रधानमंत्री का दौरा रद्द हो जाएगा।” कुछ समय बाद दौरा रद्द होने की सूचना मिलने की बात कही जाती है। हालांकि इस घटना का कोई स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
देश के बड़े नेताओं की भी थी आस्था
देवरहा बाबा के आश्रम में देश के कई प्रमुख नेता और सार्वजनिक जीवन की हस्तियां पहुंचीं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व गृह मंत्री बूटा सिंह, महामना मदन मोहन मालवीय और कमलापति त्रिपाठी सहित अनेक नेताओं के उनके दर्शन करने का उल्लेख विभिन्न स्रोतों में मिलता है। कुछ लोककथाओं में 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के उनसे मिलने का भी दावा किया जाता है, हालांकि इसका कोई प्रमाणित ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
इंदिरा गांधी और ‘हाथ’ चुनाव चिह्न की चर्चित कथा
लोकमान्यताओं के अनुसार, 1977 के आम चुनाव में हार के बाद इंदिरा गांधी देवरहा बाबा का आशीर्वाद लेने पहुंचीं। कहा जाता है कि बाबा ने उन्हें अपने हाथ के पंजे से आशीर्वाद दिया। इसके बाद कांग्रेस ने ‘हाथ’ चुनाव चिह्न अपनाया और 1980 में सत्ता में वापसी की। हालांकि इस कथा की पुष्टि करने वाला कोई निर्णायक ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।

1990 में हुआ महाप्रयाण
प्रचलित जानकारी के अनुसार, 19 जून 1990 को योगिनी एकादशी के दिन वृंदावन में यमुना तट पर देवरहा बाबा ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। उनके अनुयायी इसे महाप्रयाण नहीं, बल्कि ‘वैकुण्ठ गमन’ मानते हैं। आज भी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में स्थित मईल गांव और वृंदावन स्थित उनके आश्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और श्रद्धापूर्वक उन्हें स्मरण करते हैं।
