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सोहनाग धाम देवरिया: भगवान परशुराम की तपोभूमि, मिथिला से लौटते समय यहीं किया था विश्राम

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जहां भगवान परशुराम ने की थी तपस्या, आज भी आस्था का बड़ा केंद्र

रिपोर्ट: संजय मिश्र।

देवरिया। पूर्वांचल की धरती पर कई ऐसे तीर्थ हैं, जिनकी पहचान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि लोककथाओं, पुराणों, प्रकृति और सदियों पुरानी आस्था से जुड़ी है। इन्हीं में एक है देवरिया जिले का सोहनाग धाम, जहां हर कदम पर इतिहास और जनश्रुतियां मानो एक-दूसरे का हाथ थामे चलती हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मिथिला में भगवान श्रीराम द्वारा शिव धनुष भंग किए जाने के बाद लौटते समय भगवान परशुराम ने इसी पावन भूमि पर रात्रि विश्राम किया था और कई दिनों तक कठोर तप-साधना में लीन रहे। तभी से यह स्थान उनकी तपोस्थली के रूप में पूजित है।

देवरिया जिला मुख्यालय से लगभग 34 किलोमीटर दूर सलेमपुर तहसील के सोहनाग कस्बे में स्थित यह धाम आज भी अपनी प्राचीन गरिमा और आध्यात्मिक आभा को संजोए हुए है। यहां पहुंचते ही विशाल सरोवर, प्राचीन मंदिर और चारों ओर फैली शांत प्राकृतिक छटा श्रद्धालुओं को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति कराती है।

रामायण काल से जुड़ी है इस धाम की पहचान

लोकश्रुतियों के अनुसार त्रेतायुग में राजा जनक के धनुष यज्ञ में जब भगवान श्रीराम ने भगवान शिव का धनुष भंग किया, तो उसकी गूंज सुनकर भगवान परशुराम तत्काल जनकपुर पहुंचे। वहीं लक्ष्मण और परशुराम के बीच हुआ प्रसिद्ध संवाद रामायण का अत्यंत चर्चित प्रसंग माना जाता है।

कहा जाता है कि जनकपुर से लौटते समय रात्रि हो जाने के कारण भगवान परशुराम वर्तमान सोहनाग क्षेत्र में रुके। उस समय यहां घना वन, निर्मल जल और शांत वातावरण था। स्थान की रमणीयता से प्रभावित होकर उन्होंने यहीं कई दिनों तक तप और साधना की। तभी से यह भूमि परशुराम की तपोभूमि के रूप में श्रद्धा का केंद्र बन गई।

अक्षय तृतीया पर उमड़ती है अपार श्रद्धा

हर वर्ष अक्षय तृतीया, जिसे भगवान परशुराम की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, सोहनाग धाम में विशाल मेले का आयोजन होता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल से भी हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन और सरोवर में स्नान के लिए पहुंचते हैं। पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह, भक्ति और लोक संस्कृति का अनूठा वातावरण देखने को मिलता है।

चर्म रोगों से मुक्ति की आस्था का केंद्र है पवित्र सरोवर

धाम के पूर्व दिशा में लगभग दस एकड़ में फैला विशाल सरोवर यहां का सबसे आकर्षक और चर्चित स्थल है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक इस सरोवर में स्नान करने से चर्म रोगों में लाभ मिलता है। इस विश्वास के पीछे भी एक रोचक जनश्रुति प्रचलित है। बताया जाता है कि कई शताब्दियों पहले नेपाल के राजा सोहन गंभीर चर्म रोग से पीड़ित थे। धर्माचार्यों की सलाह पर वे तीर्थयात्रा करते हुए सोहनाग पहुंचे। यहां रात्रि विश्राम के बाद उन्होंने सरोवर के जल का स्पर्श किया और नियमित स्नान करने लगे। जनश्रुति के अनुसार कुछ ही समय में उनका चर्म रोग समाप्त हो गया।

इस घटना से प्रभावित होकर राजा ने यहां खुदाई कराई। कहा जाता है कि खुदाई के दौरान भगवान परशुराम, माता रेणुका, महर्षि जमदग्नि तथा भगवान विष्णु की प्राचीन पत्थर की मूर्तियां प्राप्त हुईं। इसके बाद राजा सोहन ने यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया और विधि-विधान से मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा कराई। माना जाता है कि उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम सोहनाग पड़ा।

धार्मिक पर्यटन के रूप में बढ़ रही पहचान

समय के साथ सोहनाग धाम का महत्व लगातार बढ़ रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पर्यटन विभाग ने सरोवर के चारों ओर इंटरलॉकिंग पथ का निर्माण कराया है। एक बहुउद्देशीय भवन भी बनाया गया है, जिससे धार्मिक आयोजनों और बाहर से आने वाले यात्रियों को सुविधा मिलती है। अब यह स्थल पूर्वांचल के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में अपनी अलग पहचान बना रहा है।

आस्था के साथ शोध का भी विषय

सोहनाग धाम केवल श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यहां प्रचलित लोककथाएं, प्राचीन मूर्तियां और धार्मिक परंपराएं इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की ओर संकेत करती हैं। हालांकि भगवान परशुराम के यहां प्रवास तथा सरोवर के चर्म रोग निवारण संबंधी मान्यताएं मुख्यतः लोकश्रुतियों और धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं, फिर भी इन कथाओं ने सोहनाग धाम को पूर्वांचल के प्रमुख आस्था स्थलों में विशिष्ट पहचान दिलाई है।

आस्था, इतिहास और प्रकृति का जीवंत संगम

शांत सरोवर की लहरें, मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि, श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और सदियों से चली आ रही लोककथाएं—ये सभी मिलकर सोहनाग धाम को केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बना देते हैं। यहां आने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ केवल दर्शन का अनुभव ही नहीं, बल्कि इतिहास, अध्यात्म और प्रकृति के अद्भुत संगम की अविस्मरणीय स्मृतियां भी लेकर लौटता है।

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