जीवन की सार्थकता
कामेश।
जीवन प्रकृति का वह अनमोल उपहार है जो हमें मिला तो है परन्तु हम इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं कि हमारे किस कर्म का फल है। या फिर हम यह भी नहीं जानते कि यह जीवन किस उद्देश्य की पूर्ति हेतु हमें प्रदान किया गया है। परन्तु इस अनभिज्ञता में भी हमें इस बात का एहसास तो होता ही है कि यह जीवन हमें यूं ही नहीं मिला है, बल्की कुछ ऐसा उद्देश्य अवश्य है जिसकी जरूरत प्रकृति को है और वह अपना उद्देश्य हमसे पूरा अवश्य कारायेगी। हम अधिकतर मौकों पर अपने वास्तविक जीवन के उद्देश्य को तो जानते नहीं या फिर नज़र अन्दाज कर जाते हैं। ज्यादातर हम ऩज़र अन्दाज कर जाते हैं। क्योंकि कुछ बातें जीवन से सम्बन्धित ऐसी होती हैं जिन्हें करना हमारा मन खुद चाहता है परन्तु हम नहीं करते कभी समाज के डर से तो कभी परम्पराओं के बन्धन से तो कभी पारिवारिक दबाव में आकर हम बहुत सी बातो को न चाहते हुए भी नकार जाते हैं जबकि हमें अच्छी तरह पता होता है कि यह नकार हमारी आत्मा को स्वीकार्य नहीं है। स्वीकार होगा भी कैसे,हम जिन बातों को नकारते हैं वे तो हमारी ही आन्तरिक आवाज हाती है। जो हमें कुछ करने के लिए प्रेरित करती है जो हमे बार-बार इस पारम्परिक दल-दल से निकलने के लिए प्रोत्साहित करती है परन्तु हम अपनी उस आवाज को अनदेखा करते हुए बाह्य जगत की स्थियों के बारे में सोचने लग जाते हैं और बाह्य जगत में जीने की भिन्न-भिन्न तरकीब खोजने लगते हैं।
हम इस सामाजिक रीति-रिवाज में बचपन से ही इस तरह जकड़ दिये जाते हैं कि हम धीरे-धीरे उसी बन्धनों में जीने के आदती हो जाते हैं और अपने अंतःकरण की बातें स्वंय भूल जाते हैं। अपनी इच्छाओं को दबा कर समाज के बनाए नियमों पर चलने के आदती हो जाते हैं हम अपने अन्दर के उस प्राकृतिक यात्रा को भूल जाते हैं जिसने हमें इस प्रकृति का एक अहम हिस्सा बनाया है हम नहीं समझते हैं कि हम भला क्या निर्णय लें सकते हैं। जो समाज में चल रहा है उसी अनुसार हमें चलना है। हम समाज की स्थितियों के आगे नियमों पर चलने के इतने आदती हैं कि खुद के लिए हमारा कोई निर्णय ही नहीं रहा यहाँ तक कि हमारी इच्छा क्या पाने की है क्या पहनने की है ये लोगों के अनुसार हमें तय करना पड़ता है। जैसे लगता है जीवन हमारा है ही नहीं हमारे जीवन पर औरों का अधिकार चलता है जैसा लोग चाहते हैं हमें उसी तरह जीवन जीना है हमारे जीने का उद्देश्य मानो औरों के द्वारा निर्धारित किया जा रहा है। हम अपने जीवन का अमूल्य समय इस सामाजिक परम्पराओं को दे देते हैं। हमें तो ये भी पता नहीं चलता कि जीवन है भी या नही। क्योंकि रोज-रोज हमें उन्हीं पुराने नियमो पर चलना हमारी आदत है हम खुद कुछ नया करने से डरे हूए हैं हमें डर है इस बात का कि कुछ ऐसा करेगें तो समाज हम पर हंसेगा। हमारी अंतरात्मा जब प्रफुल्लित होती है हंसना चाहती है, पर हम यदि हंसते हैं तो लोग पागल समझेंगें, हमारे अन्दर शांत हो के बैठने की इच्छा होती है पर नहीं बैठते कि लोग कहेंगे कि क्या कर रहा है। हम अपने जीवन को लोगों कहने के अनुरूप चलाना चाहते हैं। लोग हमें और अच्छा कहें और मेरी प्रसन्सा करें बस इसी तरकीब की उधेड़ बुन में हम अपने जीवन को अपने अनुसार चलने से रोक देते हैं। लगता है जैसे हमरे जीवन पर हमारा नही लोगों का हक है मानो खेती हमारी है और फसल लोगों के अनुसार पैदा करनी है।
एक मछुआरा रोज सुबह-सुबह मछली पकड़ने नदी तट पर जाता था उसी क्रम में एक दिन वह सुबह थोड़ा जल्दी घर से निकल पड़ा थोड़ा अंधेरा था वह मछलियाँ पकडने के लिए जा रहा है और रास्ते में उसे एक थैला मिला उठा लिया थैले में हाथ डाला तो लगा कंकड़ पत्थर के टुकड़े हैं लेकर चल दिया नदी किनारे बैठा और थैले से एक-एक कंकड़ निकाल कर नदी में डालता जा रहा है और उधर धीरे-धीरे सुबह होती जा रही है अचानक उसमें जब अन्तिम कंकड़ उठाया तो उसे दिख गया मैं जिसे कंकड़ समझ के फेक रहा था वो तो सब कीमती सोने जवाहारात के टुकड़े थे। सिर पीट-पीट के रोने लगा कि ये क्या कर दिया हमने आई हुई सम्पत्ति हमने पानी में डाल दिया अमूल्य रत्न जो कि हमारी गरीबी दूर कर सकते थे सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा सकते थे सब हमने फैंक दिया। परन्तुु अब पछताने से कोई फायदा भी तो नहीं अब वह सोचने लगा मैं तो लुट गया बर्बाद हो गया, और वह मछली भी नहीं पकड़ा सीधा रोते हुए घर आ गया। ये तो मात्र कहानी थी परन्तु यदि देखा जाये तो हम सभी लगभग अपने अमूल्य जीवन को इसी तरह फेंकते जा रहे हैं। सामाजिक अधीनता के अंधेरे में हम अपने जीवन को फेंकते जा रहे हैं हमें ये भी नहीं पता कि हम जिसे खो रहें हैं वह हमें प्रकृति से कितनी महत्वपूर्ण वस्तु मिली है और फेंक भी रहें हैं तो ऐसी जगह जहाँ से फिर वापस नहीं मिलना हैं।
हम प्रकृति प्रदत्त हंसी जीवन में प्रकृति के निर्माण में कितने सहयोगी हैं उसका आभास नहीं कर पा रहे हैं हम सोचते हैं कि हमें और अच्छा बनना है जबकी उसने जो बनाया है क्या हम खुद को उससे भी अच्छा बन सकते हैं। हमे ये सोचना चाहिए क्या दुनिया में कोई ऐसा भी कलाकार या निर्माता है जो हमारे जीवन को उससे अच्छा बना सकता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता परन्तु हम समाज में अपने को प्रतिष्ठित करने हेतु उसके निर्माण के टुकड़े कर खुद अपना निर्माण करना चाहते हैं और सोचते हैं कि बस यही सब कुछ है परन्तु हमें ये नहीं पता कि हम जिस समाज के अनुसार अपना जीवन कैसा चाहते है वह हमे मात्र विकलांग बना रहा है न कि सक्षम प्रकृति हमे पूरी तरह सक्षम बना के ही पैदा करती है। क्योंकि उसे हमसे वो कार्य करवाना है वास्तव में हम जिस कार्य के जिए सबसे उपयोगी हैं, परन्तु हम उस प्रकृति पर निर्भर नहीं कर समाज पर निर्भर हो जाते है और अपना जीवन भी उसी अनुसार लोगों की चेष्ठा करने लग जाते हैं। चाहे हमारी यही चेष्ठा हमें हमारे वास्तविक जीवन से विमुख कर देती है, यहाँ तक कि हम भूल ही जाते हैं कि हमें वास्तव में करना क्या चाहिए हंसी आती है कभी-कभी देख कर जब कोई बच्चा अपने बाप या पड़ोसी से पूछता है कि कौन-सी पढ़ाई पढूं उससे भी हास्यस्पद तब होता है जब बच्चा कुछ कहे करना चाहता हूँ। और घर वाले गले काटने के लिए मजबूर करते हैं बच्चा खेलना चाहता है और माँ बाप पढ़ने के लिए जिद करते हैं, बच्चा घूमना चाहता है और वो उसे कमरे में बन्द कर देते हैं। एक बच्चे को इस तरह विकलांग बना देते है कि तुम पढ़ो बस जो चाहिए हम ले आकर देंगे। यहां तक कि खुद खाने पीने के लिए भी नहीं उठ पाता,कमरे में सारी व्यवस्था है। बस पढ़ो एक अच्छा इंसान बनो,एक ऐसा इंसान बनाने के लिए परेशान है जो कि इतना अपाहिज हो जो चले भी तो अपने पैरों पर नहीं बल्की गाड़ियों पर, खाना भी खाए तो अपने हाथ का बनाया नहीं नौकरों का बनाया , कुछ जीवन में करें भी तो मात्र पैसों के लिए,उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं पैसों पर जिए,लोगों के अनुसार जीने को मजबूर हो और सबसे मजे की बात तो ये है कि इसी विकलांगता को सफल जीवन मानते है।
वास्तविक जीवन जीने के लिए व्यक्ति को इन विकलांगताओं में दूर होकर खुद को अपने इच्छानुसार जीवन जीने की जरूरत है उसके लिए सामाजिक स्थियों से हट कर सोचने और चलने की जरूरत है,ऐसा हो कि वह समझे कि वास्तव में उसके जीवन का क्या उपयोग है और अपने जीवन में सही उद्देश्य का पहचान कर चलने की जरूरत है । और हमें जीवन का उद्देश्य जानने के लिए विचार करने और सोचने की कोई जरूरत नही बल्की खुद को प्रकृति पर छोड़ देने की आवश्यकता है क्योंकि हमारा सबसे बड़ा मार्गदर्शक खुद हमारे भीतर है। उससे अच्छा हमारे बारे में कोई दूसरा नही जान सकता और ना ही कोई मार्ग दिखा सकता है ,अतः अपने अन्दर के सही एहसास को समझ कर उसी अनुसार जीवन जीने की जरूरत है जो हमें सबसे अच्छाा लगे और जिससे सुकून मिले। इसी तरह हम पूर्ण सक्षम हो कर प्रकृति के अनुशार अपना वात्विक जीवन जीने में सफल हो सकते हैं। और यही हमारे जीवन की वास्तविक सार्थकता होगी।
