बच्चों की रचनात्मक गतिविधियों ने भी बांधा समां
लखनऊ। पाँचवें गोमती पुस्तक महोत्सव के सातवें दिन साहित्य, पर्यावरण, इतिहास, अनुवाद, सैन्य जीवन और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े विविध कार्यक्रम आयोजित हुए। लखनऊ विश्वविद्यालय के स्पोर्ट्स ग्राउंड में हुए महोत्सव में ‘मैं तुम्हारी गोमती हूँ’, ‘अनुवाद : संस्कृति के सेतु’, कल्हण कृत राजतरंगिणी पर आधारित किशोर उपन्यास शृंखला और ‘Force Fable: Crafted by the Olive’ जैसे सत्रों में विचार-विमर्श हुआ। वहीं, भारतेन्दु नाट्य अकादमी के कलाकारों ने ‘काकोरी एक्शन’ नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को मंच पर जीवंत किया। चिल्ड्रन्स कॉर्नर में विभिन्न स्कूलों के करीब 1,000 विद्यार्थियों ने कहानी, कैलीग्राफी, कैरिकेचर और आर्ट एंड क्राफ्ट गतिविधियों में भाग लिया।
कहानी से कैरिकेचर तक, बच्चों ने दिखाई रचनात्मकता
दिन की शुरुआत बाल लेखिका एवं पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. अनीता भटनागर जैन के स्टोरीटेलिंग सत्र से हुई। कहानी के माध्यम से बच्चों को पर्यावरण और बढ़ते प्रदूषण के प्रति जागरूक किया गया। इसके बाद कहानी आधारित क्विज हुआ, जिसमें विजेताओं को किताबें दी गईं।
कैलीग्राफी आर्टिस्ट आयशा इमरान ने बच्चों को सुंदर अक्षर लिखने की बुनियादी तकनीकें सिखाईं। कलाकार शुभम विश्वकर्मा ने कैरिकेचर वर्कशॉप में चेहरे की विशेषताओं को उभारकर चित्र बनाने का तरीका बताया, जिसमें बच्चों ने अपने दोस्तों के कैरिकेचर बनाए।
गोमती को बचाने के लिए नदी को जगह देना जरूरी : प्रो. वेंकटेश दत्ता
दोपहर के सत्र में ब्लू फाउंडेशन, लखनऊ की ओर से ‘मैं तुम्हारी गोमती हूँ’ विषय पर संवाद हुआ। इसमें गोमती और उसकी सहायक नदियों के इतिहास, पर्यावरणीय महत्व और मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा की गई। ब्लू फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. मीनू खरे ने गोमती और उसकी सहायक नदियों की जानकारी साझा की और कविता के माध्यम से नदी से जुड़े भावनात्मक रिश्ते को सामने रखा। उन्होंने कहा कि गोमती शहर और समाज के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुख्य वक्ता नदी विशेषज्ञ एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता ने कहा कि नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि एक जीवंत और लगातार गतिशील जैविक तंत्र है। उन्होंने कहा कि नदी की जमीन पर निर्माण और विभिन्न परियोजनाओं से उसका प्राकृतिक क्षेत्र सीमित हुआ है। गोमती के संरक्षण के लिए उसके प्रवाह, तट और प्राकृतिक इकोसिस्टम को पर्याप्त जगह देना जरूरी है। संवाद में गोमती के ऐतिहासिक स्वरूप और समय के साथ बदलते प्रवाह पर भी चर्चा हुई। अंग्रेजी शासनकाल के गजट में लखनऊ क्षेत्र में गोमती की दस सहायक नदियों के उल्लेख और चारबाग क्षेत्र के आसपास हुए निर्माण के नदी के स्वरूप पर प्रभाव पर भी विचार हुआ।
अनुवाद भाषाओं के साथ संस्कृतियों को भी जोड़ता है
‘अनुवाद : संस्कृति के सेतु’ विषय पर आयोजित संवाद का समन्वय पल्लवी विनोद ने किया। इसमें सूर्यकांत शर्मा, प्रितपाल कौर और स्मिता सिन्हा ने अनुवाद की भूमिका और चुनौतियों पर विचार साझा किए। पल्लवी विनोद ने कहा कि अनुवाद भाषाओं के साथ अलग-अलग संस्कृतियों और क्षेत्रों के लोगों को जोड़ता है और विश्व साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने में मदद करता है। सूर्यकांत शर्मा ने अनुवाद की तुलना नदी पर बने पुल से करते हुए कहा कि मुहावरों, लोकोक्तियों और सांस्कृतिक संदर्भों का सही रूपांतरण भाषा और समाज की समझ को समृद्ध करता है।
स्मिता सिन्हा ने कहा कि अनुवाद में मूल कृति की आत्मा और लेखक की जीवन-दृष्टि सुरक्षित रहनी चाहिए। प्रितपाल कौर ने कहा कि अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं, बल्कि भाव और संवेदना को दूसरी भाषा तक पहुंचाने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि AI ने अनुवाद के नए अवसर खोले हैं, लेकिन भाव और संवेदना को पूरी तरह बनाए रखना अब भी चुनौती है।
राजतरंगिणी से किशोरों को इतिहास और लोककल्याण की सीख
महोत्सव में कल्हण कृत राजतरंगिणी पर आधारित किशोर उपन्यास शृंखला पर विशेष संवाद हुआ। सत्र का समन्वय प्रसिद्ध लेखिका चंद्रकांता ने किया। उन्होंने बताया कि यह शृंखला राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की वृहत योजना का हिस्सा है और किशोरों को ध्यान में रखकर इतिहास को रोचक साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करती है। सुधाकर अदीब ने कहा कि इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख का माध्यम है।
मलिक राजकुमार ने कहा कि राजतरंगिणी कश्मीर के लंबे ऐतिहासिक कालखंड का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है। किशोरों के लिए ऐतिहासिक साहित्य तैयार करते समय उनकी बदलती मानसिकता, तकनीकी दुनिया और रुचियों को ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य को सही संदर्भ में प्रस्तुत करने के लिए उसके व्यापक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कालखंड को समझना आवश्यक है।
सेना में देश पहले, अनुशासन और त्याग फौजी जीवन की पहचान
‘Force Fable: Crafted by the Olive’ सत्र में आरजे प्रतीक और नवनीत ग्रेवाल ने फौजी जीवन, अनुशासन, त्याग और सैन्य संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर संवाद किया। नवनीत ग्रेवाल ने कहा कि सेना के लिए देश सबसे पहले है और इसके लिए अनुशासन व त्याग जरूरी है। उन्होंने बताया कि आर्मी अधिकारियों की बार-बार पोस्टिंग और स्थानांतरण के कारण परिवार को भी हर नए स्थान पर नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि फौजी भले ही कम बोलने वाले नजर आएं, लेकिन वे भीतर से बेहद संवेदनशील होते हैं और दोस्ती को पूरी शिद्दत से निभाते हैं। ‘डिटैचमेंट’ पर उन्होंने कहा कि दूरी बनाने से पहले जुड़ाव जरूरी है और किसी रिश्ते से दूरी भी सम्मान के साथ बनानी चाहिए। युवाओं को दोस्ती निभाने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि किसी को ऐसी स्थिति में नहीं डालना चाहिए, जहां उसे किसी एक व्यक्ति को चुनना पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध में केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार त्याग करता है।
‘काकोरी एक्शन’ ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को मंच पर किया जीवंत
शाम को भारतेन्दु नाट्य अकादमी के कलाकारों ने ‘काकोरी एक्शन’ नाट्य प्रस्तुति दी। स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक काकोरी घटना पर आधारित इस नाटक में देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों के साहस, संघर्ष और बलिदान को रंगमंच के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति के जरिए काकोरी कांड से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों और स्वतंत्रता आंदोलन में इसके महत्व को दर्शकों के सामने प्रभावी ढंग से रखा गया। कलाकारों के सशक्त अभिनय और प्रभावी मंचन ने दर्शकों की सराहना बटोरी और प्रस्तुति का समापन उत्साहपूर्ण माहौल में हुआ।
