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बहराइच के चित्तौरा झील का होगा कायाकल्प

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  • बहराइच का ‘हिडन जेम’ बनेगा टूरिज्म आइकन
  • चित्तौरा झील होगा ‘नेचर-हिस्ट्री’ डेस्टिनेशन
  •  4.10 करोड़ की धनराशि से परियोजना को मिली रफ्तार
  • महाराजा सुहेलदेव स्मारक के पास चित्तौरा झील का होगा समग्र विकास, पर्यटकों को मिलेंगी आधुनिक सुविधाएं
  • प्रदेश सरकार ने प्रथम किश्त जारी कर महत्वाकांक्षी परियोजना को दी गति, जल्द शुरू होंगे विकास कार्य
  • महाराजा सुहेलदेव की धरती पर इको टूरिज्म का नया अध्याय, चित्तौरा झील बनेगी आकर्षण का केंद्र- जयवीर सिंह

लखनऊ/बहराइच। उत्तर प्रदेश में ईको-टूरिज्म को विशिष्ट पहचान देने की दिशा में अहम कदम उठाते हुए बहराइच जनपद स्थित महाराजा सुहेलदेव स्मारक के समीप चित्तौरा झील को पर्यटन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। राज्य सरकार ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए 4.10 करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान करते हुए प्रथम किश्त के रूप में 50 लाख रुपए जारी कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘अवमुक्त राशि से क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को तेजी मिलेगी। महाराजा सुहेलदेव की कर्मस्थली को यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’  

प्रदेश के पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में महाराजा सुहेलदेव स्मारक के निकट स्थित चित्तौरा झील को इको-पर्यटन के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह स्थल न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, बल्कि इसका ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत समृद्ध है। यह क्षेत्र महान योद्धा महाराजा सुहेलदेव के पराक्रम का साक्षी रहा है। विकास परियोजना के माध्यम से झील क्षेत्र को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से सुसज्जित करते हुए इसकी ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित और प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि आगंतुक यहां प्रकृति के साथ-साथ प्रदेश के गौरवशाली इतिहास का भी अनुभव कर सकेंगे।’ उल्लेखनीय है कि वर्ष 2025 में 34 लाख से अधिक पर्यटकों ने बहराइच का भ्रमण किया।

आधारभूत संरचना विकास पर करोड़ों रुपए होंगे खर्च  
परियोजना के तहत विभिन्न इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसमें कैफेटेरिया ब्लॉक पर सबसे अधिक 158.83 लाख रुपए की लागत प्रस्तावित है, जबकि डेक और बोट जेट्टी के निर्माण पर 56.41 लाख रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा टिकट काउंटर ब्लॉक, शौचालय, बोरिंग एवं सबमर्सिबल पंप और सेप्टिक टैंक जैसे आवश्यक सुविधाओं के विकास पर भी अलग-अलग मदों में धनराशि निर्धारित की गई है। परियोजना में सीसी इंटरलॉकिंग, सीसी रोड, जलापूर्ति एवं सीवरेज, वर्षा जल संचयन, ड्रेनेज और विद्युत कार्यों को भी शामिल किया गया है। साथ ही सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के तहत सीसीटीवी सिस्टम, बायो फेंसिंग, उद्यानिकी कार्य और बैठने की व्यवस्था आदि विकसित की जाएगी। परियोजना में एमबैंकमेंट वर्क और ड्राई स्टोन पिचिंग पर भी विशेष जोर दिया गया है।

चित्तौरा झील का ऐतिहासिक-पौराणिक महत्व
बहराइच की ऐतिहासिक चित्तौरा झील आकर्षक पर्यटन स्थल के साथ-साथ वीरता और पराक्रम की गाथा समेटे हुए है। 11वीं शताब्दी में यहीं सबसे भीषण युद्ध लड़ा गया। महाराजा सुहेलदेव की सेना ने महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी को परास्त किया था। वहीं, इस झील का पौराणिक महत्व भी है। मान्यता है कि त्रेता युग में यह टेढ़ी नदी के रूप में जानी जाती थी। राजा जनक के गुरु मुनि अष्टावक्र का इसी झील के तट पर आश्रम था। मुनि अष्टावक्र का शरीर जिस प्रकार आठ जगहों से मुड़ा हुआ था, उसी प्रकार यह टेढ़ी नदी भी अपने आकार के लिए विख्यात है। कालांतर में यह चित्तौरा झील के रूप में लोकप्रिय हुई। 

इको टूरिज्म की मिसाल बन रहा बहराइच- अपर मुख्य सचिव  
अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने बताया कि ‘चित्तौरा झील के समग्र विकास की यह परियोजना उत्तर प्रदेश में ईको-टूरिज्म को नई दिशा देने वाली साबित होगी। उन्होंने कहा कि बहराइच जिला पहले से ही कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य के लिए देश-विदेश में अपनी पहचान बना चुका है। खास बात यह है कि जिले के कारीकोट गांव को ‘शांति और समावेशिता’ श्रेणी में प्रतिष्ठित इंडियन सबकॉन्टिनेंट रिस्पांसिबल टूरिज्म अवॉर्ड 2025 से सम्मानित किया गया है, जो यहां के सामुदायिक प्रयासों की बड़ी उपलब्धि है। नेपाल सीमा से सटे इस क्षेत्र के ग्रामीण इलाके सामुदायिक एकता, समृद्ध थारू संस्कृति और तेजी से विकसित हो रहे ग्रामीण होम-स्टे मॉडल के जरिए पर्यटन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहे हैं। इसके साथ ही बिछिया से मैलानी तक चलने वाले विस्टाडोम कोच के जरिए पर्यटक घने जंगलों, हरियाली और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों का अनूठा अनुभव भी ले सकते हैं, जो इस पूरे क्षेत्र को इको-टूरिज्म के लिहाज से और अधिक आकर्षक बनाता है।’

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