8 फीट ऊंचे शिवलिंग और उषा-अनिरुद्ध कथा के लिए प्रसिद्ध
संजय मिश्र।
देवरिया। यूपी और बिहार की सीमा रेखा पर एक ऐसा शिव मंदिर है जिसकी सीढ़ियाँ दो राज्यों को जोड़ती हैं। देवरिया मुख्यालय से करीब 40 किमी पूर्व-दक्षिण में, बिहार प्रांत के सिवान जिले की सीमा पर स्थित गुठनी प्रखंड के सोहगरा धाम शिव मंदिर स्थित है। द्वापर युगीन यह यह शिव मंदिर कई ऐतिहासिक तथ्यों से जुड़ा है तथा पौराणिक महत्ता को सुशोभित करता हुआ भक्तों के आस्था का केंद्र है।
सरयू की सहायक हिरण्यवती यानी छोटी गंडक नदी के किनारे बसा यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी बेहद खास है। इसे बाबा हंसनाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
8 फीट का विशाल शिवलिंग, 13वां ज्योतिर्लिंग होने की मान्यता
सतह से 20 फीट ऊंचे टीले पर बने इस मंदिर के गर्भगृह में लगभग 8 फीट लंबा और 2 फीट चौड़ा अति प्राचीन शिवलिंग विराजमान है। स्थानीय मान्यता और पुजारियों के अनुसार शिव पुराण की चतुर्थ कोटि रुद्र संहिता में वर्णित भगवान के 21 शिवलिंगों में यह 13वां ज्योतिर्लिंग है। शिवपुराण के 16वें पृष्ठ और श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में भी इस विशालकाय शिवलिंग का उल्लेख मिलता है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि यहाँ सच्चे दिल से मांगी गई हर मनोकामना बाबा भोलेनाथ पूरी करते हैं। यही वजह है कि सालभर यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है।
अधिक मास,महा – शिवरात्रि और श्रावण मास में हजारों भक्त करते हैं जलाभिषेक
वैसे तो साल भर श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है। लेकिन अधिक मास, महा शिवरात्रि और श्रावण मास में यहाँ का नजारा अलौकिक होता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। श्रद्धालु भोर से ही हर-हर महादेव के जयकारे लगाने लगते हैं, जो वातारण में दूर तक गूंजने लगता है।यहां हर साल भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।जिसे देखने के लिए यूपी के देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर और बिहार के सिवान, गोपालगंज, छपरा जिले समेत पड़ोसी देश नेपाल हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक लेकर पहुँचते हैं और जलाभिषेक कर अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है सोहगरा धाम
यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं बल्कि जीवंत इतिहास है। मंदिर के 5 किमी के दायरे में किसानों को खुदाई के दौरान छोटे मंदिर, किलों के भग्नावशेष, प्राचीन मूर्तियाँ, तोरणद्वार और सिक्के मिलते रहे हैं। ये पुरातात्विक साक्ष्य इसकी प्राचीनता को बल देते हैं। मंदिर के मुख्यद्वार पर अशोक चिन्ह विद्यमान है। इतिहासकारों का अनुमान है कि सम्राट अशोक ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया होगा। वहीं पुजारियों के अनुसार काशी नरेश ने संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर अपने पुत्र हंस ध्वज के नाम पर जर्जर मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। तभी से इसे बाबा हंसनाथ मंदिर कहा जाने लगा।
द्वापर युग से जुड़ी है उषा-अनिरुद्ध की प्रेम कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापर युग में मध्यावली राज्य यानी मझौली के राजा दैत्यराज बाणासुर की राजधानी शोणितपुर थी जो आज सोहनपुर के नाम से जानी जाती है। बाणासुर ने सोहगरा के सेंघोर पर्वत के वीरान जंगल में भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। शिव स्वयंभू रूप में प्रकट हुए और उसे महाबलशाली होने का वरदान दिया।
कहते हैं कि बाणासुर ने अपनी पुत्री उषा की पूजा के लिए ही इस मंदिर का निर्माण कराया था। उषा यहाँ रोज शिव उपासना को आती थी। एक रात उसने सपने में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को देखा और प्रेम कर बैठी। सखी चित्रलेखा की मदद से अनिरुद्ध को द्वारका से यहाँ लाया गया। इसी सोहगरा धाम में उषा और अनिरुद्ध ने गंधर्व विवाह किया था।
दो राज्यों की साझी विरासत
इस मंदिर की सबसे अनूठी बात है इसकी भौगोलिक स्थिति। मंदिर तक पहुँचने के लिए बनी सीढ़ियों का एक हिस्सा उत्तर प्रदेश के देवरिया में पड़ता है जबकि दूसरा हिस्सा बिहार के सिवान में। यानी भक्त एक ही मंदिर में दो राज्यों की मिट्टी पर मत्था टेकते हैं। यह समूचे पूर्वांचल में सांस्कृतिक एकता की मिसाल है।

हर हर महादेव
Har har Mahadev
Har har Mahadev
हर हर महादेव।
हर हर महादेव। भैया।
Har har Mahadev
Har har Mahadev
Har har mahadev ( prem se bolo sache darbar ki )
Har har Mahadev.
Om namah shivay.
हर हर महादेव
ॐ नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय
Achhi jankari diye hai.sarahaniy hai.
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Namah Shiva.