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लखनऊ में ज्ञानभारतम् मिशन की पांडुलिपि कार्यशाला, 1794 की रामचरितमानस बनी आकर्षण का केंद्र

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‘ज्ञानभारतम् मिशन’ से सुरक्षित होंगी करोड़ों पांडुलिपियां

लखनऊ। राजधानी लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में ज्ञानभारतम् मिशन के अंतर्गत बुधवार को आयोजित ‘पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला’ में भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास और प्राचीन धरोहरों के संरक्षण को लेकर विशेष मंथन हुआ। इस अवसर पर ‘ज्ञानभारतम् निर्देशिका’ और ‘कोलोनियल लखनऊ’ नामक दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। कार्यशाला में प्रदेशभर से आए विद्यार्थियों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा प्राचीन पांडुलिपियों का अवलोकन कर भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत को करीब से समझा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने कहा कि ज्ञानभारतम् मिशन के माध्यम से देश लगभग एक करोड़ पांडुलिपियों को एकत्रित और संरक्षित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आज ऐसा मजबूत मिशन तैयार हो चुका है, जिसके जरिए आम लोग भी अपनी पारिवारिक और निजी पांडुलिपियों को सुरक्षित रख सकते हैं। उन्होंने शोधार्थियों से इतिहास के महत्व को समझने और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। साथ ही विश्वास जताया कि पांडुलिपियों के संरक्षण के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश पूरे देश में प्रथम स्थान हासिल करेगा।

विशिष्ट अतिथि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के आधुनिक भारतीय इतिहास विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ने “भारतीय ज्ञान परंपरा में पांडुलिपियों का महत्व” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की अनेक चुनौतियों का समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित है और पांडुलिपियां हमारी बौद्धिक विरासत की सबसे महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

1794 की रामचरितमानस और दुर्लभ गीता पांडुलिपि बनीं आकर्षण का केंद्र
कार्यशाला में प्रदेश के सभी जिलों से आए लगभग 250 से अधिक छात्र-छात्राओं ने भाग लिया और दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन किया। यहां प्रदर्शित श्रीमद्भगवद्गीता की दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपि विशेष आकर्षण का केंद्र रही। वर्ष 1967 की इस पांडुलिपि में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित सात सुंदर चित्रों के साथ भगवद्गीता के सभी 700 श्लोक संकलित हैं। वहीं रामचरितमानस की प्राचीन हिन्दी पांडुलिपि ने भी प्रतिभागियों को आकर्षित किया। वर्ष 1794 की इस दुर्लभ पांडुलिपि में भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों से जुड़े लगभग 400 मनोहारी चित्र बनाए गए हैं। प्रत्येक पृष्ठ पर दोहा और चौपाई के साथ चित्रों का विस्तृत विवरण भी अंकित है, जो इसे बेहद विशेष बनाता है।

इस कार्यक्रम पर अपने विचार प्रकट करते हुए पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा देश की सबसे बड़ी धरोहर है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि ‘ज्ञानभारतम् मिशन’ जैसी पहलें केवल पांडुलिपियों के संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य और लोक ज्ञान को वैश्विक स्तर पर नई पहचान देने का माध्यम बन रही हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि उत्तर प्रदेश पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और शोध के क्षेत्र में देश में अग्रणी भूमिका निभाएगा तथा युवाओं को अपनी जड़ों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने में यह अभियान महत्वपूर्ण साबित होगा।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में डॉ. वंदना सिंह ने ज्ञानभारतम् पोर्टल, मोबाइल एप और पांडुलिपि सर्वेक्षण पर विस्तार से जानकारी दी। वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. अशोक शतपथी ने पांडुलिपियों की पहचान और राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला। सहायक निदेशक (संरक्षण) विजय कुमार श्रीवास्तव ने पांडुलिपि सर्वेक्षण के दौरान ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी दी। संस्कृति विभाग के विशेष सचिव, संजय कुमार सिंह ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।

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