कामेश त्रिपाठी।
बढ़ रहा है सूर्य अपनी,रथ सजा कर रश्मियों का।
छिपता तिमिर भयभीत हो,है तेज ऐसा रश्मियों का।।
बढ़ रही आभा जगत में,संचार होती चेतना का।
कोपलें विकसित हुई,विस्तार करती चेतना का।।
कपोत, केकी, कीर,कोयल,, हंस,हारिल, मुर्ग, चातक।
कर रहे कलरव से गुंजित,, वन, वाग,उपवन,वाटिका तक।।
सर, कूप,सरिता, नद,सरोवर,, ताल,झरने,सिंधु, बादल।
गिरती हुई हिम की फुहारें,भींगता अवनी का आंचल।।
स्वर्ण के आभूषणों सी, सज रही हिमगिरि की चोटी।
पड़ रही पहली किरण से, स्वर्ण आभा है निकलती।।
उत्साह है सारी प्रकृति में,एक हलचल सी मची है।
थम चुकी थी जो अवस्था,हो रही चंचल सभी हैं।।
प्रभात भी होता प्रभावित,जो प्रभाकर की प्रभा है।
ब्योम से होती बिखंडित,चांद तारों की सभा है।।
बहती हवा सुरभीत सीतल,लहलहाते खेत उपवन।
सूर्य की पहली किरण से,जग उठा धरती गगन।।
