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जनता का बदला मूड और राजनीतिक समीकरणों का उलटफेर

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बदलते समीकरणों में बंगाल की राजनीति का नया अध्याय

संजय मिश्र।

देवरिया। पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। इस दिन आए चुनावी नतीजों ने राज्य की सत्ता संरचना को पूरी तरह बदल दिया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया। पिछले डेढ़ दशक से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को इस बार करारी हार का सामना करना पड़ा, जबकि भाजपा ने मजबूत जनादेश के साथ सत्ता में वापसी की।
यह जीत अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों की रणनीति, संगठन विस्तार और बदलते राजनीतिक समीकरणों का बड़ा योगदान रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक अपील और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक “चाणक्य नीति” का संयुक्त प्रभाव है, जिसने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी।
अगर पिछले तीन विधानसभा चुनावों की तुलना की जाए तो बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने 184 सीटें जीतकर 34 साल पुराने वाम मोर्चे के शासन का अंत किया था, जबकि भाजपा उस समय राज्य में अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। 2016 में टीएमसी ने अपनी स्थिति और मजबूत करते हुए 211 सीटें जीतीं, वहीं भाजपा को केवल 3 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
लेकिन 2021 का चुनाव बदलाव का संकेत लेकर आया, जब भाजपा ने 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। टीएमसी ने उस चुनाव में 215 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी, लेकिन राजनीतिक हवा बदलने लगी थी। यही वह समय था जब भाजपा ने बंगाल में अपनी जड़ें मजबूत करनी शुरू कीं और जमीनी स्तर पर संगठन विस्तार पर जोर दिया।
राजनीतिक जानकारों का ऐसा मानना है कि भाजपा का वोट शेयर 2014 के बाद लगातार बढ़ता रहा। 2016 से लेकर 2026 के बीच पार्टी ने न सिर्फ अपनी सीटों में वृद्धि की बल्कि वोट प्रतिशत में भी स्थायी बढ़ोतरी दर्ज की। भले ही लोकसभा चुनावों में सीटों का आंकड़ा सीमित रहा हो, लेकिन वोट बैंक में गिरावट नहीं आई, जो पार्टी के बढ़ते जनाधार का संकेत था।
इस बार के चुनाव में भाजपा ने टीएमसी को सीधी चुनौती दी और कई सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक मुद्दों को जनता के बीच मजबूती से उठाया। पार्टी ने महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था को प्रमुख मुद्दा बनाया, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में असर देखा गया। इस चुनाव की सबसे बड़ी चर्चा भवानीपुर सीट रही, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया। यह हार टीएमसी के लिए केवल एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि एक प्रतीकात्मक झटका भी था, जिसने ममता बनर्जी के 15 वर्षों के लंबे शासन को समाप्त कर दिया।
चुनावी प्रक्रिया के दौरान ममता बनर्जी के भाषणों में भी आत्मविश्वास की कमी देखी गई। एक रैली में उनका यह कहना—“अगर आप कर सकते हैं, तो मुझे वोट दें”—राजनीतिक विश्लेषकों के लिए संकेत था कि सत्ता की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। भाजपा के लिए बंगाल हमेशा से एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र रहा है। यह राज्य वैचारिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी भूमि से थे। इस जीत को भाजपा अपने वैचारिक विस्तार के रूप में भी देख रही है।


चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “अंग, बंग और कलिंग” का नारा दिया, जिसे भाजपा की पूर्वी भारत में विस्तार रणनीति का हिस्सा माना गया। गृह मंत्री अमित शाह ने भी पहले चरण के मतदान के बाद दावा किया था कि पार्टी इन तीनों क्षेत्रों में मजबूत सरकार बनाएगी। अब जब बंगाल में भाजपा सत्ता में लौट आई है, यह नारा फिर से चर्चा में है।
हालांकि इस जीत के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण भी माने जा रहे हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर बड़ा आक्रोश पैदा किया, जिसका असर मतदान पर साफ दिखाई दिया। शहरी मतदाता, विशेषकर कोलकाता और व्यापारिक वर्ग, इस बार सत्ता विरोधी रुख में नजर आए।
भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और सिंडिकेट सिस्टम जैसे मुद्दों ने भी सरकार की छवि को प्रभावित किया। वहीं, “लक्ष्मी भंडार” और “कन्याश्री” जैसी योजनाओं के बावजूद युवा और शिक्षित वर्ग रोजगार, शिक्षा और दीर्घकालिक विकास को प्राथमिकता देने लगा, जिससे वोटिंग पैटर्न में बदलाव आया।


मतदाता सूची संशोधन को लेकर भी विवाद सामने आया, जिसमें विपक्ष ने अपने समर्थकों के नाम हटाए जाने का आरोप लगाया। हालांकि इस पर राजनीतिक बहस जारी रही, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर महसूस किया गया।
बहरहाल कुल मिलाकर यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक सोच और सामाजिक दृष्टिकोण का परिणाम है। पश्चिम बंगाल की जनता ने इस बार विकास, सुरक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए एक नया जनादेश दिया है, जिसने राज्य की राजनीति को एक नए दौर में प्रवेश करा दिया है।

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3 thoughts on “जनता का बदला मूड और राजनीतिक समीकरणों का उलटफेर

  1. ऐतिहासिक जीत बहुत बहुत बधाई बीजेपी

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