कवि कामेश त्रिपाठी की संवेदनशील कविता, जिसमें प्रकृति और भावनाओं का अद्भुत संगम
लेखक:
कामेश त्रिपाठी
उठाया लेखनी जब भी किसी का रूप लिखने को।
शब्द की रेखा तले जब चित्र गढ़ने को।।
उड़ा है जब कभी मन का परिंदा आसमां में दूर तक,
बही है भाव की दरिया कभी जब स्वप्न सागर तीर तक,
ठिठकता है कहीं पर मन ठहर सा पैर जाता है।
प्रकृति का रूप तब आंखों के आगे तैर जाता है।।
वृहद है रूप इसका और सुंदरता की जननी है,
करो श्रृंगार शब्दों से भरो जो भाव भरनी है।
शब्द है थोड़े असीमित यह कहानी है,
नजर सीमित हमारी है नजारों में रवानी है।
कोई जब गीत लिखता हूं हमारा मन किसी के ठौर जाता है।
प्रकृति का रूप तब आंखों के आगे तैर जाता है।।
सभी उपमा प्रकृति से ही लिए सारे कवि लेखक,
उतारे हैं प्रकृत को भी जरा से दायरे में सब।
चांद को मुख में उतारे बादलों को केस में,
दिखाया है फिजाओं को सदा ही आदमी के भेष में।
लिखना चाहता हूं जब कोई एक रूप बनकर और आता है।
प्रकृत का रूप तब आंखों के आगे तैर जाता है।।
