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वैज्ञानिकों ने अंगूरों में बीज-रहित होने के आनुवंशिक आधार का पता लगाया

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डेस्क। वैज्ञानिकों ने अंगूरों में बीज-रहित होने के पीछे की मुख्य आनुवंशिक और विकासात्मक प्रक्रिया का पता लगाया है। यह दुनिया भर के उपभोक्ताओं और अंगूर उद्योग द्वारा अत्यधिक सराहा जाने वाला गुण है। अंगूर दुनिया भर की सबसे महत्वपूर्ण बागवानी फसलों में से एक हैं और इनके उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा ताज़े फल के रूप में या किशमिश जैसे सूखे उत्पादों के रूप में उपयोग किया जाता है। उपभोक्ता पतली त्वचा, मीठे स्वाद और अच्छी बनावट वाले बीज-रहित अंगूरों को ज़्यादा पसंद करते हैं, जिसके कारण प्रजनन कार्यक्रमों में बीज-रहित होना एक अत्यंत वांछनीय गुण बन गया है।
बीज-रहित अंगूरों की वैश्विक स्तर पर मांग लगातार बढ़ रही है, चाहे वे ताज़ा खाने के लिए हों या फिर किशमिश और जूस जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के लिए। हालाँकि, अपनी लोकप्रियता के बावजूद, अंगूर की बेल में बीज के विकास और बीज-रहित होने को नियंत्रित करने वाली जैविक प्रक्रियाएँ अभी भी पूरी तरह से समझ में नहीं आई हैं।
भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त संस्थान, आगरकर अनुसंधान संस्थान, पुणे ने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के सहयोग से किये गए इस अनुसंधान से, पराग बंध्यता के आणविक और जीनोमिक आधार की नई जानकारी मिली है जिसके कारण बीज-रहित अंगूर बनते हैं। यह अनुसंधान भविष्य में प्रजनकों को बेहतर उपज और गुणवत्ता वाली उन्नत बीज-रहित अंगूर की किस्में विकसित करने में मदद कर सकता है।
हाल ही में बीएमसी प्लांट बायोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में, संस्थान द्वारा विकसित उच्च उपज वाली अंगूर की किस्म एआरआई-516 से उत्पन्न एक बीज-रहित म्यूटेंट (उत्परिवर्ती) की जांच की गई। डॉ. रविंद्र पाटिल के नेतृत्व में अनुसंधान दल ने बीजयुक्त अंगूर की किस्म एआरआई-516 और उसके बीजरहित उत्परिवर्ती का विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन किया ताकि बीजरहितता के अंतर्निहित विकासात्मक और आनुवंशिक परिवर्तनों की पहचान की जा सके। प्रजनन ऊतकों की सूक्ष्मदर्शी जांच के माध्यम से, अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि बीजरहित उत्परिवर्ती में परागकणों की असामान्य आकृति, परागकणों की बहुत कम जीवन क्षमता और परागकणों के अंकुरण की पूर्ण अक्षमता पाई गई, जो बीजरहितता में परागकण बांझपन को एक प्रमुख कारक के रूप में इंगित करती है। आगे के शारीरिक अध्ययन से पता चला कि उत्परिवर्ती पौधों में मादा प्रजनन संरचनाएं (मैक्रोगेमेटोफाइट्स) बीजयुक्त जनक किस्म की तुलना में काफी छोटी थीं। ये असामान्यताएं निषेचन प्रक्रिया को बाधित करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप अंततः बीजरहित फल बनते हैं।

अंतर्निहित आणविक तंत्रों का पता लगाने के लिए, वैज्ञानिकों ने फूल और फल (बेरी) के विकास के विभिन्न चरणों में ट्रांसक्रिप्टोमिक विश्लेषण (आरएनए सीक्वेंसिंग) किया, जिसके परिणामों से पता चला कि नर युग्मकोद्भिद  के विकास, पराग परिपक्वता, कोशिका विभाजन और हार्मोन सिग्नलिंग मार्गों में शामिल कई जीन बीज-रहित म्यूटेंट में काफी कम सक्रिय थे। इस अनुसंधान में बीज वाले और बीज-रहित पौधों के बीच आनुवंशिक अंतर का पता लगाने के लिए ‘होल-जीनोम सीक्वेंसिंग’ का भी उपयोग किया गया, जिसके विश्लेषण ने पराग विकास से जुड़े जीन में कई ‘इंसर्शन-डिलीशन म्यूटेशन’ (इन्डेलस) की पहचान की। ये म्यूटेशन संभवतः सामान्य पराग निर्माण और कार्यप्रणाली को बाधित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पराग बंध्यता  और बाद में बीज-रहित फलों का विकास होता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, संयुक्त जीनोमिक और ट्रांसक्रिप्टोमिक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि उत्परिवर्ती (म्यूटेंट) अंगूर की बेल में बीज-रहित फेनोटाइप ‘पार्थेनोकार्पी’ (अनिषेकफलन) के माध्यम से उत्पन्न होता है, जो एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पराग निर्माण और प्रजनन विकास में दोष के कारण निषेचन के बिना ही फल विकसित हो जाता है।

यह अध्ययन आधुनिक जीनोमिक उपकरणों का उपयोग करके अंगूरों में पार्थेनोकार्पिक (अनिषेकफलित) बीज-रहित होने की प्रक्रिया को समझने के सबसे व्यापक प्रयासों में से एक है। पराग बंध्यता और बीज-रहित होने से जुड़े जीनों की पहचान अंगूर प्रजनन कार्यक्रमों के लिए मूल्यवान आणविक मार्कर प्रदान कर सकती है। ऐसा ज्ञान फल की बेहतर गुणवत्ता, उपज और अनुकूलन क्षमता वाली नई बीज-रहित अंगूर की किस्मों के विकास को महत्वपूर्ण रूप से तेज कर सकता है, जिससे अंगूर उत्पादकों और बागवानी क्षेत्र को लाभ होगा।

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