डेस्क। इस वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी, रविवार को पड़ रही है। इसी पावन अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह उत्सव के रूप में महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, साधना और आत्मचिंतन का महान अवसर है। ज्योतिषाचार्य पंडित सुनील पांडेय के अनुसार चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी शाम 5:04 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी शाम 5:00 बजे तक रहेगी। इस दौरान शिव आराधना का विशेष महत्व है। प्रातः 6:43 बजे से सायं 7:48 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा, जो सभी कार्यों की सिद्धि प्रदान करने वाला शुभ योग माना जाता है। इस दिन उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के उपरांत श्रवण नक्षत्र प्रारंभ होगा, जो 16 फरवरी सायं 8:47 बजे तक रहेगा। श्रवण नक्षत्र में भगवान शिव की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:48 से 12:53 बजे तक रहेगा, जबकि अमृतकाल 12:59 से 2:41 बजे तक शुभ रहेगा।
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व
महाशिवरात्रि को वह रात्रि माना जाता है जब भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। यह पर्व संयम, तपस्या और श्रद्धा का प्रतीक है। भक्तजन इस दिन उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग का जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा आदि से अभिषेक करते हैं। भगवान शिव को बेलपत्र अति प्रिय है। बेलपत्र की तीन पत्तियाँ त्रिदेव और त्रिगुणों का प्रतीक मानी जाती हैं। धतूरा और आक का पुष्प अर्पित करने का भी विशेष महत्व है, जो शिव के वैराग्य और साधना का प्रतीक है।
शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि पर सच्चे मन से “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करने से सभी पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह दिन आत्मशुद्धि, नकारात्मकता के त्याग और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का पर्व है।
कैसे करें पूजा
महाशिवरात्रि के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिवलिंग का गंगाजल या शुद्ध जल से अभिषेक करें। इसके पश्चात दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें। बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा और फल अर्पित करें। रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देने वाला पर्व है। इस पावन दिन श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा-अर्चना जीवन में शांति, शक्ति और सकारात्मकता प्रदान करती है।