चंद्रशेखर आजाद की पारिवारिक विरासत बदरका को मिलेगी नई पहचान
लखनऊ/उन्नाव। स्वतंत्रता संग्राम सर्किट को विकसित कर आजादी के आंदोलन से जुड़े स्थलों को पर्यटन की नई पहचान देने पर उत्तर प्रदेश सरकार विशेष जोर दे रही है। इसी क्रम में संस्कृति विभाग द्वारा अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पारिवारिक विरासत से जुड़े उन्नाव के बदरका को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से यहां बहुद्देशीय परिसर का निर्माण तेजी से चल रहा है, जिसका 75 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो चुका है और नवंबर माह तक परियोजना के पूरा होने की उम्मीद है। परियोजना पूरी होने के बाद बदरका न केवल सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए सुविधासंपन्न केंद्र बनेगा, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली गाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण विरासत स्थल के रूप में भी विकसित होगा।
5 करोड़ से बदरका का कायाकल्प, आजाद की जन्मस्थली पर बन रहा 450 लोगों की क्षमता वाला बहुद्देशीय हॉल
परियोजना के तहत मुख्य भवन में 450 लोगों की क्षमता वाला बहुद्देशीय हॉल तैयार किया जा रहा है। इसके साथ महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग ग्रीन रूम व शौचालय ब्लॉक, स्टाफ रूम, कार्यालय, रिकॉर्ड रूम, पेंट्री, बरामदा, पैसेज, लाइब्रेरी और स्टोर रूम बनाए जा रहे हैं। परिसर में सीसी रोड, इंटरलॉकिंग, रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, 3 एचपी की बोरिंग और गेट जैसी सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। इससे आने वाले समय में यहां विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकेगा।

निर्माण कार्य की मौजूदा स्थिति भी परियोजना के तेजी से आगे बढ़ने की तस्वीर पेश कर रही है। करीब 50 प्रतिशत स्लैब का काम पूरा हो चुका है, जबकि मुख्य हॉल के स्लैब का निर्माण जारी है। भूतल और प्रथम तल पर ईंट की चिनाई के साथ प्लास्टर का काम भी चल रहा है। इसके अलावा सीसी रोड और गार्ड रूम का निर्माण भी प्रगति पर है।
शहीद चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गांव में हुआ था। उनके पिता सीताराम तिवारी मूल रूप से उन्नाव के बदरका गांव के रहने वाले थे और नौकरी के सिलसिले में परिवार भाबरा चला गया था। बचपन से ही चंद्रशेखर निशानेबाजी और धनुर्विद्या में रुचि रखते थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की भावना को और प्रबल किया और उन्होंने देश की आजादी के संघर्ष में खुद को समर्पित कर दिया। 27 फरवरी 1931 को प्रयागराज के तत्कालीन अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उस समय उनकी उम्र महज 24 वर्ष थी। बाद में इसी स्थान का नाम चंद्रशेखर आजाद पार्क रखा गया।
आजाद के जीवन और बलिदान से नई पीढ़ी को जोड़ना प्रदेश सरकार की प्राथमिकता : जयवीर सिंह
इस पर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि, बदरका को केवल एक स्मारक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की जीवनगाथा, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण विरासत केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। प्रदेश सरकार का प्रयास है कि यहां आधुनिक सुविधाओं के साथ ऐसा वातावरण तैयार हो, जहां आने वाले लोग आजाद के जीवन और उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें। बहुद्देशीय परिसर के विकसित होने से बदरका में सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी नया मंच मिलेगा। आने वाले समय में बदरका को आजाद की पारिवारिक विरासत से जुड़े प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर इतिहास, संस्कृति और युवा पीढ़ी के बीच मजबूत सेतु तैयार किया जाएगा।
