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सत्य और शक्ति का संगम: देवी उपासना में जीवन, संघर्ष और दिव्यता की अनुभूति

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हृदयनारायण दीक्षित
सत्य प्रत्येक परिस्थिति में उपयोगी होता है, लेकिन जीवन संघर्ष में सत्य के साथ शक्ति भी चाहिए। श्रीराम और रावण के बीच हुआ युद्ध काफी लंबा चला था, लेकिन प्रारंभिक चरण में श्रीराम की विजय सुनिश्चित नहीं थी। इसको लेकर काफी चिंता थी। प्रख्यात कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ ने ’राम की शक्ति पूजा’ में युद्ध का भावुक वर्णन किया है। एक सायं सभी योद्धा शिविर में लौटे। निराला जी लिखते हैं, ”आए तब शिविर, सुग्रीव, विभीषण जामवंत, अंगद/हनुमान बैठे रघुकुल मणि श्वेत शिला पर।” निराला जी ने श्रीराम के संशय का उल्लेख किया है, ”बोले रघुमन विजय न होगी न समर ये नहीं रहा नर वानर का राक्षस से रण। उतरी पा महाशक्ति रावण से आमंत्रण।” श्रीराम बेचैन हैं। अन्याय जिधर है उधर शक्ति। श्रीराम को आश्चर्य था कि महाशक्ति रावण के पक्ष में क्यों हैं? जामवंत ने कहा, ”रघुवर विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण। हे पुरुष सिंह तुम भी यह शक्ति करो धारण। आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर। शक्ति की करो मौलिक कल्पना। करो पूजन।”
रावण ने अपने तप बल से तमाम शक्तियां अर्जित की थीं। शक्ति उपासना का उत्तर शक्ति उपासना में ही संभव है। राम ने भी शक्ति पूजा का आश्रय लिया। राम आसन जमा कर बैठे। आठवें दिन ध्यान ऊर्ध्व शिखर पर पहुंचा। वे प्रत्येक पुरश्चरण के बाद देवी के चरणों में नीलकमल चढ़ाते थे। अंतिम आराधन में श्रीराम ने जैसे ही नीलकमल के लिए अपना हाथ बढ़ाया, नीलकमल गायब था। श्रीराम चिंतित हो गए। हमारा लाया हुआ नीलकमल कहां गया। उन्होंने तत्काल विकल्प बनाया। माताजी मुझको राजीव नयन कहती थीं। मैं वहीं अपने नयन अर्पित करूंगा। निराला जी कहते हैं ब्रह्मांड कांपा। देवी का उदय हुआ। देवी ने राम का हाथ पकड़ा, ”देखा राम ने सामने श्री दुर्गा भास्वर।” निराला ने लिखा है, ”होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन कहे महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन।”
शक्ति का अर्जन, उपासन पुरष्चरण और जागरण लोक को प्रकाश और आनंद से भर देता है। दुर्गा सप्तशती देवी उपासना के पांचवें अध्याय में देवी को प्रत्येक रूप और भाव में भरा पूरा बताया गया है। यहां देवी लज्जा हैं। विद्या हैं। माता हैं। कण कण में व्याप्त हैं। 11वें अध्याय के अंतिम श्लोक में देवी सबको आश्वासन देती हैं कि जब-जब बाधाएं आएंगी। दानवी शक्तियां कष्ट देंगी। तब तब मैं प्रकट होऊंगी और दानवी शक्तियों का नाश करूंगी। यहां गीता की ध्वनि है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ”जब-जब धर्म का पराभव होगा तब तब सज्जनों की रक्षा और धर्म के अभ्युदय के लिए मैं आऊंगा।”
देवी माता हैं। माता जननी होती हैं। मां न होती तो हम न होते। भारत के कोने-कोने देवी उपासना के प्रतिष्ठित मंदिर हैं। असम के गुवाहाटी में मां कामाख्या देवी मंदिर है। कोलकाता में काली जी का और मध्य प्रदेश के दतिया में पीतांबरा का मंदिर है। मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश में विंध्यवासिनी, टनकपुर, उत्तराखंड में पूर्णागिरी का मंदिर है। ढाका, बांग्लादेश में ढाकेश्वरी मां का मंदिर है। बलूचिस्तान, पाकिस्तान में हिंगलाज माता का मंदिर है। इन मंदिरों में प्रतिवर्ष करोड़ों की संख्या दर्शनार्थ जाती है।
देवी उपासना की शुरुआत का आदि केंद्र भारत है। प्रकृति की शक्तियों को माता देखने और आदर देने की परंपरा प्राचीन है। ऋग्वेद में पृथ्वी माता हैं। गाय माता हैं। अवध्य और पूज्य हैं। सरस्वती माता हैं। वन की एक देवी अरण्यानी भी हैं। यजुर्वेद में लक्ष्मी, अम्बिका आदि देवियां हैं। वैदिक ग्रंथों में जल भी माता के रूप में उपास्य हैं। ईसा पूर्व (छठी शताब्दी) यूनानी दार्शनिक थेल्स ने सृष्टि का उद्भव जल से बताया। इसके पहले ऋग्वेद में जल को जल माताएं ‘आपः मातरम्‘ कहा गया है। इडा, सरस्वती और मही नाम की तीन देवियों का उल्लेख ऋग्वेद (5.5.8) में है। यहाँ रात्रि भी माँ है। ऋग्वेद (10.127) में रात्रि भी उपास्य देवी हैं। कहते हैं, ‘‘रात्रि माँ के आंचल में पैरों से चलने वाले, पंखों से उड़ने वाले कीट पतिंग और पथिक सुखपूर्वक सोते हैं।” अथर्ववेद में रात्रि देवी को संवत्सर की प्रतिमा कहा गया है। भारतीय देवतंत्र में देवी माँ की अनुभूति गहरी है।
ऋग्वेद में वाणी देवी हैं। वे कहती हैं, ‘‘मैं रूद्र, वसु, आदित्य और विश्व देवों के रूप में विचरण करती हूँ। मैं मित्र वरुण इंद्र, अग्नि और अश्विनी कुमारों को धारण करती हूँ। मैं सृष्टि के सभी प्रपंचों रूपों भावों में स्थित हूँ। मेरी सहायता से ही प्राणी अन्न खाते हैं। देखते हैं। सांस लेते हैं। सुनते हैं। मैं जिसे चाहती हूँ उसे शक्तिशाली स्तोता, ऋषि और बुद्धिमान बनती हूँ। मेरा निवास जल में है। वहीं से मैं सारे संसार में विस्तृत होती हूँ।‘‘ सही बात है। जल सृष्टि का आदि तत्व है। दिव्यता का आदिकेन्द्र है। देवी वहीं हैं। वे अव्यक्त से व्यक्त होकर सृष्टि बनती हैं और बनाती हैं। ऋग्वेद का यही पूरा सूक्त अथर्ववेद में भी है। अथर्ववेद में अमावस्या और पूर्णिमा भी देवी हैं।
देवी दिव्यता हैं। दिव्यता अनंत रूपों आयामों में प्रकट होती है। दिव्यता के रूप नाम अनेक हैं। कहीं दुर्गा हैं तो कहीं वाराही। खड्गधारिणी, शूलधारिणी और वैष्णवी। शाश्वत सत्य एक है। उसका कथन और आस्वश्ति एक है। हड़प्पा की खोदाई में देवी पूजा के तमाम साक्ष्य मिले थे। पत्थर की मोहरों पर देवी का अंकन अनुमानित किया गया। मौर्य काल के पुरातात्विक साक्ष्यों में देवी अभयदान की मुद्रा में हैं। महाभारत के भीष्म पर्व में अर्जुन की दुर्गा स्तुति का उल्लेख है। विराट पर्व में युधिष्ठिर भी देवी की पूजा करते हैं।
दुर्गा सप्तशती सर्वाधिक लोकप्रिय है। नवरात्रि उत्सवों में इसका पाठ होता है। इसकी कथा मजेदार है। यहाँ एक राजा हैं सुरथ। वे मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचे। समाधि नाम का वैश्य है। उसने परिश्रमपूर्वक धन जुटाया था। घर वालों ने उसे घर से निकाल दिया। वह भी ऋषि आश्रम पहुंचा। सुरथ नाम में रथ गति का प्रतीक है और सु सुंदरता का। लेकिन सुरथ सुगति नहीं पा सके। समाधि का अर्थ मन से मुक्ति होता है। लेकिन यहाँ समाधि नाम के वैश्य धन की चिंता में पीड़ित और परेशान हैं। मेधा ऋषि हैं। मेधा ऋषि ही बनाती है। मेघा दोनों को देवी रहस्य बताते हैं। ऋषि के प्रबोधन से सुरथ सुरथी बनते हैं और समाधि नाम के वैश्य समाधि का वास्तविक अर्थ जान जाते हैं। सप्तशती के पाठ की परंपरा है। पाठ अध्ययन नहीं होता। अध्ययन में बुद्धि साझी होती है। सोच विचार भी चलता है। लेकिन पाठ में हृदय लगता है। तब शब्द अपना मूल अर्थ खो देते हैं। शब्दों के गर्भ में छिपी अक्षर शक्ति प्रकट होती है। यही बात देवी मंदिरों के दर्शन में भी है। देव प्रतीति प्राचीन परंपरा है। इस अनुभूति को दुर्गा, लक्ष्मी, वाराही, काली सहित कोई नाम दीजिए। नाम से फर्क नहीं पड़ता। सर्वत्र एक ही ऊर्जा है। भीतर, बाहर। ऊपर, नीचे, आगे, पीछे।

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