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सरिस्का टाइगर रिजर्व में Tiger Reintroduction National Workshop, भूपेंद्र यादव ने किया उद्घाटन

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अलवर। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने 28 जून को राजस्थान के अलवर में “टाइगर री-इंट्रोडक्शन: अवसर और चुनौतियां” पर राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। इस मौके पर राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा, वन महानिदेशक और विशेष सचिव (एमओईएफसीसी) सुशील कुमार अवस्थी, इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के महानिदेशक एस.पी. यादव और एडीजीएफ (प्रोजेक्ट टाइगर) व सदस्य सचिव, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) संजय कुमार भी मौजूद थे।

इस कार्यशाला में विभिन्न राज्यों और टाइगर रिजर्व से 12 मुख्य वन्यजीव वार्डन और 18 फील्ड निदेशक शामिल हुए। उन्होंने उन इलाकों में बाघों को फिर से बसाने, उनकी संख्या बढ़ाने और उनकी आबादी को बहाल करने के लिए वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और प्रबंधन रणनीतियों पर चर्चा की, जहां बाघों की कमी है। तकनीकी सत्रों में बाघों की आबादी के सक्रिय प्रबंधन, शिकार की उपलब्धता बढ़ाने, आवास को बहाल करने, भू-दृश्य संपर्क और बाघ व चीता पुनर्वास कार्यक्रमों से मिले अनुभवों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

तकनीकी सत्र का शुभारंभ भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के टाइगर सेल द्वारा “बाघ-रहित क्षेत्रों में बाघों की संख्या बढ़ाने का रोडमैप: भारत में बाघ अभ्यारण्यों के सक्रिय प्रबंधन की रूपरेखा” विषय पर प्रस्तुति के साथ हुआ। इसमें उपयुक्त भू-भागों में बाघों की आबादी को बहाल करने के लिए एक वैज्ञानिक रूपरेखा भी प्रस्तुत की गई। विचार-विमर्श के आधार पर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा संबंधित राज्य वन विभागों के सहयोग से कुछ बाघ अभ्यारण्यों को लक्षित संरक्षण कार्यों के लिए चिन्हित किया गया। डब्ल्यूआईआई के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने स्थानीय स्तर पर शिकार की उपलब्धता बढ़ाने के महत्व और गौर तथा बारहसिंगा के स्थानांतरण की भूमिका पर प्रकाश डाला, जो शिकार की आबादी को मजबूत करने और बाघों के दीर्घकालिक संरक्षण में सहायक हैं।

मुख्य वन्यजीव वार्डन और फ़ील्ड निदेशकों ने सरिस्का, मुकुंदरा हिल्स, पन्ना, वीरांगना दुर्गावती, सतकोसिया, सिमलीपाल, राजाजी, सह्याद्रि और नवेगांव-नागज़िरा टाइगर रिज़र्व में बाघों को फिर से बसाने, उनकी संख्या बढ़ाने और उनमें नए बाघ शामिल करने के कार्यक्रमों पर केस स्टडीज़ पेश कीं। इन प्रस्तुतियों में ट्रांसलोकेशन की योजना, छोड़ने के बाद निगरानी, ​​प्राकृतिक वास को ठीक करने, सुरक्षा, सामुदायिक भागीदारी और अनुकूली प्रबंधन से जुड़े फ़ील्ड के अनुभव, उपलब्धियां, काम में आने वाली चुनौतियां और सीखे गए सबक साझा किए गए, जो भविष्य में संरक्षण की कोशिशों के लिए खासी अहमियत रखते हैं।

बक्सा, अचानकमार, उदंती-सीतानदी, इंद्रावती और पलामू जैसे कम बाघ घनत्व वाले रिज़र्व के प्रतिनिधियों ने भविष्य में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए इन इलाकों की तैयारियों के बारे में जानकारी दी। कार्यशाला से ​​मिली सिफारिशें भविष्य में बाघों को फिर से बसाने, उनकी संख्या बढ़ाने, उनके रहने की जगह को ठीक करने और उनके शिकार की उपलब्धता बढ़ाने के कार्यक्रमों के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करती हैं। साथ ही, ये राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, राज्य वन विभागों, वैज्ञानिक संस्थानों और संरक्षण सहयोगियों के बीच आपसी सहयोग को भी मजबूत करती हैं।

‘प्रोजेक्ट चीता’ पर एक खास सत्र में भारत के सफल चीता पुनर्वास कार्यक्रम, जो दुनिया का पहला अंतर-महाद्वीपीय बड़े मांसाहारी जानवर का पुनर्वास कार्यक्रम था, को दिखाया गया। साथ ही, भविष्य में वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने और उन्हें फिर से बसाने की कोशिशों के लिए इससे मिलने वाली सीख पर भी जोर दिया गया। कार्यशाला के बाद, प्रतिभागियों ने सरिस्का टाइगर रिज़र्व का दौरा किया। उन्होंने वहां जानवरों के रहने की जगह के प्रबंधन के तरीकों को देखा और उन संरक्षण उपायों की समीक्षा की, जिनकी वजह से पिछले 18 वर्षों में रिज़र्व में बाघों की संख्या सफलतापूर्वक बढ़ पाई है।

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