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प्राकृतिक ध्वनि

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कामेश त्रिपाठी।

‘अज्ञेय’ ने कहा है कि ‘सन्नाटे में ध्वनि होती है’ ध्वनि का अर्थ है आवाज़ अर्थात् आवाज हर जगह होती है। यहां तक की जिस स्थान पर पूरी तरह शांति छाई होती है वहां भी एक ऐसी ध्वनि होती है जो बाह्य कर्णेन्द्रियों से परे होती है ,परन्तु आन्तरिक अवस्था में स्वतः उतर जाती है और व्यक्ति को महसूस होने लगता है की कुछ ध्वनि तिरोहित हो रही है, सन्नाटे की ध्वनि भी अजीब होती है यह सुनाई नहीं देती परन्तु एहसास होता है कि कुछ सुना जा रहा है।

सूनसान स्थान पर जहां किसी भी तरह की कोई हलचल नहीं अत्यंत शांति है जहां न समाज का हो हल्ला हो न पक्षियों का कलरव है न तो नदियों और झरनों की कलकलाहट ही है । पूर्णरूपेण ‘सन्नाटा’ । परन्तु जब ऐसे स्थान पर हमें एक ध्वनि महसूस होती है तो निश्चित हम भी अपने अंदर की शांति को महसूस करते हैं। क्योंकि जब तक अन्दर अशांति होगी हलचल होगी विचारों की लहरें हिलोर मारती रहेंगी तब हमें उस ध्वनि का सही रूप में एहसास नहीं हो पायेगा। वह ध्वनि एक तरह से शांति की गूंज है जो की बाह्य जगत की शांति से उठकर हमारे अन्तर जगत में स्वतः से उतरने लगती है। अर्थात् सन्नाटे की ध्वनि को महसूस करने के लिये सर्वप्रथम अपने अन्तर्जगत को शांत कर लेना होगा और यह तभी होगा जब हम विचारो के वेग से खुद को निकालकर अलग कर सकेंगे। और जब हम अपने अंदर के विचारों से परे होगें तो निश्चित ही प्रकृति की हर उस आवाज को महसूस कर सकेंगें जो वास्तव में हमेें परम तत्व से बात करने के लायक बनाती है। हमारे मनोमस्तिष्क पर सांसारिकता का ऐसा वेग हर वक्त हिलोर लेता रहता है जो हमें खुद के अन्तर्जगत में उतरने में रुकावट पैदा करता है।
शब्द व्यक्ति के भाव को एक दूसरे तक पहुँचाने के माध्यम हैं, जीव के अंदर से निकलने वाली आवाज उसे उसकी जरूरतों से जोड़ने का कार्य करती है। शब्दों का एक ऐसा जाल है जिसमें मनुष्य ही नहीं अपितु लगभग सभी जीव फंसे पड़े हैं। बेसक हम अन्य जीव की भाषा को समझ नहीं पाते परन्तु उनकी अपनी भाषा है वो अच्छी तरह से समझते हैं। हम देखते हैं की पशु पक्षी भी कुछ ऐसी भाषा बोलते हैं जिससे उनके बीच प्यार या द्वंद शुरु हो जाता है। हम देखते हैं की कभी कभी कुछ पशु ऐसी कुछ आवाजें निकालते हैं दूसरे पशु आकर उनके पास खड़े हो जाते हैं प्यार से मिलने लगते हैं और कभी कभी कुछ ऐसी आवाज निकालते हैं की दूसरे पशु आकर लड़ने लगते हैं अर्थात् उनमें भी कहीं न कहीं शब्दों का जाल ऐसा होता है कि वे एक दूसरे को प्रभावित करने लगते हैं। और यह तो पशुओं की बात है जिनके बारे में हमें बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं परन्तु मनुष्य जाति में जो देखा जाता है कि शब्दों पर ही जैसे लगता है सबकुछ पल रहा है। कोई ऐसी बात बोलता है की समाज उसे सिर आँखों पर सह सम्मान बैठाये घूमता है उसकी इज्जत करता है और कोई ऐसी बात बोलता है की अनायास भी लड़ाई दंगे शुरु हो जाते हैं। शब्दों का यह जाल तो हमें हमारे अंदर उतरने नहीं देता है क्योंकि हम बचपन से ही ऐसी बातें सुनते चले आते हैं कि हमें इन बातों में जीने की आदत पड़ जाती है हम चाह कर भी इससे निकल नहीं पाते और इतने आदती हो जाते हैं की यदि एक दिन भी शांत रहना पड़े तो हम रह नहीं पाते हमें हर वक्त किसी से बात करने की जरुरत महसूस होती है।
कोई तो ऐसा होना चाहिए जो अपनी बात कहे और हमारी सुने हम हर वक्त सुनने और सुनाने के लिये बेचैन होते हैं। यहां तक की हम सोते वक्त भी इस जाल से निकल नहीं पाते है स्वप्न के माध्यम से ही हम किसी न किसी रुप में बात करते ही रहते हैं हम समझते है कि हम जितना बोलते जायें उतना ही अच्छा है जबकि यही बात ही कहीं न कहीं हमें एहसास की भाषा से दूर करता चला जाता है। और हम उस प्राकृतिक ध्वनि को महसूस कर पाने में असमर्थ हो जाते हैं जबकि प्राकृतिक भाषा तो हर वक्त हर जगह गुंजायमान हो रही है। ये एक ऐसी गूंजन है जो हर वक्त हमारे भीतर प्रवेश करने के लिये तत्पर है परन्तु हम अपने विचारों शब्दों भाषाओं और सोच तर्क वितर्क की एसी दीवारें अपने पास खड़ी कर चुके हैं की वह गुंजन हमारे भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाती।
हम देखते है कि हमारे आस पास हर समय विभिन्न प्रकार की बाते होती रहती है। बातें भी इतने प्रकार की है कि जिसकी कोई गणना नहीं की जा सकती, प्रताप नरायाण मिश्र जी ने तो बात के इतने तरीके गिनाए कि गिनती से ही लगता है कि हम कितनी बातों में उलझे पड़े हैं लेकिन फिर भी यही लगता है कि बहुत सी बातें वो भी भूल गये हैं क्योंकि जितने व्यक्ति उतनी बाते जितने लोग उतने तर्क उतनी ही सोच, भला कोई एक व्यक्ति इतनी बड़ी आबादी की सारी बातें कैसे गिना सकता है। ये कह सकते हैं कि एक व्यक्ति उतना ही बता सकता है जितनी तरह की बात वो खुद बोलता होगा उससे अधिक भला कहां से बता सकता है परन्तु होती तो उससे बहुत ज्यादा है और मजे की बात तो यह है की हर बात पर व्यक्ति की भाव भंगिमा तौर तरीके भी बदलते रहते है। बात पर प्यार बात पर लड़ाई बात पर हंसना रोना सब कुछ किसी न किसी बात पर ही निर्भर है फिर भी ये इंसान इन बातों से कभी निकलने की कोशिश नहीं करता उल्टे अन्य लोगों को भी अपनी बात में उलझाने का प्रयास ही करता है रहता है।
बातों का प्रभाव भी हर व्यक्ति पर अजीब होता है कोई नेताओं की बातों से प्रभावित है कोई दार्शनिकों की बातों से प्रभावित है कोई पंड़ित ज्ञानी गुरुओं की बातों से तो कोई परिवार और समाज से प्रभावित है, इससे अछूता कोई नहीं है। और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि लोग जिसे सबसे अच्छा मानते हैं अपने विचार से जिसे श्रेष्ठ समझते है उसकी बातों में जादा उलझे हुए है। जैसा कि हम देखते हैं कि एक अपराधी की बात से लोग उतने प्रभावित नहीं होते जितना एक गुरु सन्त या दार्शनिकों की बातों से प्रभावित होते है। हजारों की भीड़ इकट्ठा होती है इनकी बातें सुनने के लिये ऐसा इसलिये है कि हर किसी की सोच है कि हमें बहुत अच्छा बनना है और वो सोचते है कि हम अच्छे व्यक्ति की बातें सुनेंगे समझेंगे तो अच्छे बनेंगे ये लगता है जैसे वो समाज को अच्छा बनाने के ठेकेदार हैं लोंगों को परमात्मा से मिलाने के माध्यम हैं लगता है जैसे उनकी बातें सुन कर ही ईश्वर से मिला जा सकता है जैसे ईश्वर ने उन्हें अपने पास लाने का ठेका दे रखा हो। अजीब सी बात है कि लोग तो अपनी बातों का ऐसा जाल बिछाते हैं कि लोग उसमें उलझते चले जाते हैं और उस जाल में इस कदर फंस जाते हैं कि कभी निकल नहीं पाते। जिसके परिणामस्वरुप खुद की शांति खो बैठते है और जब तक खुद की शांति का बोध नहीं होगा तब तक प्रकृति की ध्वनि का एहसास कर पाना सम्भव नहीं होगा।
विचारों के अनुसार ही व्यक्ति के चेहरों में भी निरंतर परिवर्तन होता रहता है। एक तरह से यदि देखा जाये तो कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखता जिसका वास्तविक रुप सामने हो व्यक्ति का सही चेहरा तो तभी दिखेगा जब वह पूर्णतः शांत होगा जैसे लहरों में पानी का सही रुप से देख पाना मुश्किल है यद्यपि लहरें भी पानी ही हैं पर वह पानी का वास्तविक स्वरुप नहीं होती है वो एक वेग का परिणाम होती है। उसी तरह शांत व्यक्ति का चेहरा ही उसका वास्तविक रुप होता है अन्यथा जब तक वह विचारों बातों में उलझा होता है उसका सही रुप दिखाई नहीं देता। यहां तक कि खुद को व्यक्ति कभी सही रुप में नहीं पा सकता। कभी किसी मूर्ति को देखिए बहुत प्यारी लगती है। कारण ये नहीं कि उसकी कलाकृति प्यारी है बल्कि मूर्ति में किसी भी प्रकार की हलचल नहीं होती बल्कि वो जो बनाई गयी है वही होती है फूल हमें बहुत प्यारे लगते हैं क्यांकि उनका वही स्वरुप है जो प्राकृतिक है उनमें लहर नहीं है इसी तरह जब व्यक्ति अपनी भीतर के वेग को शांत कर लेगा और उसे प्रकृति की हर आवाज प्यारी लगने लगेगी जब उसे सन्नाटे में भी एक गूंज का एहसास होने लगेगा जब उसे प्रकृति की हर स्थिितियों में आनंद की अनुभूति होने लगेेगी तब जाकर उसका चेहरा अपने वास्तविक रुप में परिलक्षित होने लगेगा।
अथात् हमारे भीतर जो भी वेग बनता है वह कहीं न कहीं सामाजिक शब्दों और बातों से प्रभावित होकर ही बनता है हमें अपने अंदर की शांति में गहरे उतरने की जरुरत है और उस प्राकृतिक ध्वनि का एहसास करने की जरुरत है। न की बाह्य जगत की बातों से प्रभावित होकर खुद को हलचल से ग्रसित करने की।

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