विशेष रिपोर्ट | संजय मिश्र, कैथी (गाजीपुर)।
कैथी (गाजीपुर)। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में गंगा और गोमती नदियों के पवित्र संगम के समीप स्थित श्री मारकंडेश्वर महादेव धाम पूर्वांचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। वाराणसी-गाजीपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा यह प्राचीन शिवधाम श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। स्थानीय लोग इसे “मिनी काशी” के नाम से भी जानते हैं।
मान्यता है कि इसी पावन भूमि पर ऋषि मार्कण्डेय ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। यही कारण है कि इस धाम में शिवलिंग के साथ-साथ भक्त मार्कण्डेय की भी विशेष पूजा की परंपरा आज तक चली आ रही है।
पुराणों में वर्णित है ऋषि मार्कण्डेय का महत्व
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में ऋषि मार्कण्डेय का विशेष स्थान बताया गया है। मार्कण्डेय पुराण की रचना उनके और महर्षि जैमिनी के संवादों पर आधारित मानी जाती है। देवी महात्म्य अथवा दुर्गा सप्तशती भी इसी पुराण का महत्वपूर्ण भाग है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी पार्वती के आशीर्वाद से ऋषि मार्कण्डेय को देवी के पराक्रम का वर्णन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
मृकण्ड ऋषि की तपस्या और पुत्र प्राप्ति की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार मृकण्ड ऋषि और उनकी पत्नी संतान सुख से वंचित थे। पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर उन्होंने भगवान शिव की कठोर आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक असाधारण किंतु अल्पायु पुत्र का वरदान दिया। समय आने पर मार्कण्डेय का जन्म हुआ।
जब उनकी आयु 16 वर्ष पूरी होने वाली थी, तब उन्हें अपनी अल्पायु का पता चला। इसके बाद उन्होंने स्वयं को शिव उपासना में समर्पित कर दिया। कथा के अनुसार जब यमराज उन्हें लेने पहुंचे, तब भगवान शिव अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट हुए और यमराज को परास्त कर मार्कण्डेय को चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दिया। इसी घटना के कारण भगवान शिव को ‘कालांतक’ नाम से भी जाना जाता है।
महाशिवरात्रि पर दिखता है अनूठा आयोजन
मारकंडेश्वर धाम की सबसे विशेष परंपराओं में से एक यहां आयोजित होने वाला दो दिवसीय महाशिवरात्रि उत्सव है। पहले दिन विशाल शिव बारात और पुरुष श्रद्धालुओं द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है, जबकि दूसरे दिन महिलाओं की बड़ी संख्या मंगलगीत और पारंपरिक भजनों के साथ भगवान शिव का पूजन करती है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु धाम पहुंचते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।
सावन और अधिक मास में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
सावन, अधिक मास और कार्तिक मास के दौरान यहां जलाभिषेक और दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान भी यह धाम प्रमुख पड़ावों में शामिल रहता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार त्रयोदशी तिथि पर यहां दर्शन और पूजन करने का विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

संतान सुख और दीर्घायु के लिए विशेष मान्यता
धाम में महामृत्युंजय जाप, रुद्राभिषेक और अन्य वैदिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। श्रद्धालु संतान प्राप्ति, उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना लेकर यहां पूजा-अर्चना करते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजन और बेलपत्र अर्पण की परंपरा भी काफी लोकप्रिय है।
ऐसे पहुंच सकते हैं धाम
मारकंडेश्वर महादेव धाम सड़क और रेल मार्ग दोनों से सुगमता से जुड़ा हुआ है। राजवारी रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 4.5 किलोमीटर है, जबकि औड़िहार जंक्शन से यह करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित है। वाराणसी से आने वाले श्रद्धालु राष्ट्रीय राजमार्ग के माध्यम से आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। गंगा और गोमती के संगम क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन शिवधाम आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
पूजन-अर्चन की परंपरा और धार्मिक महत्व
मारकंडेश्वर महादेव धाम में वर्षभर धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम चलता रहता है। यहां नियमित रूप से महामृत्युंजय मंत्र जाप, रुद्राभिषेक, शिवपुराण एवं सत्यनारायण कथा का आयोजन किया जाता है। विशेष रूप से सोमवार के दिन स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन और जलाभिषेक के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में स्थित पवित्र मार्कण्डेय कुंड को ऋषि मार्कण्डेय की तपोभूमि माना जाता है, जहां श्रद्धालु श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं।
कैथी स्थित यह प्राचीन धाम केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां उमड़ने वाली भक्तों की विशाल भीड़ और भक्तिमय वातावरण इस धाम की विशेष पहचान बन चुके हैं। उस समय पूरा क्षेत्र शिवभक्ति और आस्था के रंग में सराबोर दिखाई देता है।

Om namah shivay.