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गोरखपुर: जहरीले कोबरा से भिड़कर पालतू डॉगी ने बचाई परिवार की जान, खुद गंवाई जिंदगी

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पालतू डॉगी, जान देकर निभाई वफादारी

संजय मिश्र।

गोरखपुर। गोरखपुर के कुसुम्ही बाजार स्थित एक परिवार के लिए 3-4 जून की रात कभी न भूलने वाली बन गई। यह रात जहां एक तरफ भय और संकट लेकर आई, वहीं दूसरी ओर एक पालतू डॉगी की असाधारण बहादुरी और स्वामिभक्ति की ऐसी मिसाल छोड़ गई, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। परिवार की चहेती डॉगी “लीची” ने अपने मालिकों की सुरक्षा के लिए जहरीले कोबरा से मुकाबला किया और अंततः अपनी जान गंवा दी।

जानकारी के अनुसार, बहरामपुर स्थित आर्यावर्त आश्रम में रहने वाले परिवार के सदस्य रात के समय अपने-अपने कमरों में सो रहे थे। इसी दौरान एक जहरीला कोबरा आश्रम परिसर में प्रवेश कर गया और धीरे-धीरे घर के अंदर बढ़ने लगा। घर में मौजूद पालतू डॉगी लीची और अन्य कुत्तों ने खतरे को भांप लिया। उन्होंने भौंककर सांप का ध्यान भटकाने और उसे परिवार के सदस्यों तक पहुंचने से रोकने का प्रयास किया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कोबरा लगातार एक कमरे की ओर बढ़ रहा था, जहां परिवार के बुजुर्ग सदस्य सो रहे थे। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए महज आठ महीने की लीची बिना डरे सांप के सामने खड़ी हो गई। उसने अपनी जान की परवाह किए बिना कोबरा को कमरे से दूर खींचने की कोशिश की। इस दौरान सांप और डॉगी के बीच संघर्ष शुरू हो गया।

लीची ने कई बार सांप को घर के भीतर से बाहर की ओर धकेला, लेकिन कोबरा ने उसे कई बार डस लिया। विषैले हमलों के बावजूद उसने हार नहीं मानी। बताया जाता है कि उसने सांप को अपने जबड़ों में दबोच लिया और तब तक नहीं छोड़ा, जब तक वह पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हो गया। इस संघर्ष के दौरान परिवार के लोगों की नींद खुल गई और वे सुरक्षित बाहर निकल आए।

हालांकि, सांप के जहर का असर तेजी से फैल रहा था। अपनी अंतिम शक्ति तक लड़ने के बाद लीची घर के मुख्य दरवाजे तक पहुंची, लेकिन वहां पहुंचकर वह लड़खड़ा गई और जमीन पर गिर पड़ी। कुछ ही क्षणों बाद उसने दम तोड़ दिया। उसकी बहादुरी ने पूरे परिवार को सुरक्षित बचा लिया, लेकिन परिवार अपनी प्यारी साथी को हमेशा के लिए खो बैठा।

यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि पालतू कुत्ते केवल जानवर नहीं होते, बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। वे अपने मालिकों के प्रति निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और वफादारी का परिचय देते हैं। दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां कुत्तों ने खतरे के समय अपने परिवार की रक्षा की है। उनकी सूझबूझ, सतर्कता और सुरक्षा की भावना उन्हें इंसानों का सबसे भरोसेमंद साथी बनाती है।

लीची की कहानी केवल एक डॉगी की बहादुरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस अटूट रिश्ते की मिसाल है जो इंसान और उसके पालतू पशु के बीच बनता है। उसकी कुर्बानी ने यह संदेश दिया है कि प्रेम, निष्ठा और साहस की कोई सीमा नहीं होती। आर्यावर्त आश्रम परिवार ने अपनी इस बहादुर साथी को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि लीची की शहादत और उसकी स्वामिभक्ति को हमेशा याद रखा जाएगा।

लीची की राह ताक रहे हैं उसके साथी, दरवाजे पर बैठकर कर रहे इंतजार

आर्यावर्त आश्रम में लीची की कमी केवल परिवार के सदस्यों को ही नहीं खल रही है, बल्कि उसके दो साथी डॉगी भी उसे हर पल याद कर रहे हैं। जिस घर में कभी तीनों डॉगी एक साथ खेलते, दौड़ते और पूरे परिसर की निगरानी करते थे, आज वहां एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है। लीची के जाने के बाद उसके दोनों साथी अक्सर घर के मुख्य दरवाजे के पास जाकर बैठ जाते हैं और घंटों उसी दिशा में टकटकी लगाए रहते हैं, मानो उन्हें अब भी उम्मीद हो कि उनकी साथी किसी भी क्षण लौट आएगी।

परिवार के लोगों का कहना है कि पहले तीनों डॉगी हर समय साथ रहते थे। खाना खाने से लेकर खेलने और घर की रखवाली तक, वे एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते थे। लेकिन लीची की मौत के बाद दोनों डॉगी का व्यवहार बदल गया है। वे पहले की तरह चंचल नहीं दिखते और कई बार दरवाजे के पास बैठकर बाहर देखते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे वे अपनी साथी की आहट सुनने की कोशिश कर रहे हों।

जानवरों की भावनाओं को अक्सर लोग समझ नहीं पाते, लेकिन यह दृश्य बताता है कि उनमें भी अपनापन, लगाव और बिछड़ने का दर्द होता है। लीची की बहादुरी ने जहां परिवार को जीवनभर का गर्व दिया है, वहीं उसके दोनों साथी आज भी उसकी याद में दरवाजे पर बैठकर उसका इंतजार कर रहे हैं। यह दृश्य हर किसी की आंखें नम कर देने वाला है।

लीची की याद में डूबा आश्रम, बत्तखें अब भी तलाशती हैं अपनी साथी को

आर्यावर्त आश्रम में लीची की अनुपस्थिति ने एक गहरा खालीपन छोड़ दिया है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। फ्रेंच बुलडॉग प्रजाति की यह मासूम सी डॉगी सिर्फ एक पालतू जानवर नहीं थी, बल्कि पूरे आश्रम की खुशियों का केंद्र थी। लीची की हंसी, उसकी दौड़ और उसका मासूम खेलना हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आता था।

आश्रम में मौजूद बत्तखों के साथ उसका विशेष लगाव था। लीची घंटों उनके साथ खेलती थी, कभी उनके पीछे दौड़ती तो कभी तालाब के किनारे उनके साथ बैठ जाती। अब वही बत्तखें चुपचाप उसके बिना भटकती नजर आती हैं। वे बार-बार उस जगह जाती हैं जहां लीची उनके साथ खेलती थी, और आश्रम के कमरे में झांककर जैसे किसी अपने को ढूंढने की कोशिश करती हैं। यह दृश्य हर किसी का दिल भारी कर देता है।

गृहस्वामी ने लीची की याद को हमेशा जीवित रखने के लिए एक पौधा भी उसके नाम पर लगाया है। यह पौधा अब आश्रम में उसकी उपस्थिति का प्रतीक बन गया है। हर दिन जब परिवार उस पौधे को देखता है, तो उन्हें लीची की मासूम आंखें और उसकी निःस्वार्थ वफादारी याद आ जाती है।

लीची भले ही अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी यादें, उसका प्यार और उसका अपनापन आज भी आश्रम के हर कोने में जीवित हैं। बत्तखों की उदास नजरें और उस पौधे की हर नई पत्ती, उसकी अमर कहानी को और भी भावुक बना देती हैं।

स्वामिभक्ति, साहस और त्याग की इस मिसाल को शत-शत नमन।

totaramnews1@gmail.com

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4 thoughts on “गोरखपुर: जहरीले कोबरा से भिड़कर पालतू डॉगी ने बचाई परिवार की जान, खुद गंवाई जिंदगी

  1. शाबाश लीची शाबाश तुम्हारी बहादुरी का मिसाल उसे परिवार के प्रत्येक लोगों के जीवन में दौड़ता रहेगा.

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