संजय मिश्र।
देवरिया। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, जिसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पवित्र मानी जाती है। इसी दिन भगवान परशुराम जयंती भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह पर्व भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो धर्म, साहस और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।
भगवान परशुराम का अवतार उस समय हुआ जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार अपने चरम पर था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने क्षत्रियों का 21 बार संहार कर समाज में संतुलन और धर्म की पुनर्स्थापना की। उनका जीवन यह संदेश देता है कि जब अन्याय सीमा पार कर जाए, तो उसके विरुद्ध खड़े होना ही सच्चा धर्म है।
परशुराम जी का जन्म भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। वे भगवान शिव के परम भक्त थे। शिवजी ने उन्हें ‘परशु’ अर्थात फरसा प्रदान किया था, जो उनकी पहचान बना। इसी कारण उनका नाम परशुराम पड़ा। उन्हें भृगुपति के नाम से भी जाना जाता है। वे केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि वेदों और शास्त्रों के गहन ज्ञाता भी थे।
भगवान परशुराम शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत थे। यही कारण है कि वे ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों गुणों के अद्भुत संगम माने जाते हैं। उन्होंने महाभारत काल के कई महान योद्धाओं—भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण—को युद्धकला का ज्ञान दिया। यह उनके अद्वितीय ज्ञान और गुरु-परंपरा को दर्शाता है।
अक्षय तृतीया का दिन भी परशुराम जयंती के साथ विशेष महत्व रखता है। ‘अक्षय’ का अर्थ है—जो कभी समाप्त न हो। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान, जप, तप और पूजा का फल कभी नष्ट नहीं होता। इसलिए लोग इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करते हैं। साथ ही, यह दिन नए कार्यों की शुरुआत के लिए भी बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे ‘अबूझ मुहूर्त’ कहा जाता है।
भगवान परशुराम को ‘चिरंजीवी’ यानी अमर भी माना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, वे चारों युगों—सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग—में विद्यमान हैं। ऐसी मान्यता है कि वे आज भी महेंद्रगिरी पर्वत पर निवास करते हैं और धर्म की रक्षा के लिए संसार पर दृष्टि बनाए रखते हैं। भविष्य में, जब भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होगा, तब परशुराम उनके गुरु के रूप में प्रकट होंगे।
परशुराम जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि ज्ञान और शक्ति का संतुलन आवश्यक है। उनका जीवन अनुशासन, न्याय और अन्याय के विरुद्ध अडिग रहने की प्रेरणा देता है। आज के समय में भी यह संदेश उतना ही प्रासंगिक है, जब समाज को नैतिक मूल्यों और साहस की आवश्यकता है। इस प्रकार, परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया का यह पावन संगम न केवल आस्था का पर्व है, बल्कि जीवन में धर्म, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है।

जय परशुराम
सुंदर
Jay Gurudev.
Jay parashuram.