पंडित सुनील पांडेय।
लखनऊ। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को लेकर इस वर्ष विशेष धार्मिक संयोग बन रहा है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, जब तृतीया तिथि प्रदोष काल (संध्याकाल) या रात्रि के प्रथम प्रहर में विद्यमान रहती है, तभी भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है। इस आधार पर इस वर्ष परशुराम जयंती 19 अप्रैल को मनाई जाएगी, क्योंकि इस दिन संध्याकाल में तृतीया तिथि का प्रभाव रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। उन्हें चिरंजीवी अर्थात अमर माना गया है, इसलिए हर वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।
वहीं, अक्षय तृतीया के पर्व को लेकर भी विद्वानों में स्पष्ट मत है। ग्रंथ ‘निर्णयसिन्धु’ के अनुसार, जिस दिन तृतीया तिथि पूर्वाह्न में व्याप्त रहती है, उसी दिन अक्षय तृतीया मनाना श्रेष्ठ माना जाता है। यदि तिथि दो दिनों तक फैली हो, तो दूसरे दिन को प्राथमिकता दी जाती है। इस वर्ष 19 अप्रैल को सुबह 10:49 बजे तृतीया तिथि प्रारंभ होकर 20 अप्रैल की सुबह 7:27 बजे तक रहेगी। इस गणना के अनुसार अक्षय तृतीया का पर्व 20 अप्रैल को मनाना अधिक शुभ रहेगा।
अक्षय तृतीया का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था, इसलिए इसे ‘युगादि तिथि’ भी कहा जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह दिन खास होता है, क्योंकि वर्ष में केवल इसी दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्च स्थिति में रहते हैं, जो इसे अत्यंत शुभ बनाता है।
तृतीया तिथि को ‘जया तिथि’ कहा गया है, जिसका अर्थ है विजय प्रदान करने वाली तिथि। इस दिन आरंभ किए गए कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन पांडवों को अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था, जिससे भोजन कभी समाप्त नहीं होता था।
इन्हीं विशेषताओं के कारण अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन बिना किसी विशेष मुहूर्त के भी विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ जैसे शुभ कार्य किए जा सकते हैं। साथ ही, इस दिन किए गए दान, जप, तप और पुण्य कार्यों का फल अक्षय अर्थात कभी समाप्त न होने वाला माना गया है। इसलिए इस दिन दान-पुण्य करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
