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Purushottam Maas 2026: अधिकमास की तारीख, पूजा विधि, दान और मांगलिक कार्य नियम

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Totaram.news. हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में Jyestha Maas के दौरान Adhik Maas पड़ रहा है। यह विशेष मास 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 तक रहेगा। धार्मिक परंपराओं में इसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है। अधिकमास आने के कारण इस बार ज्येष्ठ मास की अवधि सामान्य से लंबी हो जाएगी और हिंदू पंचांग में कुल 13 महीने माने जाएंगे। इस दौरान कई शुभ और मांगलिक कार्यों को स्थगित रखने की परंपरा है, जबकि पूजा-पाठ, जप और दान को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

कैसे बनती है Adhik Maas की स्थिति

इस वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष 16 मई तक रहेगा। इसके बाद 17 मई से अधिकमास आरंभ होगा, जो 15 जून तक चलेगा। इसके समाप्त होने के बाद ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 29 जून तक जारी रहेगा। इस प्रकार ज्येष्ठ मास दो भागों में विस्तारित दिखाई देगा। यही कारण है कि यह महीना विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त करता है।

अधिकमास क्यों पड़ता है

हिंदू पंचांग मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित है। एक चंद्र मास लगभग 29.5 दिनों का होता है और 12 चंद्र मास मिलाकर करीब 354 दिन बनते हैं। दूसरी ओर, सूर्य आधारित सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है। इस प्रकार दोनों गणनाओं में लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है।

यदि इस अंतर को समय-समय पर संतुलित न किया जाए तो त्योहार और ऋतुएं अपने निर्धारित समय से बदलने लगेंगी। इसी अंतर को ठीक करने के लिए लगभग हर 32 महीने 16 दिन बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है। इससे हिंदू त्योहार मौसम और ऋतु के अनुसार सही समय पर बने रहते हैं।

संक्रांति का क्या महत्व है

जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहा जाता है। हिंदू पंचांग में महीनों का निर्धारण संक्रांति और चंद्र गणना के आधार पर होता है। जिस चंद्र मास में कोई संक्रांति नहीं होती, वह अधिकमास कहलाता है। यही कारण है कि यह मास सामान्य महीनों से अलग माना जाता है।

पूजा-पाठ और आध्यात्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु की आराधना, सत्यनारायण कथा, विष्णु सहस्त्रनाम और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

कई श्रद्धालु इस समय रामायण का पाठ, मंत्र जाप और दीपदान भी करते हैं। शालिग्राम पूजा तथा महामृत्युंजय मंत्र का जाप ग्रह दोषों की शांति और मानसिक शांति के लिए शुभ माना जाता है।

मांगलिक कार्यों पर रहती है रोक

अधिकमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, जनेऊ संस्कार, भूमि पूजन और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे शुभ कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। हालांकि धार्मिक कार्य, तप, ध्यान और भक्ति को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

दान और सेवा का विशेष महत्व

इस पवित्र अवधि में दान-पुण्य को बहुत महत्व दिया जाता है। जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अनाज, छाता, जूते-चप्पल और धन का दान करना शुभ माना गया है। गौसेवा और गौशालाओं में सहयोग करने की भी विशेष परंपरा है। मान्यता है कि इस मास में किए गए सत्कर्म कई गुना फल प्रदान करते हैं।

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