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उच्च शिक्षा विभाग ने मिशन साधना सप्ताह में आईकेएस पर संवाद सत्र आयोजित किया

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डेस्क। उच्च शिक्षा विभाग ने 2 अप्रैल से 8 अप्रैल, 2026 तक मनाए गए स्ट्रेंथनिंग एडैप्टिव डेवलपमेंट एंड ह्यूमेन एप्टिट्यूड फॉर नेशनल एडवांसमेंट (साधना) सप्ताह 2026 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पर एक संवादपूर्ण सत्र का सफलतापूर्वक आयोजन किया।
यह सप्ताह क्षमता विकास आयोग (सीबीसी) के स्थापना दिवस तथा नागरिक-केंद्रित सुशासन के लिए भारत की एक महत्वपूर्ण पहल, मिशन कर्मयोगी के पाँच वर्ष पूरे होने का प्रतीक है। स्वागत भाषण उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव (प्रशासन) सैयद एकराम रिज़वी द्वारा दिया गया, जिन्होंने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत क्षमता विकास आयोग की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि यह नागरिक-केंद्रित सुशासन के लिए ज्ञान, कौशल और क्षमता बढ़ाने हेतु विभिन्न ऑनलाइन पाठ्यक्रम उपलब्ध कराता है।
यह सत्र समकालीन शिक्षा, अनुसंधान और शासन में भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता पर संरचित सहकर्मी अधिगम (पियर लर्निंग) तथा सार्थक विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करने के लिए तैयार किया गया था। इसमें यह भी रेखांकित किया गया कि भारत की समृद्ध बौद्धिक परंपराएँ समस्या-समाधान, नवाचार और नीतिनिर्माण के आधुनिक दृष्टिकोणों को कैसे दिशा प्रदान कर सकती हैं।
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण आईआईटी हैदराबाद के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहन राघवन् का संबोधन था। ये हेरिटेज साइंस एंड टैक्नोलॉजी विभाग के संस्थापक प्रमुख रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भी जुड़े हुए हैं। डॉ. राघवन् ने अपने अंतर्विषयी कार्य से प्राप्त अनुभव साझा किए, जो प्रौद्योगिकी, विज्ञान और भारत की ज्ञान परंपराओं के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
प्रोफेसर महोदय ने रेखांकित किया कि भले ही भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) की बाजार संभावनाएँ व्यापक हैं, किंतु इसकी वास्तविक शक्ति उच्च शिक्षा में इसकी परिवर्तनकारी भूमिका में निहित है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आईकेएस को एक अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक बहु-विषयी रूपरेखा के रूप में देखा जाना चाहिए, जो विज्ञान, अभियांत्रिकी, मानविकी और प्रबंधन जैसे मौज़ूदा शैक्षणिक क्षेत्रों को समृद्ध कर सकती है। उच्च शिक्षा में आईकेएस के एकीकरण के माध्यम से विश्वविद्यालय रटने पर आधारित लर्निंग से आगे बढ़कर ऐसे समग्र मॉडल की ओर अग्रसर हो सकते हैं, जो ज्ञान, अनुप्रयोग और मूल्यों (धर्म) का समन्वय करता है। प्रोफेसर ने इस बात का भी उल्लेख किया कि यह दृष्टिकोण समकालीन शैक्षिक सुधारों के अनुरूप है, जो भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत पर आधारित अनुसंधान, नवाचार और समालोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करता है। आईकेएस को अपनाने वाले संस्थान अंतर्विषयी कार्यक्रम विकसित कर सकते हैं, मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा दे सकते हैं तथा ऐसे स्नातक तैयार कर सकते हैं, जो न केवल दक्ष पेशेवर हों, बल्कि सांस्कृतिक रूप से सजग और सामाजिक रूप से उत्तरदायी नागरिक भी हों। उन्होंने बल दिया कि इस प्रकार का एकीकरण एक ऐसे शिक्षा तंत्र के निर्माण के लिए आवश्यक है, जो भविष्य के लिए तैयार हो, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हो और अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ हो।
इसके पश्चात एक रोचक प्रश्नोत्तर सत्र के रूप में प्रतिभागियों के साथ संवाद हुआ। सत्र में एक समेकित शिक्षा प्रणाली को आकार देने में भारतीय ज्ञान प्रणाली की निरंतर प्रासंगिकता तथा सतत् राष्ट्रीय प्रगति के लिए शासन प्रक्रियाओं में पारंपरिक ज्ञान को समाहित करने के महत्व पर बल दिया गया।
इस सत्र में शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। विचार प्रवर्तक नेताओं और व्यवहारिक विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर, उच्च शिक्षा विभाग ने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत ज्ञान-आधारित, अनुकूलनशील और मानवीय शासन तंत्र के संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की।

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