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योग, आहार और अनुशासन को बताया व्यक्तित्व व स्वास्थ्य का आधार

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हृदयनारायण दीक्षित।
अनुशासनविहीन जीवन में स्वस्ति और लोकमंगल नहीं होते। प्रकृति स्वयं अनुशासन में गतिशील है। मनुष्य के लिए इसी अनुशासन का पालन उपयोगी दिनचर्या है। इसका सम्बंध स्वस्थ मन से है। स्वस्थ बुद्धि से है और निर्मल आत्मा से भी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मस्त मस्त व्यक्तित्व के धनी हैं। उच्च कोटि के संसद विज्ञ, 5 बार के सांसद व दूसरी बार मुख्यमंत्री हैं। व्यवहार में अनुशासित अखिल भारतीय स्तर पर चर्चित जनप्रिय राजनेता हैं। योगी हैं। सो अनुशासन में रहते हैं। और अपने परिचितों से भी अनुशासित रहने की अपेक्षा करते हैं। वे हमारे प्रति शुभेक्षु हैं।

हम लोग भिन्न-भिन्न विषयों पर चर्चा करते रहे हैं। वे योग विज्ञानी भी हैं। योग का हमारा ज्ञान किताबी है, लेकिन उनका ज्ञान अनुभव अनुभूति और व्यवहारिक जीवन से भरा पूरा है। चार दिन पहले आकाशवाणी का 89वाँ स्थापना वर्ष मनाया गया था। उसमें पद्म पुरस्कार प्राप्त लोगों को सम्मानित किया गया था। आकाशवाणी के वरिष्ठ महानुभाव भी सम्मानित किए गए थे। पद्मश्री में मेरा भी नाम था। योगी जी ने उस कार्यक्रम में मेरी दिनचर्या पर चर्चा की। उन्होंने कुछ पुरानी बातें खोलीं और याद कराया कि हमारी दिनचर्या अनुशासित नहीं थी। उन्होंने मुझे याद कराया की देर रात तक जागना स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं होता। मैंने उनसे बताया के दिन भर राजनीतिक कारणों से व्यस्तता रहती है और रात में लिखने पढ़ने का समय मिलता है। उन्होंने हंसते हुए कहा था कि यही दिनचर्या उलट दी जाए और सुबह जल्दी उठा जाए और रात्रि में जल्दी सोया जाए। इन्हीं पुरानी बातों को उन्होंने आकाशवाणी के कार्यक्रम में फिर से दोहराया।
दिनचर्या व्यक्तित्व का आधार है। दिनचर्या का अनुशासन प्रायः हमारा निर्णय होता है। इसमें थोड़ी सी चूक भी क्षतिकारी होती है। दिनचर्या पर देशकाल का भी प्रभाव पड़ता है। ठंडी जलवायु वाले देशों में शरीर के ताप को विशेष स्तर पर बनाए रखने की आवश्यकता होती है। ऐसे देशों में अधिक ऊष्मा देने वाली दिनचर्या चलती है। आदर्श दिनचर्या पर प्राचीन भारत में अच्छा और परिश्रम हुआ है। अच्छी दिनचर्या में अच्छी नींद, अच्छा जागरण, और अच्छे आहार की आवश्यकता होती है। उसे कालखंड में अन्न की विशेष महत्ता पर जोर दिया गया है। अन्य भौतिक पदार्थ है। प्राचीन अनुभूति में वह दिव्य है। तैत्तरीय उपनिषद के एक सुंदर मंत्र में कहते हैं, ”कि यह व्रत संकल्प है कि अन्न की निंदा न करें। अन्न ही प्राण है। प्राण ही अन्न है। शरीर भी अन्न है। शरीर और प्राण का अंतरसंबंध है। अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित है। जो यह जान लेता है उसकी दिनचर्या आदर्श हो जाती है।” उपनिषद में कहते हैं कि, ”आहार का अर्थ अन्न है।” आहार साधारण खाद्य वस्तु नहीं है।
आहार का सम्बंध अनुशासित दिनचर्या से भी है। व्यापक अर्थों में अनुशासित दिनचर्या के पांच द्वार हैं। देखना भी एक आहार है। देखे गए दृश्य चित्र को प्रसन्न या अप्रसन्न करते हैं। सुंदर दर्शन में मन प्रसन्न होता है। अभद्र दर्शन में मन अप्रसन्न होता है। इसलिए देखने में भी संयम की आवश्यकता है। पढ़ना भी एक आहार है। अनुशासित दिनचर्या वाला ज्ञानवर्धक अध्ययन मन स्वस्थ रखता है। निराश करने वाली सूचनाएं कष्ट पहुंचाती हैं। इस समय आधी दुनिया युद्ध में है। समाचार माध्यमों में धुआं ही धुआं है। बारूदी वातावरण है। यह निराश करता है। गंध भी आहार है। किसी बाग या उपवन में गंधमादन हवा आती है। चित्त गंधमादन हो जाता है। ज्ञानवर्धन सुना या रुचिपूर्ण सुनना, गीत सुनना काव्य सुनना, नदी के पास खड़े होकर नाद सुनना आनंददायक है। दुनिया का सारा ज्ञान देखने और सुनने से प्रकट हुआ है। वैदिक साहित्य सुना हुआ है। स्पर्श भी आहार है। किसी प्रियजन का स्पर्श आनंददाई है। दृश्य, श्रव्य, नाक, स्पर्श और रसना 5 द्वार हैं। इनसे हम कुछ न कुछ लिया करते हैं। जीवनचर्या के अनुशासन में इन पांचों द्वारों की भूमिका है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में 10 दिशाएं हैं। काल गणना भी है। वासना भी जन्म और जीवन के साथ आई है। वासना का अनुशासन प्रार्थना है। जीवन ऊर्जा का अधोगामी प्रवाह वासना है। वासना भी एक दिशा है लेकिन इसका कार्यव्यवहार दुखदायी है। लोकमंगल के विपरीत भी है। जीवन ऊर्जा की दूसरी दिशा प्रार्थना है। वासना और प्रार्थना दोनों में ही हमारी चेतन ऊर्जा ही मुख्य कारक है। दोनों में स्वयं के प्रति आस्तिकता है। लेकिन प्रार्थना में प्रार्थना के प्रति गजब का विश्वास है। ऋग्वेद में प्रार्थना है-हे देवो! हमारा मन शुभ करो। यजुर्वेद में प्रार्थना है-तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु-हमारे मन को कल्याणकारी संकल्प से भरो। विरोधाभास ध्यान देने योग्य है। मन हमारा है, इसे शुभ या शिव बनाने की प्रार्थना हम दूसरे से क्यों करते हैं? प्रार्थना का अन्तर्भूत तत्त्व ऐसा नहीं है। कोई देवता प्रार्थना सुनकर हमारा मन ठीक करे या न करे? लेकिन चित्त से उगी प्रार्थना हमारे चित्त के अणु-परमाणु को शिव तत्त्व से भर देती है। मैंने हजारों निबन्ध लिखे हैं। कोई पूछे कि इन सबका आधारभूत तत्त्व क्या है? मैं उत्तर देता हूँ कि हमारा लेखन, भाषण और समूचा राजनैतिक कार्य-व्यवहार प्रार्थना ही है। सिर्फ प्रार्थना ही। प्रार्थना है कि हिंसा से भरे स्वजन संवेदनशील हों।
पतंजलि का योग ‘चित्तवृत्ति निरोध’ है। श्रीकृष्ण का योग ‘मनोनिग्रह’ है। दोनो का मन्तव्य एक है। श्रीकृष्ण ‘अभ्यास और वैराग्य’ का मन्त्र देते हैं। पतंजलि की भाषा भी वही है ”अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः-अभ्यास और वैराग्य से इन वृत्तियों का नियंत्रण संभव है।“ (पतंजलियोगसूत्र 1.12) वे आगे अभ्यास की परिभाषा बताते हैं ”इन दो (अभ्यास, वैराग्य) में अभ्यास स्वयं में दृढ़ता से प्रतिष्ठित होने का प्रयास है-तत्रस्थितौ यत्नो अभ्यासः।“ (वही 13) अभ्यास का संकल्प महत्वपूर्ण है। अभ्यास स्वयं के प्रति सजग चेष्टा है, वैराग्य इच्छा शून्यता है। अभ्यास और वैराग्य चित्त को संयत करते हैं। योगासन और ध्यान इसी के उपकरण हैं। व्यक्तित्व की पूरी ऊर्जा को एकाग्र करने का नाम अभ्यास है। फिर वैराग्य बताते हैं, ”ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सजग प्रयास से भोग आसक्ति के प्रति वितृष्णा वैराग्य की प्रथम अवस्था है, पुरूष के अंतरतम का बोध होने पर सभी इच्छाओं का विलीनीकरण वैराग्य की पूर्णता है।“ (वही 15 व 16) श्रीकृष्ण ने कहा, ”असंयत के लिये योग कठिन है, लेकिन संयत व्यक्ति संकल्पबद्ध होकर योगलब्ध हो जाता है।“ (गीता 6.36)
पतंजलि योग सूत्र¨ं में दर्शन के आत्मिक अनुभव में मन की चंचलता बाधा है। बाधाएं और भी हैं। पतंजलि ने योग सूत्र (30) में बताया है कि “रोग, प्राणहीनता, संशय, प्रमाद, आलस्य, आसक्ति, भ्रान्ति और अस्थिरता बाधाएं हैं। दुख, निराशा, कपकपी और अनियमित श्वसन लक्षण हैं।” यहां ‘रोग’ ध्यान देने योग्य हैं। पतंजलि वैद्य या चिकित्सक नहीं थे। चरक संहिता आयुर्विज्ञान का प्रख्यात ग्रंथ है। बताते हैं-“बिना रोग का होना सुख है और रोग दुख है।” आगे स्वास्थ्य के बारे कहते हैं “जब मन और बुद्धि का समान योग रहता है तब मनुष्य स्वस्थ रहता है जब इनका अतियोग, अयोग और मिथ्या योग होता है तब रोग।” रोग मन और बुद्धि के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग के परिणामी है। योग परम स्वास्थ्य है। प्राण और शरीर का योग जीवन है। प्राण का कम होना जीवनी शक्ति का घटना है। आलस्य प्राण शक्ति घटाता है, आसक्ति बढ़ाता है।
पतंजलि ने मनुष्य का रहस्यपूर्ण विवेचन किया है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्म से स्वस्थ व्यक्ति हिंसक नहीं हो सकता। आनंदित व्यक्ति सृजन करता है और तनावग्रस्त व्यक्ति ध्वंस। योग तनावग्रस्त विश्वमानवता को भारत का प्रशांत उपहार है। लेकिन योग का विज्ञान पढ़ने से ही समझ में नहीं आता। यह पठनीय कम करणीय ज्यादा है। लेकिन हमारी लत है कि पठन पाठन ही ज्यादा है, करणीय कम।

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