आपसी रिश्तों में मोह और भावनात्मक लगाव से क्यों मिलता है दर्द? जानिए कामेश के विचार
कामेश।
भारतीय समाज की यह परम्परा पुरानी रही है कि यहां पर रिश्तों की एहमियत बहुत अधिक होती है। लोगों के दिल दिमाग में अपनेपन का भाव कूट-कूट कर भरा होता है। हर जगह ‘अपना’ शब्द अवश्य अपना स्थान रखता है। अपने लोग अपना गांव अपनी जाति, अपना धर्म इस तरह से परिवार की छोटी इकाई से अपनापन शुरू होकर समाज के व्यापक पैमाने तक अपनापन नज़र आता है यहां कोई भी भूमिका निभाने के लिए व्यक्ति को पारिवारिक पृष्ठभूमि का सहारा अवश्य लेना पड़ता है। यद्यपि यह स्थिति सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं अपितु समूचे विश्व समुदाय में व्याप्त है फिर भी भारत में संयुक्त परिवार का प्रचलन इस स्थिती को और भी मजबूती प्रदान करता है। लोग यहां पर अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी तो समझते ही है इसके अलावा इतना अधिक अपनेपन के मोह से बंधे भी होते हैं कि यदि परिवार के किसी एक सदस्य को तनिक भी तकलीफ हो जाए ता पूरा परिवार सदमें मे आ जाता है। जिसे तकलीफ है वो उतना दुःखी नहीं होता जितना की उसके चाहने वाले सगे सम्बंधी होते हैं।
वास्तव में सगे सम्बंधियों के इसी अति लगाव की वजह से ही प्रकृति में दर्द का रसायन बनता है जिससे प्रदूषण फैलता है। प्रकृति में कुछ भी दर्दनाक नहीं होता प्रकृति दर्द को निर्मित नहीं करती बल्की हमारी सोच और मोह की वजह से ही दर्द होता है। जैसे कि यदि हम ज्यादा शारीरिक दर्द का एहसास करते हैं तो अपने भीतर के किसी ऐसे प्रदूषण का खात्मा कर रहे होते है जो कि हमारी वास्तविक निर्माण में बाधा उत्पन्न करने वाला होता है। प्रकृति सिर्फ निर्माण करती है वह किसी को दर्द देने का काम नहीं करती। हम अपनी सोच अपने तर्कों से ही प्रकृति के निर्माण को अपने विपरीत मान कर दर्द का एहसास करने लगते हैं। जैसे किसी व्यक्ति को शरीर में ज्वर हो गया तो प्रकृति इसके अंदर के कुछ प्रदूषण खत्म करने का काम कर रही होती है परन्तु हम उसे अपनी सोच से दवाओं के माध्यम से दबा देते हैं और वह प्रदूषण निकलने नहीं पाता परिणाम स्वरूप वह हमारे अंदर अन्य बड़े रोग का रूप धारण कर लेता है और दर्द को बढ़ाने लगता है। इसी तरह शरीर में कहीं फोड़ा हो गया तो वह यद्यपि प्राकृतिक रूप से शरीर के विकार को बाहर निकालने की प्रक्रिया होती है। परन्तु हम उसे दवाओं से दबा देते हें और वह अंदर नासूर बन कर भयंकर रोग बन जाता है और तब हम अपने परिवार सहित उस दर्द से गुजरने के लिए मजबूर होते हैं।
शारीरिक रूप से दर्द तो मात्र उसी व्यक्ति को होता है जिसे रोग हुआ है। परन्तु पारिवारिक रिश्तों के कारण उसके उस शारीरिक दर्द से उसे किस तरह निजात मिले यह सोचकर पूरा परिवार मानसिक रूप से पीड़ित हो उठता है और समूचे परिवार से हाय-हाय की ध्वनि प्रकृति में फैलने लगती है। दर्द की गन्ध बनने लगती है और फिर सारा परिवार प्रकृति को इस निर्माण प्रक्रिया को ईश्वर का दण्ड सजा आदि मानकर ईश्वर को कोशने लगते हैं। परन्तु परिवार को ये नहीं पता होता कि जिसकी हमदर्दी में तुम अपने आंसू बहा रहे हो वस्तुतः उसका दर्द कम नहीं कर रहा बल्की अपरोक्ष रूप में उसके दर्द को बढ़ावा दे रहे होते हैं। ये चुम्बकीय प्रणाली की प्रक्रिया है जो कि प्राकृतिक रूप से क्रियाशील होती है जिसके बारे में सोच कर दर्द का एहसास करते हैं उसके दर्द की गंध हमारे बनाए हुए एहसासी गन्ध को खींच लेता है और उसके दर्द में और भी अधिक बढ़ोत्तरी हो जाती है। इस तरह हम अपनेपन में अति भावुक होकर अप्रत्यक्ष रूप से वह क्रिया करते रहते हैं जो हम खुद नहीं चाहते जबकि रोगी के लिए हमदर्दी की जरूरत नही होती बल्की उत्साहवर्धन की जरूरत होती है। उदाहरण रूप से हम सकते हैं कि पशुओं में पारिवारिक मोह बंधन नहीं होता यदि एक पशु बिमार भी है तो दूसरा उसके प्रति कोई प्रक्रिया करने की कोशिश नहीं करता परिणाम स्वरूप मानव की अपेक्षा पशुओं को रोग बहुत कम होता है और यदि होता भी है तो जल्दी ठीक हो जाता है। आज कुछ पशुओं को रोग हो भी रहे हैं उसकी भी वजह मानव ही बना हुआ है क्योंकि यह पशुपालन करने की प्रवृत्ति से जुड़ गया और अपने पशु पालने लगा। इसका अपनेपन का रोग पशुओं को भी लगने लगा और यह भी देख सकते हैं कि ज्यादातर रोग उन्हीं पशुओं को होते है जो बंधे हुए हैं। खुले पशुओं में रोग नहीं होता। वस्तुतः जो पशु मानव के सम्पर्क में होते हैं उनके प्रति मानव की सोच ही उनमें भी प्रदूषण फैला कर रोगी बनाने लगी है।
सबसे बड़ा प्रदूषण मानव की सोच से ही होता है आज जो समाज में बात फैली हुई है कि प्रकृति में प्रदूषण फैल रहा है इससे नाना प्रकार की बीमारी फैल रही है। इसके कारण बताए जाते हैं वस्तुतः वो कारण भी मानव की खुराफात के ही परिणाम तो है। जैसे धुएं से प्रदूषण फैलना अब विभिन्न कल कारखानों का निर्माण विभिन्नअस्त्र निर्माण, गाड़ियों का विस्तार। अधिकाधिक रूप से प्रदूषण तो मानव ही फैला रहा है। और ये प्रदूषण तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाले है। परन्तु इसके अलावा जो अप्रत्यक्ष प्रदूषण और रोग पैदा करने वाले कारक है वो और भी खतरनाक है। और वह मानव की अपनी सोच से ही है। वास्तव में प्रकृति में दर्द नाम की कोई विधा होती ही नहीं परन्तु मानव को उसकी मूल प्रवृत्ति से भटकाकर दूसरी दिशा में मोड़ कर उसके अंदर परिवारवाद अपनापन मोह ममता आदि का विस्तार राक्षसों द्वारा प्रकृति का शोषण करने हेतु की गई प्रक्रिया का परिणाम है। राक्षसों ने ही मानव को समाजवादी बना कर इसके अंदर से दर्द की गंध निकालने का काम लेने लगी। हर इंसान आज किसी न किसी बात से दुःखी अवश्य रहता है। वह चाहे पारिवारिक पीड़ा हो या समाजिक, मानसिक या शारीरिक पीड़ा अवश्य है।
यदि मानव अपनेपन का भाव त्याग दे और वह यह मान ले कि दुनिया में मैं अकेला आया हूं अकेले अपना जीवन जीना है तो निश्चित ही प्रकृति से दर्द विधा का पूर्णतः खात्मा हो सकता है। मानव की मोह और ममता ही एक दूसरे को मिला का संबंधों को मजबूत करात है और इसमें भी व्यक्ति की वास्तविक प्रक्रिया नहीं है। जीव से जीव का जन्म होना तो अप्राकृतिक है क्योंकि सीधी सी बात है कि जीव से जीव की उत्पत्ति भी तो कृत्रिम विधा है वास्तव में तो प्राकृतिक विधा सिर्फ वही हो सकती है जो स्वतः से उत्पन्न हो। जिसका प्रकृति के अलावा किसी और से कोई सम्बंध ना हो और जो पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर हो और हम देखते हैं कि हम सभी प्रकृति के संसाधनों का उपयोग तो करते हैं पर उसमें भी अपने अनुसार कुछ अलग तरीका ढूंढ़ लेते हैं। और उसकी तरीके से प्रकृति का शोषण करने लग जाते हैं। परिवारवाद के मोह में पड़ कर ही मानव लालची बनता चला गया और प्रकृति पर अपना अधिकार जताने लगा। और अपने आने वाली संतानों के लिए संरक्षित करने की होड़ मेें लगा हुआ है। इस तरह यदि वह ऐसा नहीं कर पाता तो दुःखी होता है और प्रकृति में इस तरह की दर्द की गंध छोड़ने का काम करने लगता है। अर्थात् मानव मोह और रिश्तों में पड़कर ही खुद भी दर्द का एहसास करता है और प्रकृति में भी दर्द का विस्तार करता है।
लेखक परिचय: कामेश, लखनऊ।
कामेश लखनऊ के लेखक हैं, जिनकी लेखनी में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक संबंधों और जीवन-दर्शन से जुड़े विषयों पर चिंतन की झलक मिलती है। वे अपने लेखों के माध्यम से मानव मन, पारिवारिक रिश्तों, मोह-ममता और सुख-दुख के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास करते हैं। उनकी लेखन शैली विचारपरक है, जिसमें जीवन और समाज को एक अलग दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा मिलती है।
उनका लेख ‘आपसी संबंधों से ही दर्द का जन्म’ मानवीय रिश्तों, भावनात्मक जुड़ाव और दुख की अनुभूति जैसे विषयों पर उनके चिंतन को सामने रखता है। कामेश का लेखन पाठकों को जीवन, संबंधों और अपनी सोच पर आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है।
