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जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास, महत्व और परंपरा: जानें इस महापर्व की पूरी कहानी

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इतिहास, परंपरा, महाप्रसाद, छेरा पहरा और तीनों रथों की जानकारी

संजय मिश्र।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत के सबसे प्रमुख धार्मिक उत्सवों में गिनी जाती है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन आयोजित होने वाला यह महापर्व करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। इसे वह दुर्लभ अवसर माना जाता है, जब भगवान स्वयं भक्तों के बीच आकर दर्शन देते हैं।

सदियों पुरानी परंपरा

पुरी की रथ यात्रा का इतिहास कई शताब्दियों पुराना माना जाता है। वर्तमान श्रीजगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव के शासनकाल में हुआ था। धार्मिक ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ की उपासना का उल्लेख इससे भी पहले का मिलता है, जिससे इस परंपरा की प्राचीनता का पता चलता है।

गुंडिचा यात्रा का धार्मिक महत्व

रथ यात्रा को गुंडिचा यात्रा भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा इस दिन गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां कुछ दिनों तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुड़ा यात्रा के जरिए तीनों देवता वापस श्रीमंदिर लौटते हैं। वापसी के दौरान मौसी मां मंदिर में भगवान को पारंपरिक पोड़ा पिठा का भोग अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है।

हर साल नए बनते हैं तीनों रथ

रथ यात्रा का सबसे खास आकर्षण भगवानों के विशाल लकड़ी के रथ होते हैं। इनका निर्माण हर वर्ष नए सिरे से पारंपरिक नियमों के अनुसार किया जाता है। विशेष प्रकार की लकड़ी से तैयार होने वाले इन रथों को बनाने में सैकड़ों कारीगर कई महीनों तक जुटे रहते हैं।

तीनों रथों की अलग पहचान

भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष 16 पहियों वाला और लगभग 45 फीट ऊंचा होता है। भगवान बलभद्र तालध्वज नामक 14 पहियों वाले रथ पर विराजमान होते हैं, जबकि देवी सुभद्रा का दर्पदलन 12 पहियों वाला रथ होता है। प्रत्येक रथ का रंग, ध्वज, सारथी और अन्य विशेषताएं परंपरागत मान्यताओं के अनुसार निर्धारित की जाती हैं।

स्नान पूर्णिमा से होती है शुरुआत

रथ यात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान पूर्णिमा का आयोजन किया जाता है। इस दौरान तीनों देव विग्रहों का 108 कलशों के पवित्र जल से अभिषेक होता है। इसके बाद भगवान 14 दिनों तक अनासर काल में रहते हैं, जब आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहते हैं। नेत्रोत्सव के बाद पुनः दर्शन शुरू होते हैं और फिर रथ यात्रा का आयोजन होता है।

छेरा पहरा की अनोखी परंपरा

रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक छेरा पहरा है। इस परंपरा के तहत पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से रथों के आसपास प्रतीकात्मक सफाई करते हैं। यह परंपरा इस संदेश को दर्शाती है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं और सेवा सर्वोच्च मानी जाती है।

महाप्रसाद की विशेष पहचान

पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद भी विशेष महत्व रखता है। मंदिर की विशाल रसोई में पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में भोजन तैयार किया जाता है। इसे बिना किसी भेदभाव के सभी श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है, जो सामाजिक समानता और सामूहिकता का प्रतीक माना जाता है।

देश ही नहीं, विदेशों में भी उत्साह

आज जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन केवल पुरी तक सीमित नहीं है। भारत के कई शहरों के अलावा लंदन, न्यूयॉर्क, टोरंटो, सिडनी सहित दुनिया के अनेक देशों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ यह पर्व मनाया जाता है। हालांकि, अपनी ऐतिहासिक परंपरा और धार्मिक महत्व के कारण पुरी की रथ यात्रा का विशेष स्थान बना हुआ है।

आस्था के साथ सामाजिक संदेश

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, सेवा, समानता और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। सदियों से यह महापर्व लोगों को एकता, भाईचारे और भक्ति का संदेश देता आ रहा है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं।

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