डॉ. विनीता मिश्र की यह मार्मिक कविता नफ़रत, हिंसा, झूठ और संवेदनहीनता के बढ़ते माहौल पर सवाल उठाती है तथा इंसानियत के क्षरण की दर्दनाक तस्वीर प्रस्तुत करती है
डॉ. विनीता मिश्रI
मोहब्बतों की बात पर, तूफान उठ रहा
नफरतों के दौर का ,इंसान उठ रहा I
दहशत भरी है आँख में, सीने मे आग सी
खंज़र पकड़ के हाथ में,शैतान उठ रहा l
सच को कुचल रहा है,अब झूठ का पहिया
लेकर बही-खाते, बेईमान उठ रहा l
चिथड़े पड़े थे चीख के, आबरू बिखर गयी
इंसान मर गया, तो हैवान उठ रहा l
कल रात भूख की तड़प से कौन मर गया ?
झूठी सी आह ! भर के ,जहान उठ रहा l

🧘♀️ मन की एक्सरसाइज़ करो यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन को बदलने की एक गहरी साधना है; जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हम नियमित व्यायाम करते हैं, वैसे ही मन को शांत, संतुलित और जागरूक रखने के लिए “मानसिक व्यायाम” अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि सड़क पर ट्रैफिक का नियंत्रण तो हम सभी देखते हैं, लेकिन वास्तविक आवश्यकता अपने विचारों के ट्रैफिक को नियंत्रित करने की होती है, और यदि हम केवल एक सेकंड के लिए भी अपने व्यर्थ विचारों को रोकना सीख लें, तो धीरे-धीरे भीतर की नकारात्मकता पर पूर्ण विराम लगाया जा सकता है — यही आत्म-जागृति, आत्म-नियंत्रण और सच्ची साधना का मार्ग है, जहाँ मनुष्य व्यवस्था बदलने से पहले स्वयं को बदलता है।
यह कविता केवल समाज की पीड़ा का चित्रण नहीं, बल्कि आत्म-जागृति का एक सशक्त आह्वान भी है। जब मनुष्य अपनी आत्मिक चेतना से दूर हो जाता है, तब क्रोध, हिंसा, असत्य और स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगती हैं; आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल व्यवस्था को बदलने की नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने की है।
मैं विनीता जी को व्यक्तिगत रूप से जानती हूँ। उनकी प्रत्येक रचना हृदय की गहराइयों से निकलती है और समाज की सच्चाइयों को अत्यंत संवेदनशीलता और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करती है। यह कविता भी केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान समय का सजीव दर्पण है।
With regards
Shalini Chandra
Spiritual Counsellor | Holistic Healer | Stress Management Coach