डॉ. विनीता मिश्र की यह मार्मिक कविता नफ़रत, हिंसा, झूठ और संवेदनहीनता के बढ़ते माहौल पर सवाल उठाती है तथा इंसानियत के क्षरण की दर्दनाक तस्वीर प्रस्तुत करती है
डॉ. विनीता मिश्रI
मोहब्बतों की बात पर, तूफान उठ रहा
नफरतों के दौर का ,इंसान उठ रहा I
दहशत भरी है आँख में, सीने मे आग सी
खंज़र पकड़ के हाथ में,शैतान उठ रहा l
सच को कुचल रहा है,अब झूठ का पहिया
लेकर बही-खाते, बेईमान उठ रहा l
चिथड़े पड़े थे चीख के, आबरू बिखर गयी
इंसान मर गया, तो हैवान उठ रहा l
कल रात भूख की तड़प से कौन मर गया ?
झूठी सी आह ! भर के ,जहान उठ रहा l
