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मोहनजोदड़ो की पशुपति मुहर और शिव: इतिहास, पुरातत्व और पहचान की बहस

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हृदयनारायण दीक्षित।


अभी तक भारतीय इतिहास बोध को अपनी मंशा के अनुसार बदलने की कोशिशें चल रही थीं। अब देवी देवताओं पर भी हमले हैं। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त 4300 वर्ष पुरानी पशुपति मुहर और मूलबंधासन योग मुद्रा में बैठी आकृति को शिव का रूप बताया है और हमें भारत की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक बताया है। एक इतिहासकार आद्रे ने इस दावे को खारिज कर दिया है और कहा है कि यह आकृति शिव की नहीं है। यह पश्चिमी संस्कृति और यूरेशियाई पशुओं के देवता से प्रभावित है। इसके पहले भी ऐसे लोग सिंधु सभ्यता पर बाहरी प्रभावों का जिक्र करते रहे हैं। दरअसल 1922 में मोहनजोदड़ो में खुदाई के दौरान एएसआई के महानिदेशक मार्शल ने इसे शिव का रूप बताया था। उन्होंने अपनी किताब में भी शिव का प्रारंभिक रूप बताया है। लेखक अमीश ने मुहर पर अंकित जानवरों को विदेशी नहीं बताया। वे भारत में पाए जाते हैं।


दक्षिणी पश्चिमी ईरान में भी यह पशु प्राकृतिक रूप में नहीं पाए जाते। डॉ0 एल. वेमसानी का तर्क ध्यान देने योग्य है। पशुपति मुहर में आकृति योग मुद्रा में है। पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा बहुत पहले से ही भारतीय इतिहास को विकृत किया जाता रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने हम भारत के निवासियों को बाहर से आया हमलावर बताया था। लेकिन यह झूठ पकड़ा गया। वे सिद्ध करना चाहते थे कि भारतीय ज्ञान, देवता और सभ्यता उधार के हैं। जबकि भारत में ऋग्वैदिक काल और उसके बहुत पहले से सांस्कृतिक निरंतरता है। आर्य आक्रमण का झूठ लोग जान गए हैं। शिव भारत के देवता ही हैं। यजुर्वेद का एक पूरा अध्याय शिव पर है। अब आर्य आक्रमण की बात करने वाले खिसियाए हुए हैं। संस्कृति मंत्रालय ने एक ट्वीट में लिखा है कि, ”भारत के अखंड और निरंतर चली आ रही सभ्यता की यह सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक है। अविभाजित भारत के मोहनजोदड़ो में मिली यह लगभग 4300 साल पुरानी मुहर एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति को दिखाती है, जिसे व्यापक रूप से शिव पशुपति माना जाता है। यह आकृति मूलबंधासन में बैठी दिखाई देती है और उसके चारों ओर कई जानवर बने हुए हैं।”


इतिहास की वैज्ञानिक समझ से वर्तमान को बदलना माक्र्सवादी लक्ष्य था, उन्होंने वर्तमान की निजी जरूरतों के मुताबिक इतिहास बदला। यही काम अंग्रेजों ने किया। उन्होंने अंग्रेजी राज को जायज ठहराने के लिए भारत का नया इतिहास लिखाया। इतिहास से सीखकर वर्तमान बदलना अच्छा विचार है, लेकिन अपनी आवश्यकतानुसार इतिहास बदलना महापाप है। इतिहास ने उन्हें दंडित किया। माक्र्सवादी इतिहास शेष रहे, लेकिन दोनों के विषाणु भारत में आज भी मौजूद हैं। भारत पर अंग्रेजी शासन के लिए भाषा, इतिहास, सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान जरूरी था। बेशक पश्चिमी विद्वानों ने मेहनत की। पश्चिम की संस्कृति का मूलाधार यूनान था, लेकिन विलियम जोंस ने थर्ड एनुअल डिसकोर्स एशियाटिक रिसर्चेज में कहा, “यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस और प्लेटो के उत्कृष्ट अनुभव प्राचीन भारतीय ऋषियों के अनुरूप थे। हिन्दू कला व शौर्य में विलक्षण थे। प्रशासन में सुयोग्य, विधि निर्माण में बुद्धिमान और ज्ञान में प्रवीण थे। डेविड कोफ जैसे विद्वानों को भारतीय समाज वैदिक आदर्शों से भटका हुआ लगा। वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं थी।“ यह अध्ययन ईसाई मिशनरियों के लिए खतरनाक था। उनकी नजर में शासन के लिए अंग्रेजी और परमात्मा के मार्ग के लिए प्रभु ईशु ही विकल्प थे। इस चुनौती से जूझे एक अंग्रेज जेएस मिल। जेएस मिल ने ‘हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया‘ लिखकर भारत के सनातन ज्ञान पर हल्ला बोला। इतिहास में उन्हें ‘उपयोगितावादी चिंतक‘ की सही संज्ञा मिली।


कांग्रेसजनों और माक्र्सवादिय¨ं का उपयोगितावाद विचारणीय है। बच्चे पढ़ें कि आर्यों ने ईरान के रास्ते आकर हड़प्पा सभ्यता नष्ट की। किले तोड़े। वे चरवाहे और लुटेरे थे। मोहन जोदड़ो और हड़प्पावासी सभ्य थे। हड़प्पा सभ्यता का पतन दरअसल 1750 ई. पूर्व के आस-पास हुआ। कालीबंगा की खोदाई से मिले तथ्यों में यही समय सरस्वती के सूखने का भी है। ऋग्वेद में सरस्वती भरी पूरी वेगवती आराध्य नदी है। ऋग्वेद के बाद रचे गए यजुर्वेद में भी सरस्वती पूरे यौवन और उफान पर है। ऋग्वेद, यजुर्वेद के बाद सरस्वती सूखी और हड़प्पा सभ्यता का ह्रास हुआ। सरस्वती समय विभाजक रेखा है। उसे पार करके ही आर्य आक्रमण के झूठ का प्रचार संभव है। ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता से पुराना है। मिस्त्र और सुमेर की सभ्यता से भी प्राचीन। दयाराम साहनी व आर. के. बनर्जी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो नामक दो प्राचीन नगरों की खोज (1921-22) की। हड़प्पा रावी तट पर था, मोहनजोदड़ो सिध पर।


राम प्रसाद चंद ने आर्यों को हड़प्पा सभ्यता के नाश का अभियुक्त ठहराया। चंद ने ऋग्वेद का सहारा लिया। उन्होंने ‘पणि‘ को इन नगरों का मूल निवासी बताया। इंद्र को पुर¨हा-पुरंदर ध्वंसक बताया। चंद के अनुसार इंद्र ने आर्य दिवोदास के लिए दास शंबर के पुर जीते। शंबर ‘दास‘ था। पहाड़ पर रहता था, जबकि सच यह है कि पहाड़ पर न मोहन जोदड़ो था और न ही हड़प्पा। फिर ऋग्वेद (9.61.2) में दिवोदास के शत्रुओं की सूची में शंबर के साथ यदु और तुर्वस जैसे आर्य भी हैं यानी कथित आर्य हमले में दोनों तरफ आर्य थे। सवाल पेंचीदे हैं। उन्होंने ऋग्वेद को गवाह बनाया है यानी ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता के नाश (सरस्वती के सूख जाने) के बाद रचा गया। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् रेनफ्रीव ने लिखा-“आर्य आक्रमण का समय निर्धारण निःसंदेह डांवाडोल है।“ ऋग्वेद 10-15 हजार वर्ष से ज्यादा पुराना है। पश्चिम के विद्वान भी इसे 2500-3000 वर्ष पुराना मानते हैं। सिंधु क्षेत्र में सिंधु लिपि थी। इसी से ब्राह्मी आई।


लैंगडन के अनुसार सिंधु की चित्र लिपि का समय 2800 ई.पू. है। उन्होंने लिखा-“इतिहास जितना मानता है, भारत में आर्य उससे कहीं अधिक प्राचीन हैं।“ फिलाडेल्फिया के पुरातत्वविद डेल्स 1960 के दशक में पाकिस्तान में उत्खनन कार्य से जुड़े। उन्होंने ‘द मिथिकल मैस्केयर ऑफ मोहनजोदड़ो‘ (मोहनजोदड़ो के हत्याकांड की कपोलकथा) में व्हीलर, चंद, मार्शल, मैकाय आदि सिद्धांतकारों की बातें काट दीं। रेनफ्रीव ने आर्यों को भारत का मूल निवासी माना, आर्य आक्रमण सिद्धांत को गलत बताया। उन्होंने लिखा-“ऋग्वेद के दर्जन भर प्रसंगों में से एक में भी आक्रमण का संकेत नहीं मिलता।“ प्रख्यात मार्क्सवादी विचारक डॉ. रामविलास शर्मा ने आर्य आक्रमण को भाषाविज्ञान की कल्पना बताते हुए लिखा-“सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले भारतीय शब्दों के ईरानी, यूरोपियन प्रतिरूपों में सघोषता और महाप्राणता का संयोग नहीं होता। यह विशेषता केवल भारतीय आर्य भाषाओं की है। यही एक तथ्य आर्य आक्रमण सिद्धांत को ध्वस्त करने के लिए काफी है।“ डॉ. अम्बेडकर ने ऋग्वेद के छठे, सातवें, आठवें और नौवें मंडल के सूक्तों के हवाले से लिखा-“लेखकों ने आर्य नस्ल का जो सिद्धांत बनाया वह वैज्ञानिक अनुसंधान का उल्टा है। भारत ही आर्यों का मूल निवास था।“

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