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केजीएमयू कुलपति: सांस रोगों में आधुनिक इलाज व जागरूकता जरूरी

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सामान्य जीवन भी मुश्किल, प्रदूषण से सांस के रोगियों पर दोहरी मारः डॉ. सूर्यकान्त

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित ‘रेस्पिवॉक 2026’ सम्मेलन के दूसरे दिन कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद (पद्मश्री) एवं रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस भव्य सम्मेलन के मुख्य आयोजक डॉ. सूर्यकान्त के कुशल एवं प्रेरणादायी नेतृत्व में आज ब्राउन हॉल में देश भर के प्रख्यात चिकित्सकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, और कार्यक्रम में चार चांद लगा कर सफल बनाया।

रेस्पिवॉक-2026 सम्मेलन में कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानन्द ने कहा कि श्वसन रोगों के बढ़ते मामलों के बीच आधुनिक तकनीकों और जनजागरूकता का समन्वय अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि उन्नत चिकित्सा पद्धतियाँ रोगों की शीघ्र पहचान और बेहतर उपचार में सहायक हैं, लेकिन इसके साथ-साथ लोगों में लक्षणों की समय पर पहचान, प्रदूषण से बचाव और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता भी जरूरी है। ‘रेस्पिवॉक-2026’ के सफल आयोजन हेतु डॉ. सूर्यकान्त को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व में यह सम्मेलन ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी रहा। इस पहल से श्वसन रोगों के उपचार और जागरूकता को नई दिशा मिलेगी, जो समाज के लिए अत्यंत लाभकारी है।

ऑर्गनाइजेशन फॉर कान्सर्नवेशन ऑफ एन्वारन्मेन्ट एण्ड नेचर (ओशन) के अध्यक्ष डा0 सूर्यकान्त ने स्वयं वायु मित्र अभियान पर अपना अत्यंत प्रभावशाली व्याख्यान प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सामुदायिक जागरूकता और जन भागीदारी पर विशेष बल दिया। डॉ. सूर्यकान्त एक श्वसन रोग विशेषज्ञ के रूप में मानते हैं कि आज “स्वच्छ वायु” केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक अनिवार्य चिकित्सकीय आवश्यकता बन चुकी है। जिस प्रकार दवाइयाँ और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी हैं, उसी प्रकार स्वच्छ हवा भी अच्छे स्वास्थ्य की आधारशिला है। भारत के कई शहर, विशेषकर दिल्ली और लखनऊ, लगातार अत्यधिक वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। यहाँ पीएम 2.5 का स्तर सुरक्षित मानकों से कई गुना अधिक है, जिससे हर व्यक्ति अनजाने में विषैली हवा में सांस ले रहा है। इसका सीधा प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। डॉ. सूर्यकान्त के अनुसार उनके दैनिक चिकित्सा अनुभव में अस्थमा, एलर्जी, लगातार खांसी और सांस फूलने के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। शोध बताते हैं कि प्रदूषित शहरों में बच्चों में अस्थमा का खतरा काफी बढ़ गया है, और लगभग हर तीन में से एक बच्चा फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी से प्रभावित हो सकता है। वे बताते हैं कि वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करता है। सूक्ष्म कण रक्त में मिलकर हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं। यहां तक कि गर्भावस्था में भी इसका प्रभाव भू्रण के विकास पर पड़ता है। डॉ. सूर्यकान्त इस बात पर जोर देते हैं कि समय पर पहचान और रोकथाम बेहद जरूरी है, क्योंकि कई लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। वे “वायु मित्र” की अवधारणा को महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि हर नागरिक छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ा बदलाव ला सकता है जैसे वाहन का कम उपयोग, कचरा न जलाना, ऊर्जा बचाना और वृक्षारोपण करना। उन्होने सभी प्रतिभागियों को वायु प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के लिए “वायु मित्र” बनने की शपथ दिलायी।

इस महत्वपूर्ण सत्र की अध्यक्षता डॉ. अश्वनी कुमार मिश्रा और डॉ. गौरव श्रीवास्तव द्वारा की गई। इसी क्रम में चर्चा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. रुचि दुआ ने मेटाबोलिक सीओपीडी पर और लेफ्टिनेंट कर्नल डॉ. किसलय किशोर ने सीओपीडी रोकथाम के वैश्विक दृष्टिकोण पर अपने विचार रखे। दमा के भविष्य और इसकी रोकथाम पर डॉ. अभिषेक टंडन और डॉ. वी. के. जैन ने विस्तृत जानकारी साझा की। फेफड़ों की गंभीर बीमारी आई.एल.डी. के सत्र में डॉ. अशोक कुमार सिंह ने शुरुआती हस्तक्षेप और डॉ. अनुभूति सिंह ने ऑटोइम्यून आई.एल.डी. के बारे में विस्तार से बताया, जबकि डॉ. रंगनाथ टी.जी. ने फेफड़ों के फाइब्रोसिस से जुड़े नवीन शोध प्रस्तुत किए।

डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि सम्मेलन के तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने आधुनिक चिकित्सा उपकरणों के महत्व पर प्रकाश डाला। दिल्ली एम्स से आये डॉ. सौरभ मित्तल ने गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में क्रायोथेरेपी के बढ़ते उपयोग पर चर्चा की, वहीं डॉ. संदीप भट्टाचार्य ने रेस्पिरेटरी मेडिसिन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्रांतिकारी महत्व को रेखांकित किया। इसी कड़ी में डॉ. अंकित भाटिया ने बेनाइन एयरवे स्टेनोसिस जैसे जटिल विषयों पर अपनी बात रखी। सम्मेलन का एक मुख्य आकर्षण डॉ. मनोज कुमार गोयल द्वारा दिया गया प्रतिष्ठित खन्ना मुखर्जी नाथ मेमोरियल व्याख्यान रहा, जिसकी अध्यक्षता डॉ. सूर्यकान्त, डॉ. आर ए एस कुशवाहा और डॉ. अंकित कुमार ने की। इस कार्यक्रम में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जयपुर के डॉ. वी के जैन, केजीएमयू एल्मनाई एसोशिएशन के अध्यक्ष डॉ. एस डी पाण्डेय तथा सचिव डॉ. पी के शर्मा ने भी अपने विचार रखें।

सम्मेलन के अंतिम चरण में नॉर्थ जोन टास्क फोर्स, राष्ट्रीय टी.बी. उन्मूलन कार्यक्रम क्षय रोग (टीबी) उन्मूलन के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त के मार्गदर्शन में टीबी की चुनौतियों से निपटने हेतु एक विशेष पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसमें डॉ. गजेंद्र विक्रम सिंह, डॉ. दर्शन कुमार बजाज और डॉ. ज्योति बाजपेई ने भविष्य की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. सूर्यकान्त ने आयोजन सचिव डॉ. अंकित कुमार और पूरी आयोजन समिति के अथक परिश्रम की सराहना करते हुए उन्हें इस सफल आयोजन की बधाई दी। उन्होंने घोषणा की कि सम्मेलन के सभी प्रतिभागियों को पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन सोसाइटी (पीआरएस) की आजीवन सदस्यता प्रदान की जाएगी। जिसके साथ डॉ. अंकित कुमार ने दो दिवसीय इस शैक्षणिक महाकुंभ के समापन की घोषणा करेते हुए देशभर के विभिन्न एम्स एवं चिकित्सा संस्थानों से लगभग 300 पल्मोनोलॉजिस्ट, जनरल फिजिशियन, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ, पीजी रेजिडेंट्स एवं फिजियोथेरेपिस्ट के साथ विभाग के सभी चिकित्सकों, सीनियर-जूनियर डाक्टर्स, समस्त विभाग के स्वास्थ्य कर्मीयों व अन्य सभी विभाग के कर्मीयों को सम्मेलन को सफल बनाने हेतु विशेष आभार व्यक्त किया।

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