मानव जीवन और शांति: आदर्शवादी जीवन की तलाश क्यों अधूरी है?
कामेश।
लखनऊ। मानव जीवन एक सहज जीवन के रूप में इस सृष्टि पर विकास करना शुरू किया परन्तु, धीरे-धीरे यह अपनी आकांक्षाओं और कल्पनाओं में इस कदर डूबता गया कि इसे अपना सहज जीवन तुक्ष लगने लगा और यह अपनी श्रेष्ठता बढ़ाने हेतु खुद से ही विभिन्न उपाय करने में लग गया। यह उसके निजी जीवन को उन चीजों को हासिल करने में कठिन से कठिन कार्य करने में लगाता चला गया। और जितना ही कठिनता की तरफ बढ़ता गया वास्तविकता से उतना ही दूर चला गया। इसे सबसे शांत जीवन मिला था परन्तु अपनी महत्वाकांक्षा के कारण ही अशांति की तरफ बढ़ता चला गया। और स्थिति यह हो गई कि आज का मानव सिर्फ शान्ती की खोज में लग गया है। यह भी भूल गया कि शान्ती कहीं बाहर नहीं बल्कि हमारे भीतर ही है।
वह कभी पहाड़ों पर शान्ती खोजता है तो कभी समुद्र के किनारे और जितनी ही शान्ती की खोज में इधर-उधर भटक रहा है उतना ही और अशांत होता जा रहा है। जहां इसे एक स्थान पर स्थिर होना था वहीं यह दूसरे स्थान पर भाग कर शान्ती चाहने लगा और जहां भी जाता है बाहर की दुनियाँ में ही भटकता है और बाहर की दुनियाँ की स्थितियां देख कर और अशांत हो जा रहा है। जहां इसे अपने अन्दर की शान्ति की दुनियाँ में उतरने की जरूरत थी वहीं यह बाहर की दुनियाँ में बढ़ता जा रहा है और चाहत रखता है शान्ती की। इसकी आज जो भी स्थिती है वास्तव में सहज जीवन न जीने के कारण ही है। ये शांति की चाहत नही है। यही इसका मूल स्वभाव है। जो कि अन्दर से इसे अपनी तरफ खीच रहा है परन्तु यह अपने अन्दर डूबने की जगह दूसरी चीजों में बाहर की दुनिया में भटक रहा है।
शान्त रहना तो इसकी मूल प्रवृत्ति है परन्तु यह अपनी मूल प्रवृत्ति को भुला बैठा है और यह कोई नई बात नहीं है बल्कि सदियों से चली आ रही परम्परा सोच का एक बीभत्स परिणाम है। पीढ़ी-दर पीढ़ी यह मानव के मनोमष्तिस्क पर थोपी गई रीति रिवाज और सभ्यता का परिणाम है। क्योंकि मानव खुद को और अच्छा बनाने के लिए एक सभ्य मानव बनाने के लिए ऐसे-ऐसे नियम कानून लगाने लगा कि यह इन्ही सभ्यताओं के नियमों के पालन में ही वह नियम भी भूल गया जो कि इसके जीवन का मूल था।
ये मानव समाज की एक परम्परा है कि लोग सभ्यता की शिक्षा हमें बचपन से ही देना शुरू कर देते है, और महत्वपूर्ण बात तो ये है कि वे लोग हमें सभ्य बनाना चाहते है जो खुद सभ्यता की खोज में लगे हैं। खास कर कुछ ऐसे विचारक थे ऐसे दार्शनिक जो कि जीवन भर कुछ सिद्धान्तों पर गहन चिन्तन ओर मनन करते हैं ये सिर्फ अपना जीवन इस विषय पर ही व्यर्थ गवा चुके कि किस तरह से दूसरे विचारक और दार्शनिक के सिद्धान्त को झुठा साबित किया जाए ओर अपने सिद्धान्त को श्रेष्ठ बताया जाए। अर्थात् जिनका सिद्धांत ही है कि समाज सिर्फ मेरे अनुसार मेरे सिद्धान्तों पर चले मेरे बनाए नियम कानून का पालन करें और खुद उन्हीं सिद्धान्तों को बनाने में वह सभ्यता औह शान्ती से दूर होता चला गया और समाज को भी भटकने का एक नया मार्ग देता गया। और मानव समाज था ऐसा कि इन्हीं विचारकों के सिद्धान्तों को आदर्श मानते हुए लग लिया इनके पीछे चल पड़ता है उनके बताए मार्गों पर। और फिर सभ्य समाज की स्थापना की यात्रा, फिर जीवन की शान्ती की खोज।
हम सभी इस बात से परिचित हैं कि आज तक हमारे बीच अनगिनत विचारक और दार्शनिक पैदा हुए अपने सिद्धान्त हमें बतलाए और हम उनके सिद्धान्तों का पालन भी किये। यहां तक कि हम उनके सिद्धान्तों के अनुसार ही इस समाज को चलाने और खुद चलने का निर्णय लिए और उनके सिद्धान्त आदर्शवादी थे, सभ्यता की मिशाल थे फिर भी आज समाज किस आदर्शवाद में जी रहा है हमारी आंखों के आगे हैं ,समाज का आदर्शवादी स्वरूप हमारे सामने है। इतने सभ्यता वादी सिद्धान्तों का पालन करने के बाद भी आज मानव समाज राक्षसी प्रवृत्ति का जीवन जीने लगा है।
हमे हमेशा अहिंसा सत्य, धर्म, ईश्वर आदि की शिक्षाए दी जाती रही हमेशा हमें जीवन को शांत खुशहाल और आदर्शवादी बनाने के नियम कायदा सिखाए जाते रहे। परन्तु फिर भी आज दुनिया के 90 प्रतिशत लोग मांस भक्षण से ही अपना पेट भरते हैं। आज समाज में जो स्थिति देखने को मिल रही है लगता है जैसे पूरा मानव समाज मानव जीवन नहीं बल्कि राक्षसी जीवन जी रहा है। हर तरफ हवस भोग विलास का बोल बाला है। हर तरफ जैसे कोहराम मचा है मारो काटो खाओं। जैसे लगता ही नहीं कि जिन सिद्धान्तों पर हम चल रहे है। वो हमें आदर्श सिखाने हेतु बनाए गए थे लगता है वो सारे सिद्धान्त शब्दों में तो आदर्श और सभ्यता की मिशाल थे परन्तु उनका मार्ग सभ्यता की तरफ नहीं बल्कि राक्षसत्व की ओर जा रहा था। लगता है जैसे हमें आदर्श और सभ्यता के नाम पर भटका दिया गया। और हमें वास्तविक मानव जीवन जीने से रोक दिया गया और हमें और अच्छा बनने का लालच दे कर राक्षसी जीवन की तरफ मोड़ दिया गया। और हम आदर्श बाद के मार्ग पर चलने के लिए अपने वास्तविक जीवन को भूलकर मार्ग भटक गए इस तरफ की बजाए उस तरफ चल दिये जिधर हमारा मार्ग ही नहीं था और परिणाम स्वरूप एक बीभत्स मानव समाज की स्थापना होती चली गई। और हमारा जो मूल लक्ष्य था मूल प्रवृत्ति थी जो थी जो हमारा वास्तविक जीवन था हम उससे भटक गए।
हमारे वाह्य जीवन में भटकाव तो हो गया परन्तु हमारी जो आन्तरिक दुनियां है वो हमसे दूर नहीं हुई वो आज भी हमारे भीतर वही खूबसूरती लिए हमारे लौटने का इंतजार कर रही है और यही वजह है कि हमारे भीतर से शान्ती की गूंज चाहत अनवरत उठती रहती है। हमारे भीतर आराम की चाहत आज भी मौजूद है।
हमारे भीतर कुछ तो ऐसा है जो हमें खींच रहा अपनी तरफ मगर हम अपने मार्ग वाह्य जगत में खोजने निकल पड़े हैं। हम कभी ध्यान में डूबने की बात करते है तो कभी भक्ती रस में गोते लगाने की,कभी योग में शान्ती खोजते है तो कभी ईश्वर में खोजने की सोचते हैं। हमारी खोज आज भी शान्ती की है। परन्तु बाहर की दुनियां में और सबसे मजे की बात तो ये है कि हम सांसारिक संसाधनों में जीवन का आदर्श और मनस शान्ती की खोज भी करने में लगे है। हम ईश्वर वाद में डूबने जा रहे मन्दिरों में, हम जंगलों को काटकर घर बनाने में लगे है कि यहां शान्ती रहेगी। हम समुद्र के बीच घर बना रहे कभी साधना के लिए पहाड़ों पर जा बैठे हैं, तो कभी जंगलों में ध्यान कर रहे। सिर्फ शान्ती की खोज में हम इतने मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे चर्च क्या-क्या नहीं बना डाले परन्तु परिणाम वही कि शान्ती नहीं है। फिर खोज जारी है।
खोज में कोई परिवर्तन नहीं और सिद्धान्त वही अब भी है कि कोई परम भक्त मार्ग सिखा गया। उसके रास्ते चलना है। कोई दार्शनिक मार्ग दिया गया उसके रास्ते जाना है। कोई भोग सिखा गया कोई ध्यान सिखा गया कोई भजन कीर्तन करना शिखा दिया। बस लगे पड़े है कि इस मार्ग से ईश्वर मिलेगा कि इस मार्ग से शान्ती मिलेगी औरा इस तरह भटक रहा है मानव समाज और फिर भी खुद की आदर्शवादी और सभ्य प्राणाी के अंहकार में देख रहा है। मानव अपने आपको सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है। और खुद अपनी वास्तविकता खो बैठा है। अन्य जीव तो कम से कम अपनी मूल प्रवृत्ति पर जीवन जीते है और जीवन का वास्तविक आनन्द लेते है। ना खाने की चिन्ता ना जीने की फिकर ना कल की खोज न आज का दुःख कुछ भी नहीं जो अच्छा लगा खाए शांत सो गए। पर मानव कल के लिए खोज कर रहा है कि आज खा के सो जाएंगे तो कल क्या करेंगे बस खोज भी कल की जब की इसे ये भी नहीं पता कि कल रहूंगा या नही।
