लखनऊ। श्री रामस्वरूप मेमोरियल विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में ज्योतिष आचार्य डॉ. तेजस्कर पाण्डेय, उप सचिव एवं प्रभारी संयुक्त निबंधक, उत्तर प्रदेश सूचना आयोग, लखनऊ ने “वैदिक चिंतन में प्रकृति–ब्रह्माण्ड समन्वय” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। इस अवसर पर देश-विदेश के विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। अपने उद्बोधन में उन्होंने ‘ऋत’ सिद्धांत तथा “यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे” की अवधारणा के माध्यम से स्पष्ट किया कि मानव, प्रकृति एवं ब्रह्माण्ड एक समन्वित एवं परस्पर संबद्ध तंत्र हैं तथा ग्रह-नक्षत्रों की गतियाँ केवल आकाशीय घटनाएँ नहीं, बल्कि मानव जीवन की दिशा, निर्णय एवं मानसिक स्थिति से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
अपने शोध कार्य का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए ज्योतिष आचार्य डॉ. तेजस्कर पाण्डेय ने बताया कि उनका अध्ययन ज्योतिषीय विश्वास-प्रणाली का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करता है, जिसमें भारतीय ज्योतिष को विशेष स्थान दिया गया है। उन्होंने कहा कि इस शोध में तीन हजार से अधिक व्यक्तियों एवं पाँच सौ ज्योतिषाचार्यों के आधार पर गुणात्मक एवं मात्रात्मक पद्धति का उपयोग किया गया है, जिससे यह निष्कर्ष सामने आया है कि ज्योतिष आज भी एक जीवंत, अनुकूलनशील एवं प्रभावी विश्वास-प्रणाली के रूप में समाज में विद्यमान है तथा यह व्यक्ति को मार्गदर्शन, मानसिक संतुलन एवं सांस्कृतिक निरंतरता प्रदान करता है।
ज्योतिष आचार्य डॉ. तेजस्कर पाण्डेय ने विश्वविद्यालय में वैदिक विज्ञान को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कुलपति श्री तिवारी जी का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने उन्हें इस संगोष्ठी में व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से ब्रह्माण्ड विज्ञान एवं ज्योतिष का एक पूर्ण विकसित विभाग स्थापित करने तथा निर्धारित शुल्क के साथ ज्योतिषीय परामर्श केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया, जिससे जनसामान्य को शिक्षित एवं प्रमाणित ज्योतिषाचार्यों से सही एवं विश्वसनीय मार्गदर्शन प्राप्त हो सके और वे अप्रमाणित व्यक्तियों के प्रभाव से बच सकें। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि लखनऊ में लखनऊ विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तथा इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के माध्यम से वैदिक ज्योतिष में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्रदान की जा रही है, जो इस विषय के शैक्षणिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने वैदिक ज्ञान को वर्तमान एवं भविष्य के मार्गदर्शक के रूप में अपनाने का आह्वान किया तथा संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों एवं प्रतिभागियों ने उनके व्याख्यान को अत्यंत उपयोगी, प्रेरणादायी एवं समसामयिक बताया।
