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UP RERA Webinar: प्रमोटर्स के लिए QPR और AAR अनुपालन पर वेबिनार, प्रोजेक्ट पारदर्शिता पर जोर

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प्रमोटर्स को दिए जरूरी दिशा-निर्देश

लखनऊ/गौतमबुद्ध नगर। उत्तर प्रदेश भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (यूपी-रेरा) की ओर से सोमवार दोपहर “QPR & AAR Compliance: Strengthening Project Transparency & Accountability” विषय पर वेबिनार आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य प्रदेश के प्रमोटर्स को परियोजनाओं की प्रगति, वित्तीय स्थिति और आवश्यक नियामकीय अनुपालनों के संबंध में जागरूक करना था। वेबिनार में उत्तर प्रदेश के लगभग सभी प्रमोटर्स जुड़े।

वेबिनार का आयोजन यूपी-रेरा के माननीय अध्यक्ष संजय भूसरेड्डी की अध्यक्षता व सचिव महेंद्र वर्मा कि उपस्थिति में आयोजित हुआ। रेगुलेटरी कंसल्टेंट द्वारा विस्तृत प्रस्तुतीकरण के माध्यम से प्रमोटर्स को क्यू.पी.आर., REG-1, REG-2, REG-3 और REG-5 से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों और अनुपालन प्रक्रिया की जानकारी दी गई।

हर तिमाही परियोजना की प्रगति बताना जरूरी

प्रस्तुतीकरण में बताया गया कि पंजीकृत परियोजनाओं के लिए Quarterly Progress Report (QPR) प्रत्येक तिमाही समाप्त होने के बाद निर्धारित समय में दाखिल करनी होती है। इसमें परियोजना के भौतिक और वित्तीय कार्य की वास्तविक प्रगति दर्ज की जाती है। साथ ही आर्किटेक्ट, इंजीनियर और चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाणपत्र भी लगाए जाते हैं।

प्रमोटर्स को विशेष रूप से बताया गया कि किसी तिमाही में किसी कार्य पर प्रगति नहीं हुई है तो उसे खाली छोड़ने के बजाय शून्य (Zero) दर्ज किया जाए। वित्तीय प्रगति में वास्तविक रूप से किया गया खर्च ही दर्शाया जाए। परियोजना के फोटो और वीडियो भी संबंधित तिमाही तथा कार्य के अनुसार स्पष्ट रूप से अपलोड किए जाने चाहिए।

क्यू.पी.आर. तिमाही समाप्त होने के 15 दिनों के भीतर दाखिल करना होता है। देरी होने पर ₹15,000 विलंब शुल्क का प्रावधान है, जबकि लगातार दो तिमाहियों तक अनुपालन नहीं करने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है।

REG-1, REG-2 और REG-3 से होगी प्रगति की स्वतंत्र जांच


वेबिनार में बताया गया कि परियोजना की निगरानी में तीन महत्वपूर्ण प्रमाणपत्रों की भूमिका है

  • REG-1 आर्किटेक्ट द्वारा परियोजना स्थल पर वास्तविक स्थिति के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमें टावर और परियोजना के स्तर पर निर्माण की प्रगति तथा विभिन्न कार्यों की स्थिति दर्ज होती है।
  • REG-2 इंजीनियर द्वारा तैयार किया जाता है, जिसमें स्थल पर वास्तव में हुए निर्माण कार्य के मूल्य का आकलन किया जाता है और इसे वास्तविक खर्च से मिलाया जाता है।
  • REG-3 चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रमोटर के खातों के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमें परियोजना की कुल लागत, लागत के आधार पर प्रगति और अलग बैंक खाते से धन निकासी के लिए पात्र राशि का विवरण शामिल होता है।
    प्रस्तुतीकरण में स्पष्ट किया गया कि इन तीनों प्रमाणपत्रों का उद्देश्य परियोजना की भौतिक प्रगति, कार्य की लागत और वित्तीय रिकॉर्ड का आपस में मिलान करना है, ताकि परियोजना की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

खर्च की गणना में अपनाया जाता है ‘कम राशि’ का नियम

इंजीनियर के प्रमाणपत्र के संबंध में प्रमोटर्स को बताया गया कि स्वीकार्य खर्च की गणना में स्थल पर वास्तव में हुए कार्य के मूल्य और वास्तव में किए गए खर्च में से जो राशि कम होगी, उसे आधार बनाया जाएगा। उदाहरण के तौर पर, यदि खातों में ₹120 लाख खर्च दिखाया गया है, लेकिन स्थल पर हुए कार्य का मूल्य ₹90 लाख है, तो स्वीकार्य राशि ₹90 लाख मानी जाएगी। इसी तरह यदि स्थल पर कार्य का मूल्य ₹110 लाख है, लेकिन खातों में वास्तविक खर्च ₹85 लाख है, तो ₹85 लाख को आधार माना जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसे खर्च या निकासी पर रोक लगाना है, जिसका वास्तविक निर्माण कार्य या दर्ज खर्च से पर्याप्त आधार न हो।

अलग बैंक खाते से धन निकासी में वित्तीय अनुशासन पर जोर

प्रस्तुतीकरण में परियोजना के अलग बैंक खाते से धन निकासी की प्रक्रिया भी समझाई गई। परियोजना की कुल लागत, पूर्णता के प्रतिशत, पहले निकाली गई राशि और अन्य अनुमन्य मदों को ध्यान में रखते हुए पात्र राशि निर्धारित की जाती है। साथ ही प्रमाणपत्र में दर्ज बैंक शेष और बैंक खाते में मौजूद वास्तविक राशि का आपस में मिलान होना जरूरी है। दोनों में अंतर होने पर उसे वित्तीय विसंगति के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। प्रस्तुतीकरण में यह भी बताया गया कि परियोजना को Completion/Occupancy Certificate मिलने के बाद ही निर्धारित शर्तों के अनुसार अलग खाते से ऋण की मूल राशि के भुगतान की अनुमति है।

REG-5 के माध्यम से सालाना अनुपालन की जांच

वेबिनार में REG-5 यानी वार्षिक वैधानिक ऑडिट रिपोर्ट के संबंध में भी विस्तार से जानकारी दी गई। यह रिपोर्ट प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए तैयार की जाती है और परियोजना के पूरे वर्ष की वित्तीय स्थिति तथा अनुपालन को सामने रखती है।

REG-5 उसी वैधानिक ऑडिटर द्वारा जारी की जानी है, जो प्रमोटर की पूरी बैलेंस शीट का ऑडिट करता है। वित्तीय वर्ष समाप्त होने के छह महीने के भीतर, अर्थात 30 सितंबर तक, इसे दाखिल करना होता है। देरी होने पर ₹25,000 विलंब शुल्क का प्रावधान है। एक महीने से अधिक की देरी पर कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है। REG-5 में परियोजना की पूर्णता, प्राप्त धनराशि, निकाली गई राशि, किए गए खर्च, धन के उपयोग और निकासी से संबंधित अनुपालन, बकाया शुल्क/दायित्व तथा परियोजना की वर्तमान स्थिति जैसी जानकारियां शामिल होती हैं।

यूपी-रेरा 2.0 से अनुपालन व्यवस्था होगी और डिजिटल

वेबिनार में UP-RERA 2.0 के तहत विकसित की जा रही डिजिटल व्यवस्था की भी जानकारी दी गई। इसके माध्यम से REG-1, REG-2, REG-3 और REG-5 को सीधे डिजिटल रूप में भरने की व्यवस्था प्रस्तावित है। परियोजना के भौतिक और वित्तीय लक्ष्यों को प्रमाणपत्रों में दर्ज आंकड़ों से जोड़ने तथा परियोजनाओं में देरी और आंकड़ों में अंतर को तकनीक के माध्यम से चिन्हित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

12 महीने से अधिक के विस्तार के लिए कड़े मानक

प्रस्तुतीकरण में परियोजना पंजीकरण की अवधि को 12 महीने से अधिक बढ़ाने से जुड़े प्रावधानों की भी जानकारी दी गई। इसके लिए परियोजना की कानूनी, आर्थिक और संचालन क्षमता के साथ-साथ एसोसिएशन ऑफ ऑलोटीज (AoA) की भूमिका और निगरानी क्षमता को भी देखा जाएगा।

ऐसे मामलों में परियोजना की वर्तमान स्थिति, देरी के कारण, निर्माण पूरा करने की योजना, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता आदि से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। 12 महीने से अधिक के विस्तार के मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक व्यक्तिगत आवंटियों की सहमति और एसोसिएशन ऑफ ऑलोटीज के गठन जैसी आवश्यकताओं की भी जानकारी दी गई।

पारदर्शिता और आवंटियों के हितों की सुरक्षा पर जोर

वेबिनार में बताया गया कि क्यू.पी.आर. और संबंधित प्रमाणपत्र केवल औपचारिक अनुपालन नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से परियोजना की वास्तविक प्रगति और वित्तीय स्थिति की लगातार निगरानी की जा सकती है। भौतिक प्रगति, कार्य की लागत और वित्तीय रिकॉर्ड के आपसी मिलान से परियोजनाओं में संभावित गड़बड़ियों को समय रहते चिन्हित करने में मदद मिलती है। इस व्यवस्था से संभावित खरीदारों को भी परियोजना की वास्तविक प्रगति की जानकारी मिलती है और प्रमोटर तथा आवंटी के बीच सूचना का अंतर कम करने में सहायता मिलती है। इससे आवंटियों को संपत्ति खरीद से पहले अधिक तथ्यपरक निर्णय लेने में मदद मिलती है।

वेबिनार में यूपी-रेरा की ओर से प्रमुख सलाहकार अबरार अहमद, वित्त सलाहकार सुधांशु त्रिपाठी, रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर मीनाक्षी , एडी सिस्टम अमरीश कुमार , सिस्टम एनालिस्ट गणेश मिश्रा , लीगल सलाहकार उमंग चौधरी तथा मीडिया सलाहकार प्रांजल दीक्षित सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे।

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