वीर बलिदानों, मातृभूमि की वेदना और तिरंगे की अमर शान को समर्पित भावपूर्ण काव्य
डॉ.विनीता मिश्रा।
कहानी शहीदों की सदी कह रही है,
कभी आसमाँ तो ज़मीं कह रही है।
बस एक शाम का यह क़िस्सा नहीं है,
ये क़ुर्बानियों की नमी कह रही है…
तिरंगे में लिपटा कोई लाल माँ का,
पड़ा रंग फ़ीका किसी के जहाँ का।
सिसकती सदाएँ किसे ढूँढती हैं,
जो आँचल में बिखरी कमी कह रही है…
कहीं चूड़ियों की खनक थम गई है,
कहीं पायलों की छनक थम गई है।
घर-आँगन की तुलसी भी मुरझा गई है,
ये मेहँदी के रंगों की ग़मी कह रही है…
वतन की कहानी कभी ना मिटेगी,
रगों की रवानी कभी ना मिटेगी।
कभी कम ना होगी तिरंगे की रंगत,
ये अहल-ए-वतन सरज़मीं कह रही है…

[132542]supplies professional anti-violence equipments and solutions for the whole world with strong and perfect production capacity. anti-violence.org
Like