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द्वापर युग में यहीं रुके थे श्रीकृष्ण-रुक्मिणी, जानें वंश गोपाल तीर्थ की कथा

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द्वापर युग से जुड़ी मान्यता और 24 कोसी परिक्रमा का आरंभ स्थल

लखनऊ/संभल। उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को गति देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशानुसार संभल को अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज और मथुरा के बाद नए तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसी क्रम में संभल के 24 परिक्रमा मार्ग स्थित प्रमुख धार्मिक स्थल वंश गोपाल तीर्थ के पर्यटन विकास के लिए 4.50 करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी देते हुए, 3.37 करोड़ रुपए की पहली किस्त जारी की गई है।  

उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के अनुरूप वंश गोपाल तीर्थ धाम सहित संभल के प्राचीन विरासत-धरोहरों का संरक्षण और पर्यटन विकास तीव्र गति से किया जा रहा है। बेनीपुर चक स्थित प्राचीन वंश गोपाल तीर्थ से ही 24 कोसी परिक्रमा यात्रा शुरू होकर, वापस यहीं संपन्न होती है। उन्होंने बताया कि पर्यटन विभाग द्वारा विभिन्न परियोजनाओं के तहत संभल के प्राचीन तीर्थों, कूपों और मनोकामना मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों का विकास कराया जा रहा है। इन प्रयासों से न केवल क्षेत्र की धार्मिक महत्ता सुदृढ़ हो रही है, बल्कि जनपद की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान भी मिल रही है।’

वंश गोपाल तीर्थ में ये होंगे विकास कार्य
वंश गोपाल तीर्थ के विकास कार्यों पर व्यापक स्तर पर धनराशि खर्च की जाएगी। परियोजना के तहत सामने की ओर स्वागत द्वार के निर्माण पर 31.67 लाख रुपए और पीछे की ओर 15.60 लाख रुपए व्यय किए जाएंगे। वहीं मल्टीपरपज हॉल के भूतल और प्रथम तल के निर्माण पर 95.67 लाख रुपए, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यात्री शेड पर 25 लाख रुपए, शौचालय परिसर पर करीब 26 लाख रुपए तथा चेंजिंग रूम के निर्माण पर 7.42 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे। स्थल विकास के अंतर्गत पत्थर के गमला चबूतरे, कोटा पत्थर के फर्श और स्टेनलेस स्टील रेलिंग निर्माण आदि पर भी लाखों रुपए खर्च होंगे। 

श्री कृष्ण यहीं रुक्मिणी के संग ठहरे थे 
संभल के वंश गोपाल तीर्थ को लेकर प्रचलित मान्यता इसे द्वापर युग से जोड़ती है। कहा जाता है कि लगभग 5000 वर्ष पूर्व जब भगवान श्री कृष्ण देवी रुक्मिणी का हरण कर ले जा रहे थे, तब वे यहीं कदंब के वृक्ष के नीचे ठहरे और विश्राम किया। इसी दौरान उन्होंने देवी रुक्मिणी को कलयुग में भगवान श्री कल्कि के रूप में संभल में अवतार लेने का संकेत दिया। मान्यता है कि इसके बाद ब्रह्मा ने यहां गोपालेश्वर महादेव की स्थापना कर इस स्थान को तीर्थ रूप में प्रतिष्ठित किया और परिक्रमा प्रारंभ करने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। यही कारण है कि संभल की प्रसिद्ध तीर्थ परिक्रमा वंश गोपाल मंदिर से शुरू होकर अंत में यहीं आकर पूरी होती है।

संभल को मिल रहा नव स्वरूप- मंत्री
पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘प्रदेश सरकार संभल की पौराणिक आस्था को आधार बनाते हुए महिष्मती नदी सहित प्राकृतिक संसाधनों के पुनरुत्थान और संरक्षण पर जोर दे रही है। साथ ही मंदिरों, कूपों, प्राचीन स्थलों तथा सांस्कृतिक केंद्रों को जोड़कर एक स्थायी तीर्थ मार्ग विकसित करने की योजना है। इस पहल में स्थानीय कारीगरों, गाइड्स और अन्य हितधारकों को जोड़कर समुदाय को सशक्त बनाया जाएगा। आध्यात्मिक पर्यटन अवसंरचना का विकास, समुदायों का समावेश, शहरी योजना और बेहतर कनेक्टिविटी सहित अन्य प्रयासों से संभल को नव स्वरूप प्रदान किया जा रहा है।’  

‘धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित होगा संभल’
अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने बताया कि ‘प्रदेश सरकार संभल को प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि 24 कोसी परिक्रमा और कल्कि तीर्थ क्षेत्र को एक सशक्त धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जाएगा। परियोजना के तहत 68 तीर्थ स्थलों, 19 महा कूपों और 5 प्रमुख तीर्थों के संरक्षण एवं पुनरुद्धार का कार्य होंगे। इसके साथ ही संभल के मंदिरों, कुंडों और प्राचीन कुओं के जीर्णोद्धार के साथ अन्य आधारभूत विकास कार्य भी कराए जाएंगे।’

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