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राम, इतिहास और विश्वास: भारतीय दर्शन की अनूठी व्याख्या

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हृदयनारायण दीक्षित।


‘इतिहास’ पक्षपातपूर्ण नहीं होता। वह निष्पक्ष और निर्मम होता है। निर्मम का अर्थ है मेरा नहीं, इदं न मम। निष्पक्ष। जहाँ मम है, मेरा है, वहाँ पक्षपात है। लेकिन ‘श्रद्धा’ असम्भव पर विश्वास है। श्रद्धा का विकास शून्य से नहीं होता। वह इतिहास से तथ्य लेती है। संस्कृति की कसौटी पर कसती है। ‘लोक’ समर्थन करता है, विश्वास की सीमाएँ फैलती हैं। विश्वास ‘अंधविश्वास’ जैसा दिखाई पड़ सकता है, लेकिन तर्क और विज्ञान की कसौटी महत्वपूर्ण है। हिन्दू-श्रद्धा का आधार दर्शन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
हिन्दू अनुभूति में ‘राम, कृष्ण और शिव’ त्रिदेव हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार माने जाते हैं। भारतीय श्रद्धा ने उन्हें- इतिहास में खोजा। उन्हें भगवान भी माना। डाॅ. राममनोहर लोहिया भारत के लोकमन की थाह ले चुके थे। लोहिया ने राम, कृष्ण और शिव को भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्नों की संज्ञा दी। ”राम की पूर्णता मर्यादित व्यत्तित्व में है, कृष्ण की उन्मुक्त या सम्पूर्ण व्यत्तित्व में और शिव की असीमित व्यत्तित्व में, लेकिन हर एक पूर्ण है।” (राम, कृष्ण और शिव: लोहिया, पृ. 4) डॉ० लोहिया समाजवादी थे। डाॅ. रामविलास शर्मा माक्र्सवादी थे। महाभारत के सम्बंध में डॉ० शर्मा की टिप्पणी दिलचस्प है, ‘‘महाभारत इतिहास है, आख्यान है…. आधुनिक अर्थ में वह इतिहास नहीं है, लेकिन इतिहास से भिन्न भी नहीं है।’’ फिर आगे कहा, ‘‘ऋग्वेद में जो समाज-व्यवस्था है, ऋग्वेद और रामायण के समाजों से महाभारत का समाज पिछड़ा हुआ है।’’ (भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश) यहाँ एक समाज ऋग्वेद का है, एक रामायण का और बाद का समाज महाभारत का है। श्रीराम और रामायण का समाज ऋग्वेद के बाद है, महाभारत के पहले है। राज्य-व्यवस्था भी विकसित है।
भारत के ज्ञात इतिहास, पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार वैवस्वत मनु पहले आर्य राजा थे। उनके बड़े पुत्र थे इक्ष्वाकु। मनु और इक्ष्वाकु ऋग्वेद में भी हैं। इक्ष्वाकु अयोध्या के राजा थे। इक्ष्वाकु के 19 पीढ़ी बाद मान्धाता चक्रवर्ती राजा हुए। उनका पुत्र पुरुकुत्स अयोध्या का राजा बना। पुरुकुत्स के 11 पीढ़ी बाद दानवीर राजा हरिश्चन्द्र का शासन आया। 41वीं पीढ़ी में राजा सगर और 45वीं में चक्रवर्ती सम्राट भगीरथ। इक्ष्वाकुवंश के बाद 60वीं पीढ़ी में दिलीप, फिर दिलीप का पोता रघु और भी प्रतापी राजा हुआ। रघु के कारण ही ‘रघुवंशी‘ शब्द चला। रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के पुत्र श्रीराम। श्रीराम इक्ष्वाकु वंश की 65वीं पीढ़ी में थे।
वाल्मीकि ने इन्हीं श्रीराम को अपना नायक बनाया। ‘रामायण’ अस्तित्व में आई। वाल्मीकि ‘आदर्श मनुष्य’ का चित्रण कर रहे थे। वाल्मीकि के श्रीराम मनुष्य हंै, ईश्वर भी हैं। लेकिन मनुष्य ज्यादा हैं। तुलसीदास के राम ईश्वर हैं, वे मनुष्य रूप में लीला करते हैं। राम सबको भाए। श्रीराम का चरित्र और व्यक्तित्व विश्वव्यापी बना। संस्कृत और प्राकृत सहित भारत और विश्व की तमाम भाषाओं में रामकथाएँ लिखी गईं। तमिल कवि कम्बन ने 11वीं सदी में ही रामकथा लिखी। मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में भी रामायण राष्ट्रीय महत्व वाला ग्रन्थ है। भारतीय इतिहास के सबसे बड़े लोकप्रिय नेता महात्मा गांधी भारत में ‘रामराज्य’ के ही स्वप्नद्रष्टा बने।
लोहिया के अनुसार ‘राम’ उत्तर और दक्षिण की एकता के देवता हैं और ‘रामायण’ उत्तर-दक्षिण एकता का ग्रन्थ। उन्होंने कहा, ”राम की पूर्णता मर्यादित व्यत्तित्व में है। उन जैसा मर्यादित जीवन कहीं और नहीं, न इतिहास में, न कल्पना में। श्रीराम समन्वय के प्रतीक हैं। न्याय के लिए संघर्ष के प्रतीक हैं। राम आनंद-सागर हैं, हिलोरे लेने वाला सागर नहीं, विश्रांत-निस्पंद। लोहिया को तुलसी का ‘रामचरित मानस’ मोहित करता था। एक-एक चैपाई आनंद का सागर है।
‘रामराज्य’ विश्व में अद्वितीय है। वैदिककाल से लेकर आधुनिक काल की किसी राज्यप्रणाली में रामराज्य के आदर्श नहीं मिलते। तुलसी लिखते हैं, ”बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई।” (रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड) फिर कहते हैं, ”अल्प मृत्यु नही कौनिऊ पीरा, सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा। नहि दरिद्र कोऊ दुखी न दीना, नहि कोऊ अबुध न लच्छन हीना। न अल्पमृत्यु है, न बीमारियाँ। सब स्वस्थ हैं। कोई गरीब और दुःखी नहीं है। न कोई मूर्ख है और न अगुणी।” (वही) सबसे दिलचस्प बात यह है, ”बिधु महि पूर मयूखन्हि, रबि तप जेतन्हि काज- ‘चन्द्रमा’ धरती को प्रकाश से पूर्ण करता है, सूर्य उतना ही तपते हैं, जितना जरूरी होता है।” फिर वर्षा के बारे में कहते हैं, ”मांगे वारिधि देहि जल, रामचन्द्र के राज- बादल इच्छा करते ही, जल माँगते ही बरस पड़ते हैं।”
रामचरितमानस की प्रगतिशीलता सांस्कृतिक परम्परा से संवाद करती है। यह ‘विधि निषेधमय कलिमय हरनी’ (बालकाण्ड) है, इसमें विधि-निषेध (करणीय और अकरणीय) की सूची है। वेदों की परम्परा है, उपनिषदों का दर्शन है। सगुण भक्ति-उपासना है। निर्गुण-निराकार की सरल व्याख्या है। अद्वैत दर्शन भी है, ”एक दारुगत देखिए एकू, पावक सम जुग ब्रह्म विवेकू- जैसे लकड़ी के भीतर निराकार अग्नि छिपी रहती है, दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन जलते समय अग्नि प्रकट रहती है।” प्रकट अग्नि सगुण है, अप्रकट अग्नि निर्गुण है। ऋग्वेद में अग्नि से ऐसी ही प्रार्थना है। उपनिषदों वाले ब्रह्म की तुलसी की चैपाई ठेठ अवधी भाषा में है ‘‘व्यापकु एकु ब्रह्म अविनाशी, सत चेतन घन आनंद वासी।’’ (बालकाण्ड) लेकिन तुलसी भक्तिमार्गी हैं, ”निरगुन तें एहि भांति बड़, नाम प्रभाऊ अपार”- वे नाम का प्रभाव निर्गुण और सगुण से भी बड़ा बताते हैं, ”कहहुं नाम बड़ नाम राम तें निज विचार अनुसार।” यहाँ राम का नाम सगुण राम से भी बड़ा है। ”राम नाम वाणी है। मन संकल्प है। ध्यान है, विज्ञान है, अन्न-जल उन्हीं में है, वे तेज हैं। आकाश हैं, आशा हैं, प्राण हैं।”
माक्र्सवादी विद्वान श्रीराम को कल्पना बताते हैं। ‘राम’ भारत की श्रुति में, बोली में, नमस्कार और कुशलक्षेम में, प्रत्येक मंगलमुहूर्त मंे हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य बहुपठित विद्वान और राजनेता थे। रामकथा पर वे भी सम्मोहित थे। उन्होंने तमिल में ‘तिरुगमन-रामायण’ लिखी। इसका हिन्दी अनुवाद उनकी पुत्री और महात्मा गांधी की पुत्र-बहू लक्ष्मी देवदास गांधी ने किया। राजाजी ग्रन्थ की भूमिका में लिखते हैं, ‘‘सियाराम, हनुमान और भरत को छोड़कर हमारी कोई गति नहीं। उनकी कथा हमारे पूर्वजों की धरोहर है। हम आज उसी के आधार पर जीवित हैं।” (हिन्दी अनुवाद, पृ. 7) यहाँ ‘इसी के आधार पर हम जीवित हैं’ वाक्य पर गौर करना चाहिए। भारत का राष्ट्रजीवन अखण्ड रामायण है। अविभक्त है।
हिन्दू अनुभूति के महानायक हैं श्रीराम। वे दिक्काल में हैं और दिक्काल के परे भी। भारतीय जनता के चित्त, आचार-व्यवहार पर श्रीराम का प्रभाव है। श्रीराम ‘मंगल भवन’ हैं और ‘अमंगलहारी’ भी। वे भारत के मन में रमते हैं। मिले तो राम-राम, अलग हुए तो राम-राम। राम का नाम हमसब बचपन से सुनते आए हैं। वे संकट के धैर्य हैं। वे परम शक्तिशाली हैं। भाव-श्रद्धा में वे ईश्वर हैं। राम तमाम असंभवों के संभव हैं। युद्ध में अजेय पौरुष-पराक्रम और निजी जीवन में मर्यादा के पुरुषोत्तम। श्रीराम भारतीय आदर्श व आचरण के शिखर हैं। भारतीय मनीषा ने उन्हें ब्रह्म या ईश्वर जाना है। श्रीकृष्ण भी विष्णु के अवतार हैं। वे अर्जुन को गीता (10.31) में बताते हैं ‘‘पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्रधारियों में राम हूँ।‘‘ राम महिमावान हैं। श्रीकृष्ण भी स्वयं को राम बताते हैं।

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