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मनुस्मृति के सहारे भारतीय समाज को समझना कितना उचित?

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राहुल गांधी के मनुस्मृति संबंधी बयान के संदर्भ में मनु की अवधारणा और डॉ. अम्बेडकर के विचारों पर विमर्श

राहुल गांधी के बयानों को सामान्यतः गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। संसदीय परंपरा में नेता प्रतिपक्ष की विशिष्ट भूमिका होती है। वह प्रतीक्षारत सरकार होता है। वे प्रायः सोच समझ कर नहीं बोलते। लेकिन जान पड़ता है कि उनके पास कोई अखिल भारतीय ठोस मुद्दा नहीं है। पुणे में उन्होंने मनुस्मृति की चर्चा की। और कहा कि प्राचीन काल में समाज पुरुष सत्ताक था। राहुल के परिवार में प्राचीन भारतीय परंपरा को सम्मान नहीं दिया जाता। वे मनु स्मृति से एक श्लोक ढूंढ लाए हैं। मनुस्मृति का रचनाकाल स्पष्ट नहीं है। यह 180 वर्ष ईसापूर्व की रचना मानी जाती है। प्रत्येक रचनाकार लेखक या कवि अपने समय के समाज से ही सामग्री लेता है। मनुस्मृति कभी समाज में शासनादेश नहीं बनी। राजधर्म भी नहीं बनी। धर्मशास्त्र भी नहीं। इसके रचनाकार ने जैसा सोचा वैसा लिखा। ये किसी सभा समिति का प्रस्ताव नहीं है।

मनु वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में एक चर्चित व्यक्तित्व हैं। उनकी लिखी कोई किताब उपलब्ध नहीं है। मनुज या मनुष्य मनु के ही विस्तार जान पड़ते हैं। भारतीय काल गणना में मन्वंतर एक इकाई है। इसके पहले एक छोटी इकाई है युग। युग चार हैं। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग को जोड़कर महायुग बनता है। फिर 31 महायुग का जोड़ मन्वंतर कहलाता है। हर एक मन्वंतर में एक मनु हैं। मन्वंतर 2 मनुओं के बीच का एक अन्तर्काल। यहां अनेक मनु हो चुके हैं। एक मनु शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित हैं। शतपथ ब्राह्मण वाले मनु के समय भीषण बाढ़ आई थी। वे जल प्रलय में मछली की सहायता से बच निकले थे। कहा जाता है कि इन्हीं मनु ने सृष्टि बीजों की रक्षा की थी। कामायनी हिन्दी साहित्य की प्रतिष्ठित रचना में जयशंकर प्रसाद ने मनु का वर्णन किया है। मनु अथर्ववेद में भी हैं। मत्स्य पुराण में भी हैं। सबसे प्राचीन मनु ऋग्वेद में मिलते हैं। वे मंगल कार्यों में समाज का नेतृत्व करते हैं। इस पूरे विवरण में मनुस्मृति की कहीं कोई चर्चा नहीं है। मनुस्मृति के श्लोक व्याकरण के अनुशासन में हैं। व्याकरण का बंधन पाणिनि के बाद हुआ है। मनुस्मृति की संस्कृत उत्तर वैदिक काल के बहुत बाद की है। मनुस्मृति पुराणों के बाद लिखी गई होगी। मनु ने स्वयं कोई किताब नहीं लिखी। ऋग्वेद में भी मनु सम्बंधी विवरण ऋषि के हैं और परवर्ती साहित्य पुराणों आदि में मनु के उल्लेख अन्य रचनाकारों के हैं। शतपथ ब्राह्मण वाली जल प्रलय की घटना छोटी नहीं थी। इसका उल्लेख बाइबल, कुरान में भी है। चीन की कथाओं में भी है। यूनान के कथासूत्रों में है। जल प्रलय में अकेले बचे मनु ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। मनुस्मृति क® आधार बनाकर समाज का विश्लेषण करना अनुचित है। मनु पर मनुस्मृति का आधार लेकर जातियां बनाने के आरोप भी हैं। मूलभूत प्रश्न है कि क्या समाज उस व्यक्ति के आदेशानुसार जातियों में बंट जाने को तैयार है? क्या आधुनिक इतिहास के शक्ति संपन्न राजा या बादशाह अपने मन की समाज व्यवस्था लागू कर सकते हैं? राहुल गांधी ने इन परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया।

भारतीय समाज में स्त्रियां प्रत्येक स्थिति में सम्मानीय रही हैं। वैदिक काल की एक प्रतिष्ठित महिला मुदग्लानी हैं। वह रथ पर चढ़कर युद्ध में हिस्सा लेती थीं। युद्ध के वर्णन में कहा गया है कि, ”युद्ध के समय उनके वस्त्रों का संचालन वायु देव ने किया था।” ऋग्वेद के अनुसार युद्ध में विपशला का पैर कट गया। अश्वनी देवों ने उसे धातु का पैर लगा दिया था। पति और पत्नी को मिलाकर दंपत्ति बनता है। दंपत्ति में नारी की प्रतिष्ठा है। दंपत्ति स्त्री पुरुष दोनों से मिलकर बना है। ऋग्वेद में अनेक सूक्तों में स्त्री सम्मान का तत्व मौजूद है। ऋग्वेद में ‘आपः मातरम्‘ जलमाताओं को नमस्कार किया गया है। सृष्टि के आदितत्व की खोज महत्वपूर्ण अभिलाषा है। उसे स्त्रीलिंग में याद करना स्त्री का आदर है।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने जाति के जन्म और विकास पर गहन विवेचन और विश्लेषण किया था। उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय न्यूयार्क में 9 मई 1916 के दिन एक लिखित भाषण दिया था। सम्पादक मण्डल ने भूमिका (पृष्ठ 14) में ‘भारत में जातियाँ‘ शीर्षक देकर लिखा है, ”डॉ. अम्बेडकर के अनुसार भारतीय प्रायद्वीप के एक छोर से दूसरे छोर तक लोगों को सांस्कृतिक एकता ही एक सूत्र में बाँधती है। जातियों के सम्बन्ध में डॉक्टर अम्बेडकर का कथन है कि बहिर्विवाह के ऊपर अन्तर्विवाह का अध्यारोपण ही जाति-समूह बनने का मुख्य कारण है।” डॉ. अम्बेडकर के अनुसार ”समाज के छोटे-छोटे भाग बनना एक प्राकृतिक प्रक्रिया या घटना है। इन्हीं छोटे भागों या समुदायों ने बहिष्करण व अनुकरण द्वारा विभिन्न जातियों का रूप ले लिया।” यह भाषण पठनीय है। लिखा है, ”मैं सर्वप्रथम भारत के स्मृतिकार के सम्बन्ध में कहूँगा। प्रत्येक देश में आपातकाल में अवतार के रूप में स्मृतिकार उत्पन्न होते हैं ताकि पतित समाज को सही दिशा-बोध कराया जा सके और न्याय तथा नैतिकता का विधान दिया जा सके। स्मृतिकार मनु यदि वास्तव में कोई व्यक्ति थे तो निश्चित ही वह अदम्य साहसी थे। यदि यह कथन सही है कि मनु ने जाति-विधान की रचना की थी तो वह अवश्य ही एक दुस्साहसी व्यक्ति रहे होंगे। जिस समाज ने उनके समाज-विभाजन नियम को स्वीकार किया वह अवश्य ही उससे भिन्न रहा होगा जिससे हम अवगत हैं। यह सोचा भी नहीं जा सकता कि जाति विधान कोई प्रदत्त वस्तु थी।”

डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है, ”मैं आपको एक वात यह बताना चाहता हूँ कि जाति धर्म का नियम मनु द्वारा प्रदत्त नहीं है।” डॉ. आम्बेडकर ने मनु को जाति विधान का जन्मदाता नहीं माना। भारतीय इतिास में धर्म कभी भी संगठित सत्ता नहीं रहा। पोप जैसी संस्था यहाँ कभी नहीं रही। हिन्दू धर्म की कोई एक सर्वमान्य पुस्तक नहीं। भारत के प्राचीन काव्य को ही धार्मिकों ने सिर झुकाया। वैदिक साहित्य काव्य स्तुतियाँ हैं। ऋग्वेद के साढ़े दस हजार मन्त्रों में एक भी मन्त्र में निर्देशात्मक बात नहीं। वाल्मीकि रचित ‘रामायण‘ अंतर्राष्ट्रीय स्तर का महाकाव्य है। इसमें काव्य के सभी रसों का प्रवाह है। करुण रस में भी मधुरस का छन्दस्। भारत में इसे धर्मशास्त्र की तरह नमन किया जाता है। गीता विश्व स्तर पर चर्चित है ही। रचनाकार कवि के अनुसार श्रीकृष्ण वक्ता हैं, वे प्रश्नकर्ता अर्जुन की जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं। यहाँ भी मानने पर जोर नहीं। गीता प्रबोधन में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, ”गुह्य ज्ञान बताया है, विचार करो, जो उचित हो, वैसा इच्छानुसार करो-यथेच्छसि कुरू।”

मनुस्मृति के रचनाकार ने अपनी इच्छानुसार पुस्तक लिखी। उसे मानना, या न मानना बाध्यकारी नहीं। किसी राजा या राज्य व्यवस्था ने उसे संविधान का दर्जा नहीं दिया। मनुस्मृति वाली राजव्यवस्था/समाज व्यवस्था इतिहास में नहीं मिलती। याज्ञवल्क्य स्मृति वाली भी नहीं। भारतीय समाज, धर्म और दर्शन सतत् गतिशील रहे हैं। हम हजारों बरस प्राचीन साहित्य से श्रेय और प्रेय ही ग्रहण करते हैं। राहुल जी एक किताब के सहारे पूरे समाज को स्त्री विरोधी कहना उचित नहीं।

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One thought on “मनुस्मृति के सहारे भारतीय समाज को समझना कितना उचित?”

  1. अत्यंत तार्किक और सुसंगत तथ्यों से परिपूर्ण आलेख

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